महाराष्ट्र का ये गाँव बना ‘जाति मुक्त गाँव’, सरपंच ने बताई पहल की पूरी कहानी, बोले “हम सबकी एक ही जाति है, इंसान”

Preeti Nahar | Mar 06, 2026, 16:58 IST
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महाराष्ट्र का सौंदाला गाँव अब जाति-मुक्त बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठा चुका है। ग्राम सभा की बैठक में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि अब गाँव में किसी की जाति से संबंधित सवाल नहीं पूछे जाएंगे। यह निर्णय समाज में समानता को बढ़ावा देने के लिए लिया गया है।अब इस गाँव में जाति के बजाय इंसानियत की पहचान के साथ लोग रहते हैं। गाँव कनेक्शन ने यहाँ के सरपंच से बातचीत की और जाना की कैसे शुरूआत हुई इन अनोखी पहल की।
जाति मुक्त गाँव-सौंदाला

महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के सौंदाला गाँव ने एक अनोखी पहल करते हुए खुद को “जाति मुक्त गाँव” घोषित किया है। गाँव के सरपंच शरद आर्गडे और ग्रामीणों की सहमति से यह फैसला ग्रामसभा में लिया गया। इस पहल का उद्देश्य गाँव में जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करना और भाईचारे का माहौल मजबूत करना है। इस फैसले के पीछे की सोच और प्रक्रिया के बारे में सरपंच शरद आर्गडे ने विस्तार से बताया।



गाँव को जाति मुक्त घोषित करने का विचार कहाँ से आया?

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सौंदाला गाँव के सरपंच शरद आर्गडे बताते हैं कि इस पहल की प्रेरणा उन्हें अपने गुरु से मिली। उन्होंने सुझाव दिया था कि महाराष्ट्र और देश में जाति के नाम पर जो माहौल बनता जा रहा है, उसे खत्म करने के लिए गाँव स्तर पर पहल करनी चाहिए। यह बात उन्हें सही लगी। इसके बाद उन्होंने इस विषय पर ग्राम पंचायत के सदस्यों और गाँव के प्रमुख लोगों से चर्चा की। सबकी सहमति के बाद तय किया गया कि गाँव को “जाति मुक्त गाँव” घोषित किया जाएगा, ताकि देश में जो जातीय तनाव का माहौल बन रहा है, वह गाँव तक न पहुंचे। इसके बाद 5 फरवरी को विशेष ग्रामसभा बुलाई गई और उसी में गाँव को जाति मुक्त घोषित करने का प्रस्ताव रखा गया, जिसे सभी ग्रामीणों ने बहुमत से पास कर दिया।



तीन महीने तक चलाया गया जागरूकता अभियान

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सरपंच के अनुसार, इस फैसले से पहले करीब तीन महीने तक गाँव में लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाया गया। हर दिन सुबह 10 बजे गाँव में स्पीकर पर राष्ट्रगान बजाया जाने लगा। उन्होंने बताया कि स्पीकर की आवाज लगभग दो किलोमीटर तक जाती है। जब राष्ट्रगान बजता था, तो खेतों में काम कर रहे लोग भी सम्मान के साथ खड़े हो जाते थे। उस समय सभी के मन में सिर्फ देश के प्रति भावना होती थी, न कि किसी जाति का विचार। इसी दौरान गांव के व्हाट्सऐप समूहों के जरिए भी लोगों को समझाया गया कि हम सभी एक ही मानव जाति के हैं और जाति के आधार पर अलग-अलग होने की जरूरत नहीं है।



शिवाजी महाराज के उदाहरण से समझायी गई एकता

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गाँव के लोगों को समझाने के लिए ग्राम पंचायत कार्यालय के सामने छत्रपति शिवाजी महाराज के अष्टमंडल का कटआउट लगाया गया। सरपंच ने बताया कि शिवाजी महाराज का अष्टमंडल अलग-अलग जातियों के लोगों से मिलकर बना था। उसमें मराठा, दलित, हरिजन और मुस्लिम समाज के लोग भी शामिल थे। जब सभी लोग एक साथ आए, तभी स्वराज की स्थापना संभव हो सकी। इसी उदाहरण से ग्रामीणों को बताया गया कि अगर समाज को मजबूत बनाना है तो जाति से ऊपर उठकर एकता जरूरी है।



