"सब्सिडी नहीं, बेहतर बाज़ार चाहिए":किसान ने बताया क्यों मंडी व्यवस्था बदलना ज़रूरी, कैसे सीधे ग्राहक तक पहुँचकर बढ़ाई कमाई
किसान दिन-रात मेहनत करके फसल तैयार करता है, लेकिन उसकी कमाई का फ़ैसला अक्सर मंडी में होता है। फसल की कीमत क्या होगी, कितना मुनाफ़ा मिलेगा और किसान की आमदनी कितनी होगी, यह सब बाज़ार तय करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मौजूदा मंडी व्यवस्था वास्तव में किसान के हित में काम कर रही है? गाँव कनेक्शन से बातचीत में उत्तर प्रदेश के प्रगतिशील किसान आलोक वर्मा ने अपने अनुभव साझा किए। वे सालभर लगभग 22 तरह की सब्ज़ियों की खेती करते हैं और मंडी के साथ-साथ सीधे ग्राहकों तक भी अपनी उपज पहुँचाते हैं। उनका मानना है कि यदि किसान बाज़ार को समझ ले और बिचौलियों पर निर्भरता कम करे, तो उसकी आमदनी में बड़ा बदलाव आ सकता है।
किसान की आमदनी बाज़ार तय करता है
आलोक वर्मा का कहना है कि किसान अपनी फसल की कीमत ख़ुद तय नहीं कर पाता। वह कितनी कमाई करेगा, यह पूरी तरह बाज़ार की व्यवस्था पर निर्भर करता है। उनके अनुसार, खेती में सबसे बड़ा जोखिम किसान उठाता है, लेकिन मुनाफ़े का बड़ा हिस्सा व्यापारिक व्यवस्था में चला जाता है। इसलिए किसानों के लिए केवल अच्छी खेती करना ही काफ़ी नहीं, बल्कि बाज़ार को समझना भी उतना ही ज़रूरी है।
माँग के हिसाब से करते हैं खेती
आलोक बताते हैं कि वे खेती शुरू करने से पहले यह देखते हैं कि उनके ग्राहकों की माँग किस चीज़ की है। वे उन्हीं सब्ज़ियों का उत्पादन बढ़ाते हैं, जिनकी नियमित माँग रहती है। उनका कहना है कि हर मौसम में लोगों की पसंद बदलती है। गर्मियों में लौकी, तो सर्दियों में गोभी जैसी सब्ज़ियों की माँग बढ़ जाती है। वर्षों के अनुभव और ग्राहकों के आँकड़ों के आधार पर वे पहले से योजना बनाते हैं, जिससे उन्हें बेहतर दाम मिलते हैं।आलोक वर्मा का मानना है कि सरकार का ज़्यादा ध्यान उर्वरकों और अन्य इनपुट पर सब्सिडी देने पर रहता है, जबकि किसानों की सबसे बड़ी समस्या अपनी उपज को उचित मूल्य पर बेचना है। उनका तर्क है कि यदि सरकार किसानों की उपज के बेहतर विपणन, भंडारण, परिवहन और बाज़ार तक पहुँच पर निवेश करे, तो किसानों को कहीं अधिक लाभ मिल सकता है।
पीएम किसान सम्मान निधि पर भी उठाए सवाल
बातचीत के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना का भी ज़िक्र किया। उनका कहना था कि छह महीने में मिलने वाली ₹2,000 की सहायता से किसानों की आर्थिक स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आता। उनके अनुसार, यदि यही संसाधन किसानों की मार्केटिंग व्यवस्था, बिक्री नेटवर्क और सुविधाजनक कृषि सेवाओं पर लगाए जाएँ, तो किसानों की आय में अधिक प्रभावी सुधार हो सकता है।
"मंडी किसान के पक्ष में काम नहीं करती"
आलोक का कहना है कि मौजूदा मंडी व्यवस्था में किसान अपेक्षाकृत कमज़ोर स्थिति में होता है। उनके मुताबिक़, आढ़ती और नियमित व्यापारी पूरे साल मंडी में सक्रिय रहते हैं, जबकि किसान कुछ दिनों के लिए ही अपनी उपज लेकर पहुँचता है। ऐसे में सौदेबाज़ी की ताक़त व्यापारी के पास ज़्यादा होती है और किसान अक्सर मजबूरी में कम दाम पर अपनी उपज बेच देता है। उनका मानना है कि मंडियों के कई नियम दशकों पुराने हैं और समय के साथ उनमें बदलाव होना चाहिए। वे कहते हैं कि प्रशासन और मंडी प्रबंधन को किसानों से सीधे संवाद करना चाहिए। किसानों को क्या भाव मिला, कितना कमीशन कटा और उन्हें किन समस्याओं का सामना करना पड़ा, इसकी नियमित समीक्षा होनी चाहिए।
सीधे उपभोक्ता तक पहुँचने की बना रहे रणनीति
आलोक भविष्य में 400 से 500 स्थायी ग्राहक तैयार करना चाहते हैं, जिन्हें वे सीधे अपने खेत से ताज़ी और सुरक्षित सब्ज़ियाँ उपलब्ध करा सकें। उनका मानना है कि यदि किसान और उपभोक्ता के बीच की लंबी कमीशन श्रृंखला कम हो जाए, तो दोनों को फ़ायदा होगा। किसान को बेहतर दाम मिलेगा और उपभोक्ता को भरोसेमंद गुणवत्ता वाली उपज।
छोटे किसानों के लिए क्या है सलाह?
आलोक वर्मा का कहना है कि लगातार बँटवारे के कारण किसानों की जोत छोटी होती जा रही है। ऐसे में केवल एक फसल पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। वे किसानों को सलाह देते हैं कि वे विविध फसलें उगाएँ, स्थानीय ग्राहकों का नेटवर्क बनाएँ और जहाँ संभव हो, सीधे उपभोक्ताओं तक अपनी उपज पहुँचाने का प्रयास करें। शुरुआत में मेहनत ज़रूर लगेगी, लेकिन एक बार ग्राहक तैयार हो जाएँ तो आमदनी अधिक स्थिर और बेहतर हो सकती है। उनके मुताबिक़, किसान को केवल उत्पादक नहीं बल्कि बाज़ार की समझ रखने वाला उद्यमी भी बनना होगा। खेती की सफलता अब सिर्फ़ अच्छी पैदावार से नहीं, बल्कि सही बाज़ार तक पहुँच से भी तय होगी।