जल संकट से निपटने के लिए नई तकनीक पर ज़ोर, पीएम मोदी बोले- पानी बचाने के साथ डेटा और AI का भी हो इस्तेमाल
देश में बढ़ती आबादी, तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण और बदलती जल ज़रूरतों के बीच पानी की उपलब्धता आने वाले वर्षों में बड़ी चुनौती बन सकती है। ऐसे में जल संरक्षण को सिर्फ़ मौजूदा संकट से निपटने तक सीमित रखने के बजाय भविष्य की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर तैयारी करने पर ज़ोर दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जल प्रबंधन में आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल को बढ़ाने, राज्यों के बेहतर मॉडलों को साझा करने और पानी के हर स्रोत का अधिक प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने की ज़रूरत बताई है।
नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय विभागीय जल शिखर सम्मेलन के समापन सत्र में प्रधानमंत्री ने कहा कि कृषि से लेकर शहरों तक पानी के इस्तेमाल को अधिक कुशल बनाने के लिए नई तकनीकों को बड़े स्तर पर अपनाना होगा। उन्होंने राज्यों में किए जा रहे सफल प्रयोगों को दूसरे राज्यों तक पहुँचाने के लिए किसानों, जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की संरचित अंतरराज्यीय अध्ययन यात्राएँ आयोजित करने का सुझाव भी दिया। उनका ज़ोर इस बात पर रहा कि जल सुरक्षा के लिए तकनीक, बेहतर योजना और जनभागीदारी को साथ लेकर चलना होगा।
जल संरक्षण में आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा
प्रधानमंत्री ने पानी बचाने वाली तकनीकों को आम लोगों और संबंधित संस्थाओं तक पहुँचाने के लिए विशेष प्रदर्शनियों और कार्यशालाओं के आयोजन का सुझाव दिया। इनमें भारत के साथ-साथ दूसरे देशों में इस्तेमाल हो रही प्रभावी तकनीकों और बेहतर जल प्रबंधन के तरीक़ों को भी दिखाया जा सकता है। इससे भारतीय कंपनियों और अन्य हितधारकों को नए समाधान विकसित करने में मदद मिल सकती है। कृषि क्षेत्र में पानी के अधिक कुशल इस्तेमाल पर भी विशेष ज़ोर दिया गया। खेती में पानी की बढ़ती ज़रूरत को देखते हुए ऐसी तकनीकों और तरीक़ों को बढ़ावा देने की ज़रूरत है, जिनसे कम पानी में बेहतर उपयोग संभव हो सके।
जलाशयों की डी-सिल्टिंग नियमित करने पर ज़ोर
जलाशयों और दूसरी जल संरचनाओं में समय के साथ जमा होने वाली गाद उनकी जलधारण क्षमता को प्रभावित कर सकती है। प्रधानमंत्री ने ऐसी संरचनाओं की डी-सिल्टिंग यानी गाद निकालने की प्रक्रिया को नियमित कार्यक्रम के तौर पर चलाने की बात कही। उन्होंने इसके लिए स्पष्ट मानक और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर यानी SOP तैयार करने का सुझाव दिया। नियमित डी-सिल्टिंग से जल संरचनाओं की क्षमता बनाए रखने और उपलब्ध पानी के बेहतर प्रबंधन में मदद मिल सकती है।
ट्रीटेड पानी का खेती और उद्योग में बढ़े इस्तेमाल
भविष्य में पानी की कमी से निपटने के लिए प्रधानमंत्री ने उपचारित यानी ट्रीटेड पानी के इस्तेमाल को बढ़ाने पर भी ज़ोर दिया। उनका सुझाव है कि खेती और औद्योगिक गतिविधियों में जहाँ संभव हो, ट्रीटेड पानी का इस्तेमाल बढ़ाया जाए। इससे पीने और दूसरे ज़रूरी कामों के लिए उपलब्ध साफ़ पानी पर दबाव कम किया जा सकता है। साथ ही, शहरों और उद्योगों से निकलने वाले पानी को उपचारित करके दोबारा उपयोग में लाने से जल संसाधनों का अधिक प्रभावी इस्तेमाल संभव होगा।
