Poshan Abhiyaan: कुपोषण से लड़ाई में यूपी कितना आगे बढ़ा? बच्चों की सेहत पर क्या पड़ा असर, क्या कहते हैं पोषण अभियान के आंकड़े
कुपोषण लंबे समय से भारत के सामने एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती रहा है। इसका सबसे अधिक असर बच्चों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं पर पड़ता है। बच्चों में कम लंबाई, कम वजन और शारीरिक विकास में रुकावट जैसी समस्याएं अक्सर पोषण की कमी से जुड़ी होती हैं।
उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में पोषण संबंधी योजनाओं के विस्तार और नियमित निगरानी पर जोर दिया गया है। टेक होम राशन (THR) योजना के माध्यम से बड़ी संख्या में लाभार्थियों तक जरूरत के अनुसार पोषण पहुंचाया जा रहा है, जिसके प्रभाव स्वास्थ्य संकेतकों में भी देखने को मिल रहे हैं।
कुपोषण क्यों है चिंता का विषय?
कुपोषण वह स्थिति है जब शरीर को आवश्यक पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाते। इसका असर बच्चों की शारीरिक वृद्धि, रोग प्रतिरोधक क्षमता और समग्र विकास पर पड़ सकता है। भारत में स्टंटिंग (उम्र के अनुसार कम लंबाई), अंडरवेट (कम वजन) और वेस्टिंग (अत्यधिक दुबलापन) जैसी समस्याएं लंबे समय से चिंता का विषय रही हैं।
उत्तर प्रदेश में क्या बदलाव हुए?
प्रदेश में वर्तमान में हर महीने लगभग 1.56 करोड़ लाभार्थियों तक पोषण आहार पहुंचाया जा रहा है। इनमें छह माह से छह वर्ष तक के बच्चे, गर्भवती महिलाएं, धात्री माताएं और अतिकुपोषित बच्चे शामिल हैं।
भारत सरकार की सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0 गाइडलाइन तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम-2023 के अनुरूप रेसिपी आधारित अनुपूरक पुष्टाहार व्यवस्था को प्रभावी रूप से लागू किया है। उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है जिसने इस नई प्रणाली को बड़े पैमाने पर धरातल पर उतारा है।
वर्तमान में प्रदेश में हर महीने लगभग 1.56 करोड़ लाभार्थियों तक पौष्टिक आहार पहुंचाया जा रहा है। इनमें छह माह से छह वर्ष तक के बच्चे, गर्भवती महिलाएं, धात्री माताएं तथा अतिकुपोषित बच्चे शामिल हैं।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में बच्चों में स्टंटिंग की दर वर्ष 2015-16 के 39.7 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2019-21 में 31.5 प्रतिशत दर्ज की गई। इसी अवधि में अन्य पोषण संकेतकों में भी सुधार दर्ज किया गया है।
अलग-अलग समूहों के लिए विशेष पोषण उत्पाद
योजना के तहत विभिन्न आयु वर्गों और जरूरतों के अनुसार पोषण उत्पाद उपलब्ध कराए जा रहे हैं। बच्चों के लिए शिशु आहार और बाल पुष्टिकर, जबकि गर्भवती एवं धात्री महिलाओं के लिए विशेष मातृ आहार की व्यवस्था की गई है। अतिकुपोषित बच्चों के लिए अतिरिक्त ऊर्जा और पोषक तत्वों वाले उत्पाद भी उपलब्ध कराए जाते हैं।
तकनीक के जरिए निगरानी
पोषण सामग्री के वितरण की निगरानी के लिए जीपीएस ट्रैकिंग, क्यूआर कोड और ओटीपी आधारित सत्यापन प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है। इसका उद्देश्य वितरण प्रक्रिया को ट्रैक करना और लाभार्थियों तक सामग्री की पहुंच सुनिश्चित करना है।
महिला स्वयं सहायता समूहों की भूमिका
टेक होम राशन के उत्पादन और आपूर्ति में महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी भी शामिल है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रदेश में 4,000 से अधिक महिलाएं इस व्यवस्था से जुड़ी हैं। इससे उन्हें आय के अवसर प्राप्त हुए हैं और स्थानीय स्तर पर उत्पादन गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला है।
जागरूकता, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच का बढ़ना जरूरी
कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए केवल पोषण सामग्री उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ जागरूकता, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, स्वच्छता और नियमित निगरानी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में पोषण योजनाओं के प्रभाव का आकलन स्वास्थ्य संकेतकों और जमीनी स्तर के परिणामों के आधार पर किया जाता रहेगा। हर्षिता माथुर, निदेशक, बाल विकास एवं पुष्टाहार तथा राज्य पोषण मिशन ने इसकी जानकारी दी।