ग्रामीण भारत में डिजिटल कर्ज़ की पहुँच 2% से भी कम, क्यों नहीं आई डिजिटल क्रेडिट क्रांति? नाबार्ड रिपोर्ट में सामने आई ज़मीनी तस्वीर
देश में डिजिटल भुगतान और फिनटेक क्षेत्र तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन ग्रामीण भारत में फिनटेक कंपनियों के माध्यम से मिलने वाले कर्ज़ की पहुँच अब भी बेहद सीमित है। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण परिवारों में 2 प्रतिशत से भी कम लोगों ने फिनटेक कंपनियों से कर्ज़ लिया है। इससे साफ़ होता है कि डिजिटल वित्तीय सेवाओं के विस्तार के बावजूद गाँवों तक डिजिटल कर्ज़ की पहुँच अभी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच सकी है।
नाबार्ड की जून 2026 में जारी रिपोर्ट ‘रूरल क्रेडिट मार्केट कंडीशंस इन इंडिया (ऑल इंडिया सर्वे ऑफ़ रूरल हाउसहोल्ड्स पर आधारित अध्ययन)’ में कहा गया है कि देश के बैंकों ने डिजिटल बैंकिंग सेवाओं का तेज़ी से विस्तार किया है और सरकार ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) भी विकसित किया है। इसके बावजूद फिनटेक के ज़रिए अंतिम छोर तक वित्तीय समावेशन (लास्ट माइल फाइनेंशियल इन्क्लूज़न) का जो लक्ष्य था, वह अभी तक पूरी तरह हासिल नहीं हो पाया है। रिपोर्ट देश की डिजिटल वित्तीय महत्वाकांक्षाओं और ग्रामीण भारत में कर्ज़ की वास्तविक पहुँच के बीच मौजूद अंतर को भी सामने लाती है।
नई डिजिटल कर्ज़ सेवाओं से आगे निकले पीएसीएस और सीएससी
रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण परिवारों में प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पीएसीएस) द्वारा कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) के माध्यम से दी जाने वाली डिजिटल सेवाओं की जानकारी और उनका उपयोग नई फिनटेक आधारित कर्ज़ सेवाओं की तुलना में अधिक है।
मोबाइल इंस्टेंट क्रेडिट (एमआईसी), पहले से स्वीकृत यूपीआई क्रेडिट लाइन और यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस (यूएलआई) जैसी डिजिटल कर्ज़ सुविधाओं की तुलना में ग्रामीण लोग पीएसीएस और सीएससी जैसी स्थानीय संस्थाओं पर अधिक भरोसा कर रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि गाँवों में वित्तीय सेवाओं के लिए भरोसेमंद स्थानीय संस्थाएँ अब भी नई डिजिटल लेंडिंग कंपनियों से अधिक प्रभावी भूमिका निभा रही हैं।
तेज़ी से बढ़ रहा फिनटेक क्षेत्र, लेकिन ग्रामीण बाज़ार अब भी चुनौती
'मिंट' की रिपोर्ट के अनुसार, फिनटेक क्षेत्र से जुड़े अमित नारंग ने कहा है कि देश की बड़ी आबादी ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में रहती है, जहाँ वित्तीय सेवाओं का ढाँचा तैयार करना व्यावसायिक रूप से आसान नहीं है। इसके अलावा सरकार की खाद्यान्न योजना के तहत लगभग 80 करोड़ लोगों को मुफ़्त अनाज मिलता है, जिससे कई परिवारों की खर्च करने की क्षमता सीमित रहती है और छोटे मूल्य के कर्ज़ की माँग अधिक होती है। ऐसे में फिनटेक कंपनियों के लिए इन क्षेत्रों में टिकाऊ कारोबार विकसित करना चुनौती बना हुआ है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा फिनटेक इकोसिस्टम बन चुका है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अगस्त 2025 में कहा था कि वर्ष 2028-29 तक भारत का फिनटेक बाज़ार 400 अरब डॉलर से अधिक का हो सकता है और इसमें सालाना 30 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि का अनुमान है। वहीं, इंडिया ब्रांड इक्विटी फ़ाउंडेशन (आईबीईएफ) के अनुसार, देश में 14,500 से अधिक फिनटेक कंपनियाँ काम कर रही हैं। दूसरी ओर, भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अक्टूबर 2025 में कहा था कि भारत में 10,000 से अधिक फिनटेक कंपनियाँ हैं और पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में 40 अरब डॉलर से अधिक का निवेश हुआ है।
बड़ी ग्रामीण आबादी के बावजूद फिनटेक कर्ज़ की पहुँच बेहद कम
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2011 की जनगणना में देश में लगभग 6.5 लाख गाँव दर्ज किए गए थे, जिनमें से करीब 5.97 लाख आबाद हैं। उसी जनगणना के अनुसार, देश की लगभग 68.8 प्रतिशत आबादी यानी 83 करोड़ से अधिक लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते थे। नाबार्ड की रिपोर्ट बताती है कि इतनी बड़ी ग्रामीण आबादी और मज़बूत डिजिटल बैंकिंग व्यवस्था होने के बावजूद फिनटेक आधारित कर्ज़ ग्रामीण भारत में अभी शुरुआती स्तर पर ही है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि डिजिटल भुगतान और डिजिटल सार्वजनिक ढाँचे में तेज़ प्रगति के बावजूद गाँवों में कर्ज़ पहुँचाने के मामले में स्थानीय संस्थाएँ अब भी सबसे अहम भूमिका निभा रही हैं, जबकि फिनटेक आधारित कर्ज़ व्यवस्था को अंतिम छोर तक पहुँचने के लिए अभी लंबा सफ़र तय करना बाकी है।