सोयाबीन की फ़सल पर टिकी बाजार की नजर, किसानों के लिए क्यों अहम हैं अगले कुछ सप्ताह
हर खरीफ़ सीजन में किसान आसमान की ओर देखकर अपनी खेती की अगली चाल तय करते हैं। इस बार भी कुए ऐसा ही हुआ। कहीं बारिश देर से पहुँची तो कहीं उम्मीद से कम हुई। जिससे सोयाबीन की बुवाई प्रभावित हुई । मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात जैसे प्रमुख सोयाबीन उत्पादक राज्यों में समय पर पर्याप्त बारिश नहीं होने से बुवाई पीछे चली गई। इससे किसानों के साथ-साथ तेल उद्योग की भी चिंता बढ़ी, क्योंकि सोयाबीन भारत की प्रमुख तिलहनी फ़सलों में शामिल है। हालांकि जुलाई में बारिश की स्थिति सुधरने के बाद कई इलाकों में किसानों ने तेजी से बुवाई पूरी की है। अब आने वाले हफ्तों का मौसम तय करेगा कि इस बार उत्पादन कितना रहेगा और उसका असर बाज़ार पर कितना पड़ेगा।
भारत अपनी खाद्य तेल जरूरत का लगभग दो-तिहाई हिस्साआयात करता है। इसलिए घरेलू स्तर पर सोयाबीन जैसी तिलहनी फ़सलों का उत्पादन केवल किसानों की आय का नहीं, बल्कि देश की खाद्य तेल आपूर्ति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसी वजह से इस बार सोयाबीन की बुवाई और फ़सल की प्रगति पर कृषि विशेषज्ञों के साथ-साथ उद्योग की भी नजर बनी हुई है।
मानसून की चाल ने बदली किसानों की रणनीति
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के खरीफ़ बुवाई के आँकड़ों के अनुसार, जून में कमजोर मानसून के कारण कई खरीफ़ फ़सलों की बुवाई पिछड़ गई थी। सोयाबीन उत्पादक राज्यों में भी किसान बारिश का इंतजार करते रहे। लेकिन जुलाई में बारिश बढ़ने के बाद बुवाई ने रफ़्तार पकड़ी। सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया का कहना है कि कई राज्यों में बुवाई तेज़ी से आगे बढ़ी है और अंतिम रकबा पिछले वर्ष के बराबर या उससे अधिक भी हो सकता है। हालांकि अंतिम तस्वीर अब भी मानसून के प्रदर्शन पर निर्भर करेगी।
उत्पादन पर रहेगी बाज़ार की नजर
सोयाबीन से खाद्य तेल के साथ-साथ सोयामील भी तैयार होता है, जिसका उपयोग पशु चारे में किया जाता है। यदि मौसम की वजह से उत्पादन प्रभावित होता है तो इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। उद्योग से जुड़े जानकारों का मानना है कि ऐसी स्थिति में घरेलू उपलब्धता कम हो सकती है और जरूरत पड़ने पर खाद्य तेल के आयात पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया का अनुमान है कि त्योहारी मांग को देखते हुए जुलाई से अक्टूबर के बीच खाद्य तेल के आयात में बढ़ोतरी हो सकती है, ताकि बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनी रहे।
मौसम तय करेगा आगे की तस्वीर
सोयाबीन की मौजूदा स्थिति केवल किसानों की आय का विषय नहीं है। इसका सीधा संबंध देश की खाद्य तेल आपूर्ति, आयात और उपभोक्ता की रसोई से भी जुड़ा है। इसलिए आने वाले कुछ सप्ताह केवल यह तय नहीं करेंगे कि इस साल सोयाबीन की पैदावार कैसी रहेगी, बल्कि यह भी स्पष्ट करेंगे की देश की खाद्य तेल की ज़रूरत पूरी करने के लिए आयात पर कितना निर्भर रहना पडेगा। फिलहाल किसानों की नजर आसमान पर है और बाजार की नज़र खेतों पर । यदि अगस्त में सामान्य बारिश होती है तो देर से बोई गई फसल को भी अच्छा विकास मिल सकता है। वहीं लंबे सूखे या असमान वर्षा की स्थिति में उत्पादन प्रभावित होने की आशंका बनी रहेगी। भारत मौसम विज्ञान विभाग भी किसानों को स्थानीय मौसम पूर्वानुमान के आधार पर कृषि कार्य करने की सलाह दे रहा है। ऐसे में आने वाले कुछ सप्ताह किसानों, तेल उद्योग और उपभोक्ताओं तीनों के लिए अहम रहने वाले हैं।