महाराष्ट्र में लगेगा 12.7 लाख टन क्षमता का नया प्लांट
देश में यूरिया की बढ़ती मांग और उत्पादन में आई गिरावट के बीच उर्वरक क्षेत्र से एक अहम खबर सामने आई है। किसानों की जरूरतों को पूरा करने और आयात पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड और गेल लिमिटेड ने महाराष्ट्र में गैस आधारित यूरिया प्लांट स्थापित करने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। प्रस्तावित संयंत्र की वार्षिक उत्पादन क्षमता 12.7 लाख टन होगी।
सरकारी आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में देश का यूरिया उत्पादन घटकर 293.26 लाख टन रह गया, जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष में यह 306.67 लाख टन था। दूसरी ओर, घरेलू मांग बढ़ने के कारण पिछले वित्त वर्ष में यूरिया आयात 83 प्रतिशत बढ़कर 103.50 लाख टन पहुँच गया। ऐसे में इस नए प्लांट को देश की उर्वरक आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
देश में यूरिया की बढ़ती मांग बनी चुनौती
भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि प्रधान देशों में से एक है, जहाँ यूरिया सबसे अधिक उपयोग किए जाने वाले रासायनिक उर्वरकों में शामिल है। खेती का रकबा बढ़ने और खाद्यान्न उत्पादन की बढ़ती आवश्यकता के कारण यूरिया की मांग लगातार बढ़ रही है। उत्पादन और मांग के बीच बढ़ते अंतर ने आयात पर निर्भरता भी बढ़ा दी है। आरसीएफ की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, नया गैस आधारित यूरिया संयंत्र महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में स्थापित किया जाएगा। इसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 12.7 लाख टन होगी। संयंत्र को गेल की मुंबई-नागपुर-झारसुगुड़ा प्राकृतिक गैस पाइपलाइन के निकट स्थापित करने की योजना है, ताकि गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
29 जुलाई को दोनों सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने इस परियोजना के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते का उद्देश्य देश में यूरिया उत्पादन क्षमता बढ़ाना और भविष्य की मांग को ध्यान में रखते हुए उर्वरक क्षेत्र को मज़बूत करना है। हालांकि, परियोजना की कुल लागत का खुलासा अभी नहीं किया गया है।
विदर्भ क्षेत्र को क्यों चुना गया?
विदर्भ क्षेत्र के पास गेल की प्राकृतिक गैस पाइपलाइन उपलब्ध है, जिससे संयंत्र को गैस की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी। गैस आधारित यूरिया संयंत्रों के लिए प्राकृतिक गैस सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल होती है, इसलिए इस क्षेत्र का चयन परियोजना के लिए उपयुक्त माना जा रहा है। इस परियोजना को दोनों कंपनियाँ संयुक्त रूप से एक विशेष प्रयोजन इकाई (एसपीवी) बनाकर विकसित करेंगी। यही इकाई संयंत्र के निर्माण, संचालन और अन्य प्रशासनिक कार्यों की जिम्मेदारी संभालेगी।
घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर रहेगा ज़ोर
प्रस्तावित प्लांट शुरू होने के बाद देश में यूरिया उत्पादन क्षमता बढ़ेगी। इससे घरेलू स्तर पर उर्वरकों की उपलब्धता बेहतर हो सकती है और भविष्य में आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। यूरिया आयात में 83 प्रतिशत की बढ़ोतरी। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, पिछले वित्त वर्ष में भारत का यूरिया आयात 83 प्रतिशत बढ़कर 103.50 लाख टन तक पहुँच गया। यह वृद्धि घरेलू उत्पादन में कमी और बढ़ती मांग का संकेत देती है। ऐसे में नए संयंत्र देश की उर्वरक सुरक्षा को मज़बूत करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
नए संयंत्र से किसानों को क्या फायदा होगा?
घरेलू उत्पादन बढ़ता है तो किसानों को समय पर यूरिया उपलब्ध कराने में आसानी होगी। साथ ही, आयात पर निर्भरता कम होने से आपूर्ति व्यवस्था अधिक स्थिर बनने की संभावना है। हालांकि, इसका प्रत्यक्ष लाभ संयंत्र के उत्पादन शुरू होने के बाद ही दिखाई देगा। आरसीएफ देश की प्रमुख उर्वरक कंपनियों में से एक है, जबकि गेल प्राकृतिक गैस क्षेत्र की अग्रणी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी है। दोनों कंपनियों की साझेदारी को उर्वरक उत्पादन और ऊर्जा अवसंरचना को एक साथ जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
आयात पर निर्भरता घटाने की दिशा में बड़ा कदम
देश में बढ़ती यूरिया मांग को देखते हुए उत्पादन क्षमता का विस्तार आवश्यक माना जा रहा है। महाराष्ट्र में प्रस्तावित यह गैस आधारित यूरिया संयंत्र न केवल घरेलू उत्पादन बढ़ाने में मदद करेगा, बल्कि दीर्घकाल में आयात पर निर्भरता कम करने और किसानों तक उर्वरकों की बेहतर उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।