MSP और सब्सिडी से आगे बढ़ने का वक्त, खेती पर बढ़ता बोझ कम करना जरूरी, कृषि सुधारों पर नीति आयोग की बड़ी सलाह
भारत की कृषि व्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उत्पादन बढ़ाने से ज्यादा जरूरत संरचनात्मक सुधारों की है। देश की लगभग आधी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है, जबकि कृषि का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान करीब छठे हिस्से के बराबर है। ऐसे में किसानों की आय, कृषि की लाभप्रदता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कृषि से अतिरिक्त श्रमशक्ति को उद्योग और सेवा क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित करना होगा। साथ ही, वस्तु आधारित सब्सिडी की जगह प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण (Direct Income Transfer) को बढ़ावा देना चाहिए। यह बात नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक लाहिड़ी ने मंगलवार को कही।
नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी, आईसीआरआईईआर (ICRIER) की शोधकर्ता राया दास और एनएसई के मुख्य अर्थशास्त्री तीर्थंकर पटनायक द्वारा लिखित पुस्तक ‘गेटिंग एग्रीकल्चर मार्केट्स राइट’ के विमोचन के दौरान लाहिड़ी ने कहा कि कृषि क्षेत्र में मौजूद कई समस्याओं की जड़ संरचनात्मक असंतुलन है।
कृषि पर आधी आबादी निर्भर, संकट होना स्वाभाविक
अशोक लाहिड़ी ने कहा कि भारत की करीब आधी आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है, जबकि यह क्षेत्र देश के GDP में लगभग एक-छठा योगदान देता है। उन्होंने कहा, “यदि आधी आबादी एक-छठे GDP पर निर्भर होगी, तो संकट और आय असमानता स्वाभाविक है।” उन्होंने कहा कि दीर्घकालिक समाधान कृषि से अतिरिक्त श्रमशक्ति को उद्योग और सेवा क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित करने तथा कृषि उत्पादकता बढ़ाने में है।
सब्सिडी की जगह नकद सहायता बेहतर विकल्प
लाहिड़ी ने कहा कि अधिकांश विशेषज्ञ मानते हैं कि वस्तु आधारित सब्सिडी की तुलना में प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण अधिक प्रभावी और पारदर्शी व्यवस्था है। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि राजनीतिक स्तर पर यह बदलाव आसान नहीं होगा, क्योंकि किसान और लाभार्थी अक्सर वस्तु आधारित सहायता को नकद भुगतान की तुलना में अधिक सुरक्षित मानते हैं।
MSP व्यवस्था पर भी उठाए सवाल
नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व्यवस्था के प्रभावों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि देश के 10 प्रतिशत से भी कम किसानों और कुल कृषि उत्पादन मूल्य के 10 प्रतिशत से कम हिस्से को MSP खरीद का प्रत्यक्ष लाभ मिलता है, लेकिन इसका असर पूरे देश के फसल चक्र पर पड़ता है।उन्होंने बताया कि सरकारी खरीद मूल्य का करीब 78 प्रतिशत हिस्सा केवल गेहूं और धान पर खर्च होता है। तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में सरकारी खरीद बढ़ने से पानी की अधिक खपत वाली फसलों को बढ़ावा मिला है, जबकि दलहन और तिलहन जैसी फसलों का विस्तार अपेक्षित स्तर तक नहीं हो पाया।
बदल चुकी है देश की कृषि स्थिति
लाहिड़ी ने कहा कि MSP व्यवस्था उस दौर में शुरू की गई थी, जब भारत खाद्यान्न की कमी से जूझ रहा था और आयात पर निर्भर था। लेकिन अब देश खाद्यान्न अधिशेष की स्थिति में पहुंच चुका है। ऐसे में वर्तमान व्यवस्था की वित्तीय और पर्यावरणीय लागतों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है।
बाजार सुधार भी जरूरी
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि केवल बाजार आधारित समाधान पर्याप्त नहीं होंगे। अपने संसदीय क्षेत्र बलूरघाट (पश्चिम बंगाल) के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि देश के कई ग्रामीण इलाकों में छोटे किसानों, स्वयं सहायता समूहों और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के लिए प्रभावी बाजार व्यवस्था मौजूद ही नहीं है। उन्होंने कहा कि उत्पादन के बाद विपणन आज भी किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।
किसानों को बाजार से जोड़ने की जरूरत
लाहिड़ी ने कहा कि ऐसे कृषि बाजार और एग्रीगेटर विकसित किए जाने चाहिए, जो किसानों को सीधे उपभोक्ताओं से जोड़ सकें। इससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा और आपूर्ति श्रृंखला में मौजूद अक्षमताएं कम होंगी। उन्होंने कहा कि बढ़ती साक्षरता और जागरूकता के साथ कृषि सुधारों के लिए समर्थन भी बढ़ सकता है। आर्थिक रूप से अस्थिर नीतियां लंबे समय तक जारी नहीं रह सकतीं।
फसल कटाई के बाद के प्रबंधन पर देना होगा जोर
प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के अध्यक्ष एस. महेंद्र देव ने कहा कि कृषि आय बढ़ाने के लिए अब उत्पादन बढ़ाने से अधिक ध्यान फसल कटाई के बाद के प्रबंधन, विपणन और कृषि प्रसंस्करण पर देना होगा। उन्होंने कहा कि औद्योगीकरण जरूरी है, लेकिन इसमें समय लगेगा। तब तक कृषि पर निर्भर आबादी की आय और जीवन स्तर में सुधार करना आवश्यक है।
बागवानी, पशुपालन और मत्स्य क्षेत्र से सीखने की जरूरत
महेंद्र देव ने कहा कि बागवानी, पशुपालन और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्र, जो MSP व्यवस्था से काफी हद तक बाहर हैं, हाल के वर्षों में अधिक तेजी से बढ़े हैं। पशुपालन और मत्स्य क्षेत्र की वृद्धि दर 7 प्रतिशत से अधिक रही है, जो कृषि नीति के लिए महत्वपूर्ण संकेत देती है।
तकनीक से बदल सकती है तस्वीर
उन्होंने कहा कि ई-नाम (e-NAM), ओएनडीसी (ONDC), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल तकनीकें किसानों को बेहतर मूल्य खोज, बाजार पहुंच और मांग-आपूर्ति का पूर्वानुमान उपलब्ध कराने में मदद कर सकती हैं। हालांकि इसके लिए बुनियादी ढांचे और तकनीक अपनाने की चुनौतियों को दूर करना होगा।
कृषि नीति को बनाना होगा साक्ष्य आधारित
नीति आयोग के पूर्व सदस्य रमेश चंद ने कहा कि भारत में कृषि नीति धीरे-धीरे साक्ष्य आधारित व्यवस्था से राजनीतिक और लोकलुभावन नीतियों की ओर बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि यदि कृषि नीतियों को प्रभावी बनाना है तो किसानों की भागीदारी और वैज्ञानिक तथ्यों को अधिक महत्व देना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि उत्पादन लागत पर 50 प्रतिशत लाभ जोड़कर MSP तय करने की नीति से धान के रकबे में 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन दलहन और तिलहन के क्षेत्र में वैसी वृद्धि नहीं हो सकी, जैसी उम्मीद की गई थी।