ग्रामसभा से पहले किया गया रक्तदान शिविर

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5 फरवरी को ग्रामसभा से पहले गाँव में दो घंटे का रक्तदान शिविर भी आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य लोगों को यह संदेश देना था कि इंसान का खून किसी जाति का नहीं होता। सरपंच ने भगत सिंह के विचार का उदाहरण देते हुए कहा कि खून न हरा होता है और न ही केसरिया, वह सिर्फ लाल होता है। इस संदेश ने लोगों को यह समझाने में मदद की कि सभी इंसान समान हैं।



सरकारी योजनाओं पर नहीं पड़ेगा असर

सरपंच शरद आर्गडे ने बताया कि इस फैसले का सरकारी योजनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा। संविधान के तहत जो जाति आधारित प्रावधान हैं, वे कागजों पर जारी रहेंगे। उन्होंने कहा कि ग्रामसभा संविधान के खिलाफ कोई फैसला नहीं ले सकती। इसलिए सरकारी लाभ लेने के लिए जाति का इस्तेमाल कागजों में रहेगा, लेकिन सामाजिक जीवन में लोग जाति को महत्व नहीं देंगे और अपने नाम के साथ सरनेम लिखने से भी बचेंगे।



पहले गाँव में कई जातियों के लोग रहते थे

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सरपंच के मुताबिक, गाँव में मराठा, ओबीसी, दलित, एससी और मुस्लिम समाज सहित कई समुदायों के लोग रहते हैं। हालांकि गाँव में पहले कोई बड़ा जातीय विवाद नहीं हुआ था, लेकिन सोशल मीडिया पर बढ़ते जातीय तनाव को देखते हुए ग्रामीणों ने पहले ही कदम उठाने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि जैसे किसी बीमारी से बचने के लिए पहले से टीका लगाया जाता है, उसी तरह गाँव ने जातीय तनाव से बचने के लिए यह पहल की।



अगर कोई जातीय तनाव फैलाएगा तो होगी कार्रवाई

ग्रामसभा में यह भी तय किया गया है कि अगर कोई व्यक्ति सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों से जातीय तनाव फैलाने की कोशिश करेगा, तो उसके खिलाफ विशेष ग्रामसभा बुलाई जाएगी। उस ग्रामसभा में तय किया जाएगा कि उस व्यक्ति के खिलाफ क्या कार्रवाई की जानी चाहिए। इससे लोगों को यह संदेश जाएगा कि गाँव में जातीय सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी।



अब गाँव में मिलकर मनाए जाते हैं त्योहार

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इस फैसले के बाद गाँव में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं। पहले कई त्योहार अलग-अलग जातियों के स्तर पर मनाए जाते थे, लेकिन अब पूरे गाँव के लोग मिलकर त्योहार मनाते हैं। गाँव की बस्तियों के नाम भी पहले जातियों के आधार पर जाने जाते थे। अब इन नामों को बदलने की तैयारी की जा रही है, ताकि किसी बस्ती के नाम से वहाँ रहने वाले लोगों की जाति का पता न चले।



अब गाँव को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने पर फोकस

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सरपंच शरद आर्गडे का कहना है कि जाति मुक्त गाँव बनने के बाद अब अगला लक्ष्य गाँव को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है। गाँव में शिक्षित बेरोजगार युवाओं को रोजगार दिलाने के लिए ग्राम पंचायत काम करेगी। करीब ढाई हजार की आबादी वाले इस गाँव में अब पंचायत विकास और रोजगार के नए अवसर पैदा करने की दिशा में काम करने की योजना बना रही है।

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