तेज़ी से हो रहे शहरीकरण के बीच शहरों में पानी की मांग आने वाले समय में और बढ़ सकती है। प्रधानमंत्री ने शहरी स्थानीय निकायों को इस चुनौती के लिए पहले से तैयार रहने की ज़रूरत बताई। उन्होंने कहा कि शहरों की भविष्य की आबादी और पानी की ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए योजनाएँ अभी से तैयार की जानी चाहिए। इसका मतलब सिर्फ़ नए जल स्रोत तलाशना नहीं, बल्कि मौजूदा संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल, संरक्षण और प्रबंधन भी है।
मानसून से पहले बांधों की सुरक्षा की तैयारी
प्रधानमंत्री ने बांधों की सुरक्षा को लेकर भी नियमित तैयारी पर ज़ोर दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि हर मानसून से पहले बांधों की सुरक्षा और संभावित जोखिमों की समीक्षा की जाए, ताकि किसी भी आपात स्थिति से पहले आवश्यक कदम उठाए जा सकें। उन्होंने स्कूलों के विद्यार्थियों को भी बांध सुरक्षा और जल प्रबंधन से जुड़ी बुनियादी जानकारी देने की बात कही। इससे आने वाली पीढ़ी में पानी और जल संरचनाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
जल संरक्षण में जनभागीदारी को बढ़ाने पर ज़ोर
प्रधानमंत्री ने जल संरक्षण को केवल सरकारी कार्यक्रमों तक सीमित रखने के बजाय इसे जनभागीदारी से जोड़ने की बात कही। उन्होंने जल उत्सव जैसे आयोजनों को व्यापक स्तर पर ले जाने का सुझाव दिया, ताकि पानी बचाने और उसके सही इस्तेमाल को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़े। उनका संदेश साफ़ है कि देश की जल सुरक्षा केवल सरकार की योजनाओं से सुनिश्चित नहीं हो सकती। इसमें स्थानीय प्रशासन, किसान, विशेषज्ञ, उद्योग और आम नागरिकों की भागीदारी भी ज़रूरी होगी।
जल डेटा के प्रबंधन में AI का इस्तेमाल
जल क्षेत्र में उपलब्ध अलग-अलग आँकड़ों को एक जगह लाकर व्यवस्थित तरीके से इस्तेमाल करने पर भी प्रधानमंत्री ने ज़ोर दिया। अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाले जल संबंधी डेटा को एक समान प्रारूप में इकट्ठा करने और उसका बेहतर विश्लेषण करने की ज़रूरत बताई गई। इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI जैसी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाने का सुझाव दिया गया। बेहतर डेटा और उसके विश्लेषण से जल उपलब्धता, मांग और भविष्य की ज़रूरतों को समझकर योजनाएँ बनाने में मदद मिल सकती है।
जल शिखर सम्मेलन के फैसलों की लगातार समीक्षा
प्रधानमंत्री ने कहा कि जल शिखर सम्मेलन को केवल एक बैठक या चर्चा तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। सम्मेलन में लिए गए फैसलों पर समयबद्ध तरीके से काम हो और उनकी लगातार समीक्षा की जाए, ताकि योजनाओं का वास्तविक असर ज़मीन पर दिखाई दे। वहीं, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल ने सम्मेलन के चार प्रमुख लक्ष्यों पर ज़ोर दिया। इनमें जल ढाँचा परियोजनाओं को तेज़ी से पूरा करना, जल संरक्षण को लगातार चलने वाला जन आंदोलन बनाना, पेयजल स्रोतों की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करना और ग्रामीण पेयजल योजनाओं के संचालन व रखरखाव को मजबूत करना शामिल है।
सरकार का फोकस पानी को सिर्फ़ एक संसाधन के रूप में देखने के बजाय उसके संरक्षण, दोबारा इस्तेमाल, बेहतर डेटा प्रबंधन और तकनीकी समाधान के ज़रिए दीर्घकालिक जल सुरक्षा तैयार करने पर है। इसके लिए केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर लोगों की भागीदारी को भी अहम माना जा रहा है।