नाइट शिफ्ट और लेट-नाइट डिनर का खतरनाक कनेक्शन! इन बीमारियों का बढ़ सकता है खतरा, रिसर्च में खुलासा
हमारे शरीर में'जैविक घड़ी' (Circadian Clock) नाम की एक आंतरिक प्रक्रिया होती है जो 24 घंटे के चक्र में शरीर की विभिन्न जैविक और व्यवहारिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करती है। यह घड़ी नींद-जागने के चक्र, मेटाबॉलिज्म, हार्मोन स्राव, शरीर के तापमान और पाचन तंत्र जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को दिन और रात के अनुसार संचालित करती है। शरीर की लगभग हर कोशिका में यह जैविक घड़ी मौजूद होती है और सभी अंगों के बीच तालमेल बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इसी जैविक घड़ी को समझने के लिए अमेरिका के यूटी साउथवेस्टर्न मेडिकल सेंटर (UT Southwestern Medical Center) के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की कि क्या गलत समय पर भोजन करने से शरीर की सर्कैडियन क्लॉक में असंतुलन पैदा होता है और क्या यही असंतुलन पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियों का कारण बन सकता है। अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि जब शरीर की जैविक घड़ी गड़बड़ा जाती है, जैसे नाइट शिफ्ट में काम करने, देर रात भोजन करने या बार-बार अलग-अलग टाइम ज़ोन में यात्रा करने के कारण। तो इसका सीधा असर आंतों और पाचन तंत्र पर पड़ सकता है, जिससे कई गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल (पाचन संबंधी) समस्याओं का जोखिम बढ़ जाता है।
आंतों की भी होती है अपनी जैविक घड़ी
पिछले शोधों से यह पता चला था कि हमारी आंतों (इंटेस्टाइन्स) की भी अपनी जैविक लय (Biological Rhythm) होती है, जो भोजन के समय सहित कई कारकों से प्रभावित होती है। हालांकि अब तक के अधिकांश अध्ययन पूरी आंतों के ऊतकों (Intestinal Tissue) पर आधारित थे। वैज्ञानिकों के सामने यह सवाल था कि आंतों में मौजूद विभिन्न प्रकार की कोशिकाएं-जैसे मांसपेशी कोशिकाएं, तंत्रिका कोशिकाएं और प्रतिरक्षा कोशिकाएं-क्या अपनी-अपनी अलग जैविक घड़ी रखती हैं और क्या वे सभी एक ही समय-सारिणी के अनुसार काम करती हैं।
चूहों पर किए गए प्रयोग से मिला जवाब
इस सवाल का जवाब खोजने के लिए वैज्ञानिक यूकी ओबाटा और शिन यामाजाकी ने विशेष रूप से तैयार किए गए चूहों पर अध्ययन किया। इन चूहों को 12 घंटे रोशनी और 12 घंटे अंधेरे वाले नियमित वातावरण में रखा गया था। चूहों की आंतों में मौजूद पांच प्रकार की कोशिकाएं- एंटेरिक न्यूरॉन्स, एंटेरिक ग्लियल कोशिकाएं, ICC (Interstitial Cells of Cajal), स्मूथ मसल कोशिकाएं और मैक्रोफेज कोशिकाएं- उस समय हरे रंग की चमक दिखाती थीं, जब Per2 नामक महत्वपूर्ण बॉडी क्लॉक जीन सक्रिय होता था। हालांकि चूहों को हर समय भोजन उपलब्ध था, लेकिन वे निशाचर जीव होने के कारण अपना लगभग 80 प्रतिशत भोजन रात में ही खाते थे। करीब एक सप्ताह बाद वैज्ञानिकों ने देखा कि सभी प्रकार की कोशिकाएं लगभग एक ही समय पर हरी चमक रही थीं। इससे संकेत मिला कि सभी कोशिकाओं की अपनी-अपनी जैविक घड़ी होने के बावजूद वे आपस में पूरी तरह तालमेल (सिंक) में काम कर रही थीं।
जब खाने का समय बदला गया
इसके बाद वैज्ञानिकों ने प्रयोग में बदलाव करते हुए चूहों को केवल दिन में चार घंटे के लिए भोजन उपलब्ध कराया। इससे उन्हें अपनी सामान्य दिनचर्या के विपरीत समय पर भोजन करना पड़ा। शोधकर्ताओं ने पाया कि अधिकांश कोशिकाओं में Per2 जीन की गतिविधि भोजन के नए समय के अनुसार बदल गई। लेकिन ICC कोशिकाएं बाकी कोशिकाओं से अलग व्यवहार करती दिखीं। उन्होंने अपनी जैविक घड़ी को नए समय के अनुसार ढालने से इनकार कर दिया और कई सप्ताह तक अन्य कोशिकाओं के साथ तालमेल नहीं बैठा सकीं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह शोध?
आज दुनिया भर में लाखों लोग नाइट शिफ्ट में काम करते हैं या नियमित रूप से अलग-अलग टाइम ज़ोन में यात्रा करते हैं। ऐसे लोगों की सर्कैडियन रिदम अक्सर प्रभावित होती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि ICC कोशिकाओं का अन्य कोशिकाओं के साथ तालमेल न बैठा पाना पाचन तंत्र की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। यही कारण हो सकता है कि अनियमित समय पर भोजन करने वाले लोगों में कब्ज, इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम (IBS), इंफ्लेमेटरी बॉवेल डिजीज (IBD) और अन्य पाचन संबंधी समस्याएं अधिक देखी जाती हैं।
भविष्य में इलाज का रास्ता खोल सकता है अध्ययन
यह शोध वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद कर सकता है कि जैविक घड़ी के असंतुलन से जुड़ी पाचन समस्याओं को कैसे रोका जाए। भविष्य में इसके आधार पर ऐसी दवाएं, प्रोबायोटिक्स या आहार संबंधी रणनीतियां विकसित की जा सकती हैं, जो शरीर की विभिन्न कोशिकाओं की जैविक घड़ियों को दोबारा एक तालमेल में ला सकें। विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित समय पर भोजन करना और पर्याप्त नींद लेना न केवल शरीर की जैविक घड़ी को संतुलित रखने में मदद करता है, बल्कि पाचन तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इनपुट: गौरी सारस्वत (इंटर्न)