गिद्ध संरक्षण कार्यक्रम को बड़ी सफलता! कैप्टिव-ब्रीड गिद्ध की ऐतिहासिक उड़ान, 27 दिन में नाप दिया 3,334 किलोमीटर आसमान
देश में गिद्धों की घटती आबादी को पुनर्जीवित करने के लिए चलाए जा रहे संरक्षण प्रयासों को महत्वपूर्ण सफलता मिली है। महाराष्ट्र के मेलघाट टाइगर रिज़र्व में इस वर्ष जनवरी में छोड़ी गई एक कैप्टिव-ब्रीड भारतीय गिद्ध ने 3,334 किलोमीटर की लंबी यात्रा पूरी करते हुए राजस्थान के रणथंभौर टाइगर रिज़र्व तक पहुँचने में सफलता हासिल की है। यह उपलब्धि इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि गिद्ध ने पूरी यात्रा के दौरान जंगल में स्वयं भोजन तलाशा और बिना किसी अतिरिक्त खुराक के प्राकृतिक परिस्थितियों में जीवित रही।
यह उपलब्धि भारत में गिद्ध संरक्षण कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जा रही है। इससे यह संकेत मिला है कि बंदी प्रजनन केंद्रों में तैयार किए गए गिद्ध प्राकृतिक वातावरण में सफलतापूर्वक खुद को ढाल सकते हैं, भोजन खोज सकते हैं और लंबी दूरी तक सुरक्षित यात्रा करने में सक्षम हैं। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञ इसे भविष्य में गिद्धों की आबादी बढ़ाने की दिशा में उत्साहजनक संकेत मान रहे हैं।
मेलघाट से शुरू हुआ 3,334 किलोमीटर का सफ़र
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (BNHS) के अनुसार, लंबी चोंच वाली भारतीय गिद्ध (Gyps indicus) ‘X67’ नाम की पाँच वर्षीय मादा गिद्ध को 2 जनवरी 2026 को महाराष्ट्र के मेलघाट टाइगर रिज़र्व के अंतर्गत अकोट वन्यजीव प्रभाग के सोमठाना क्षेत्र से छोड़ा गया था। X67 उन 15 कैप्टिव-ब्रीड गिद्धों में शामिल थी, जिन्हें सौर ऊर्जा से संचालित ट्रैकिंग टैग लगाकर जंगल में छोड़ा गया था। रिलीज़ के बाद यह लगभग चार महीने तक अपने मूल क्षेत्र के आसपास ही रही और धीरे-धीरे प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालती रही।
सतपुड़ा और कूनो होते हुए पहुँची रणथंभौर
बीएनएचएस के मुताबिक, 28 मई को गिद्ध ने मेलघाट टाइगर रिज़र्व से बाहर निकलकर लंबी यात्रा शुरू की। इसके बाद उसने महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान के विभिन्न संरक्षित क्षेत्रों में उड़ान भरी। 27 दिनों की इस यात्रा के दौरान गिद्ध ने मध्य प्रदेश के सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व, भोपाल क्षेत्र और कूनो राष्ट्रीय उद्यान में अस्थायी पड़ाव डाले। कूनो राष्ट्रीय उद्यान वही स्थान है जहाँ देश में चीता पुनर्वास परियोजना संचालित की जा रही है। इसके बाद गिद्ध मंगलवार को राजस्थान के रणथंभौर टाइगर रिज़र्व पहुँच गई।
संरक्षित क्षेत्रों को प्राथमिकता दे रहे हैं गिद्ध
बीएनएचएस के निदेशक किशोर रीठे ने कहा, "इस यात्रा से सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया है कि गिद्ध टाइगर रिज़र्व और अन्य संरक्षित क्षेत्रों के नेटवर्क को प्राथमिकता दे रहे हैं, क्योंकि वहाँ मांसाहारी वन्यजीवों की अच्छी मौजूदगी के कारण प्राकृतिक रूप से मृत पशुओं के अवशेष उपलब्ध रहते हैं।" उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि गिद्ध संरक्षण कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है और इससे यह साबित होता है कि कैप्टिव-ब्रीड गिद्ध प्राकृतिक वातावरण में सफलतापूर्वक अनुकूलन कर सकते हैं, स्वयं भोजन खोज सकते हैं और लंबी दूरी की यात्रा कर सकते हैं।
वैज्ञानिकों की निगरानी में हैं सभी गिद्ध
मेलघाट से छोड़े गए सभी 15 गिद्धों के पैरों में नीले रंग की पहचान रिंग लगाई गई है। नीला रंग यह दर्शाता है कि रिंगिंग भारत में की गई है, जबकि ‘M’ अक्षर महाराष्ट्र को रिलीज़ स्थल के रूप में चिन्हित करता है। इन गिद्धों पर लगाए गए सौर ऊर्जा संचालित ट्रैकिंग टैग वैज्ञानिकों को उनकी आवाजाही, यात्रा दूरी, सुरक्षा और जीवित रहने की स्थिति पर लगातार नज़र रखने में मदद कर रहे हैं। गिद्ध X67 की यह सफल यात्रा भारत में गिद्ध संरक्षण और पुनर्वास कार्यक्रमों की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।