मानसून की सुस्त चाल से खेती पर संकट, खरीफ़ बुआई 23% कम, जुलाई की बारिश पर टिकी उम्मीदें
दक्षिण-पश्चिम मानसून की धीमी रफ़्तार का असर अब खरीफ़ फसलों की बुआई पर साफ़ दिखाई देने लगा है। देश में 25 जून तक खरीफ़ फसलों का कुल बुआई रकबा पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 23 प्रतिशत कम दर्ज किया गया है। कृषि मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, इस अवधि तक 182.72 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुआई हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी समय तक यह आँकड़ा 236.46 लाख हेक्टेयर था। मानसून में करीब 42 प्रतिशत की कमी (29 जून तक) के बीच बुआई में यह गिरावट ऐसे समय सामने आई है, जब मौसम एजेंसियाँ सुपर अल नीनो की आशंका भी जता रही हैं।
हालाँकि कुछ क्षेत्रों में मानसून ने दोबारा रफ़्तार पकड़ी है, लेकिन कृषि गतिविधियों के लिहाज़ से जुलाई का महीना सबसे अहम माना जाता है। अधिकांश खरीफ़ फसलों की बुआई इसी अवधि में होती है। ऐसे में आने वाले दिनों में मानसून की प्रगति पर किसानों के साथ-साथ कृषि क्षेत्र की भी नज़र रहेगी। अधिकारियों का कहना है कि यदि अगले दो सप्ताह तक बारिश की स्थिति में लगातार सुधार बना रहता है, तो बुआई की गति तेज़ हो सकती है, हालांकि पिछले वर्ष के स्तर तक पहुँचना चुनौतीपूर्ण रहेगा क्योंकि 2025 में मानसून सामान्य से बेहतर रहा था।
धान, तिलहन, कपास और दलहन की बुआई में तेज़ गिरावट
कृषि मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक खरीफ़ मौसम की प्रमुख फसल धान की बुआई 25.75 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 34.41 लाख हेक्टेयर थी। दलहनों का कुल रकबा घटकर 14.92 लाख हेक्टेयर रह गया, जो एक साल पहले 21.46 लाख हेक्टेयर था। तिलहनों की बुआई में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई और इसका रकबा 36.41 लाख हेक्टेयर से घटकर 16.99 लाख हेक्टेयर पर आ गया।
कपास की बुआई भी करीब 35 प्रतिशत घटकर 29.66 लाख हेक्टेयर रह गई, जबकि पिछले वर्ष यह 45.36 लाख हेक्टेयर थी। सोयाबीन का रकबा 19.97 लाख हेक्टेयर से घटकर 6.92 लाख हेक्टेयर और मूँगफली का रकबा 15.29 लाख हेक्टेयर से घटकर 8.87 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया।
दलहनों में अरहर की बुआई 8.45 लाख हेक्टेयर से घटकर 3.56 लाख हेक्टेयर रह गई। उड़द का रकबा 2.51 लाख हेक्टेयर से घटकर 1.07 लाख हेक्टेयर हो गया, जबकि मूँग की बुआई में मामूली गिरावट के साथ यह 8.63 लाख हेक्टेयर से घटकर 8.37 लाख हेक्टेयर दर्ज की गई।
मोटे अनाज में मिला-जुला रुझान, सामान्य रकबे का केवल 16.5% क्षेत्र ही कवर
मोटे और पोषक अनाजों (श्री अन्न) की बुआई का कुल रकबा 36.07 लाख हेक्टेयर से घटकर 31.84 लाख हेक्टेयर रह गया। इस श्रेणी में केवल ज्वार की बुआई बढ़ी है, जिसका रकबा 2.70 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 3.38 लाख हेक्टेयर पहुँच गया। इसके विपरीत बाजरा 13.06 लाख हेक्टेयर से घटकर 11.34 लाख हेक्टेयर, रागी 0.73 लाख हेक्टेयर से घटकर 0.66 लाख हेक्टेयर और मक्का 18.61 लाख हेक्टेयर से घटकर 15.71 लाख हेक्टेयर रह गया।
वहीं, गन्ना एकमात्र प्रमुख फसल रही, जिसके रकबे में बढ़ोतरी दर्ज की गई। गन्ने की बुआई 56.64 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 57.31 लाख हेक्टेयर हो गई। चूँकि गन्ने की रोपाई खरीफ़ मौसम से पहले शुरू हो जाती है, इसलिए इसे भी खरीफ़ आँकड़ों में शामिल किया जाता है।
जुलाई की बारिश पर टिकी उम्मीदें
25 जून तक कुल खरीफ़ बुआई सामान्य मौसम के कुल 1104.46 लाख हेक्टेयर रकबे का केवल 16.5 प्रतिशत ही रही, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि तक यह 21 प्रतिशत से अधिक पहुँच चुकी थी। इससे साफ़ है कि इस बार बुआई की रफ़्तार धीमी रही है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार अगले दो दिनों में गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के शेष हिस्सों, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ भागों में मानसून आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियाँ अनुकूल हैं। इसके बाद के दो से तीन दिनों में मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, दक्षिण-पूर्वी राजस्थान और गुजरात के बाकी हिस्सों में भी मानसून के आगे बढ़ने की संभावना है। कृषि क्षेत्र की नज़र अब जुलाई की बारिश पर टिकी है, क्योंकि इसी अवधि में खरीफ़ फसलों की बुआई का सबसे महत्वपूर्ण चरण पूरा होता है।