5 ग्राम से 5 किलो तक के आम, लखनऊ के इस बाग़ में उग रही दुनिया भर की 352 वैरायटी
में हाई-डेंसिटी प्लांटेशन, ग्राफ़्टिंग तकनीक, सालभर फल देने वाली किस्में और जैविक प्रबंधन जैसे प्रयोग किए जा रहे हैं। शुक्ला का मानना है कि बदलते मौसम और ग्लोबल वार्मिंग के दौर में आम की खेती को नई किस्मों और नए प्रबंधन तरीक़ों की ज़रूरत है।
आम के बाग़ों में दशहरी, लंगड़ा या चौसा जैसे कुछ चुनिंदा नाम आमतौर पर देखने को मिलते हैं। लेकिन लखनऊ के किसान एसी शुक्ला का बाग़ इस मायने में अलग है कि यहाँ आम सिर्फ़ एक फल नहीं, बल्कि एक संग्रहालय की तरह दिखाई देता है। इस बाग़ में 352 किस्मों के आम मौजूद हैं, जिनमें 5 ग्राम के अंगूर दाना आम से लेकर 5 किलो वज़न वाले गजानन आम तक शामिल हैं। शुक्ला बताते हैं कि उनके बाग़ में भारतीय और विदेशी दोनों तरह की किस्में हैं। दक्षिण अफ़्रीका का सेंसेशन, अमेरिका का टॉमी एटकिंस और भारत में विकसित अरुणिका व प्रतिभा जैसी किस्में यहाँ एक साथ देखी जा सकती हैं। उनका दावा है कि कई किस्मों की शेल्फ़ लाइफ़ बेहतर है और कुछ किस्में निर्यात के लिहाज़ से भी उपयुक्त हैं।
एक ही पेड़ पर कई तरह के आम
इस बाग़ की एक और ख़ासियत ग्राफ़्टिंग तकनीक है। कई पेड़ों पर अलग-अलग किस्मों की शाखाएं जोड़ी गई हैं, जिससे एक ही पेड़ पर कई प्रकार के आम लगते हैं। शुक्ला के अनुसार यह कोई जटिल प्रक्रिया नहीं है, लेकिन इसके लिए अनुभव और नियमित देखभाल की ज़रूरत होती है।
जब एक बड़े पेड़ की जगह लगाए गए 20 पेड़
शुक्ला बताते हैं कि उनके पास पहले दशहरी का पारंपरिक बाग़ था। लेकिन बदलते मौसम और उत्पादन की चुनौतियों को देखते हुए उन्होंने बाग़ का स्वरूप बदलना शुरू किया। अब जहाँ पहले एक बड़ा पेड़ होता था, वहाँ लगभग 20 छोटे पौधे लगाए गए हैं। उनका मानना है कि पारंपरिक आम के पेड़ों में एक साल अधिक और अगले साल कम फल आने की समस्या रहती है, जबकि नई किस्मों और घने रोपण (हाई-डेंसिटी प्लांटेशन) से उत्पादन को अधिक नियमित बनाया जा सकता है।
सालभर फल देने वाली किस्में
शुक्ला का दावा है कि उनके पास 27 ऐसी किस्में हैं जो साल के बारहों महीने किसी न किसी अवस्था में फल देती रहती हैं। इन पेड़ों पर एक साथ फूल, कच्चे फल और पके फल देखे जा सकते हैं। उनका कहना है कि इन किस्मों में अल्टरनेट बियरिंग की समस्या भी कम है, यानी हर साल फल आने की संभावना बनी रहती है।
रासायनिक दवाओं से दूरी
बाग़ के प्रबंधन में गोबर की खाद, नीम की खली, नीम का तेल, दशपर्णी और अन्य जैविक उपायों का उपयोग किया जाता है। शुक्ला के अनुसार कीट प्रबंधन के लिए भी रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम रखी जाती है। उनका कहना है कि इससे फलों की गुणवत्ता और स्वाद पर सकारात्मक असर पड़ता है।
ग्लोबल वार्मिंग और दशहरी की चुनौती
शुक्ला का मानना है कि बढ़ते तापमान का असर कुछ पारंपरिक आम की किस्मों पर दिखाई देने लगा है। उनके अनुसार अत्यधिक गर्मी के दौरान फलों के अंदर गलन जैसी समस्याएं देखी जा रही हैं। इसी वजह से उन्होंने बाग़ में नई और विविध किस्मों को शामिल करने पर ज़ोर दिया है।
100 रुपये का एक आम
बाग़ में मौजूद कुछ विदेशी किस्मों के आम आकार और बाज़ार मूल्य दोनों के कारण अलग पहचान रखते हैं। शुक्ला के अनुसार कुछ आम प्रति पीस बेचे जाते हैं और उनकी कीमत 100 रुपये या उससे अधिक हो सकती है। वहीं कुछ किस्मों का बाज़ार मूल्य 400 रुपये प्रति किलो तक पहुँच जाता है।
किसानों के लिए क्या सीख?
शुक्ला का कहना है कि आम के बाग़ में सबसे ज़रूरी है पर्याप्त धूप, हवा, संतुलित सिंचाई और जैविक खाद का उपयोग। उनका मानना है कि नीम की खली और गोबर की खाद बाग़ के लिए
सबसे उपयोगी हैं। साथ ही पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखने और शाखाओं को सहारा देने जैसी छोटी बातें भी उत्पादन पर बड़ा असर डालती हैं। लखनऊ का यह बाग़ केवल आम उत्पादन की कहानी नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि एक किसान का जुनून, प्रयोग और वर्षों का अनुभव किस तरह एक साधारण बाग़ को सैकड़ों
किस्मों के जीवित संग्रहालय में बदल सकता है।