भारत की मिट्टी से खत्म हो रहा ऑर्गेनिक कार्बन, हर बायोगैस प्लांट में छिपा है इसका समाधान
भारत का बायोगैस सेक्टर इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। केंद्र सरकार की 'सतत' (SATAT) योजना के तहत देश भर में कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) के नए प्लांट्स तेजी से लगाए जा रहे हैं जिन्हें सरकारी कंपनियों (PSUs) का भी पूरा सपोर्ट मिल रहा है। लेकिन इस पूरी क्रांति के बीच एक बहुत बड़े संकट को नजरअंदाज किया जा रहा है। भारत की मिट्टी इस समय 'ऑर्गेनिक कार्बन' (जैविक कार्बन) की भारी कमी से जूझ रही है और इसका सबसे सटीक समाधान देश के हर बायोगैस प्लांट से निकलने वाली जैविक खाद में छुपा हुआ है।
'ऑर्गेनिक रीसाइक्लिंग सिस्टम्स लिमिटेड' (ORSL) के होल-टाइम डायरेक्टर यशस भंड के अनुसार, "हर बायोमेथेनेशन प्लांट से दो मुख्य चीजें निकलती हैं-कंप्रेस्ड बायोगैस और फरमेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर यानी जैविक खाद। कंप्रेस्ड बायोगैस के लिए तो आज मार्केट और सरकार की मजबूत नीतियां मौजूद हैं, लेकिन मिट्टी को बचाने वाले जैविक खाद को अभी तक वह मुकाम नहीं मिल पाया है।"
भारत की मिट्टी पर मंडरा रहा है बड़ा संकट
'इंडियन बायोगैस एसोसिएशन' के हालिया वाइट पेपर के आंकड़ों के मुताबिक, भारत की मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर घटकर मात्र 0.4 प्रतिशत रह गया है जो कि बेहद चिंताजनक और खतरनाक रूप से कम है। सॉयल ऑर्गेनिक कार्बन को मिट्टी की 'सेहत' की तरह देखा जाना चाहिए। जब मिट्टी में कार्बन कम होता है, तो उतनी ही फसल उगाने के लिए किसानों को हर बार पहले से ज्यादा केमिकल फर्टिलाइजर (रासायनिक खाद) का इस्तेमाल करना पड़ता है। इसके अलावा, कार्बन की कमी के कारण मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता भी घटने लगती है। नतीजा यह होता है कि हर नई फसल की कटाई के बाद मिट्टी की क्वालिटी और ज्यादा खराब होती चली जाती है।
केमिकल फर्टिलाइजर और जैविक खाद का तालमेल जरूरी
इस संकट के लिए रासायनिक खादों को पूरी तरह जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। रासायनिक खादों ने दशकों से देश का पेट भरा है और आगे भी फसलों के लिए इनकी जरूरत रहेगी। लेकिन सच यह है कि केमिकल फर्टिलाइजर्स सिर्फ फसलों को पोषण देते हैं, मिट्टी को दोबारा उपजाऊ नहीं बनाते। मिट्टी को नया जीवन देने का असली काम 'फरमेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर' (जैविक खाद) का ही है।
जैविक खाद, रासायनिक खाद का कोई विकल्प नहीं है, बल्कि यह मिट्टी के लिए एक बेहतरीन 'कंडीशनर' और कार्बन का मुख्य जरिया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में किए गए फील्ड ट्रायल्स (खेतों में प्रयोग) से साबित हुआ है कि यदि पारंपरिक रासायनिक खादों के साथ इस जैविक खाद (FOM) का मिलाकर इस्तेमाल किया जाए, तो न केवल फसलों की पैदावार बढ़ती है, बल्कि लंबे समय के लिए मिट्टी की सेहत और उसकी ताकत भी मजबूत होती है।
एक व्यवस्थित बाजार और सरकारी नीतियों की दरकार
इतने सारे फायदों के बावजूद, देश में अभी तक इस जैविक खाद का बाजार पूरी तरह बिखरा हुआ है। वर्तमान में इसके लिए न तो कोई तय क्वालिटी स्टैंडर्ड (गुणवत्ता मानक) है, न ही कोई मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क। चूंकि इस जैविक खाद का असर रासायनिक खादों की तरह तुरंत दिखाई नहीं देता इसलिए अभी बाजार में इसकी मांग भी कमजोर है। 'ऑर्गेनिक रीसाइक्लिंग सिस्टम्स लिमिटेड' का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए भारत सरकार को जैविक इनपुट्स के लिए एक समर्पित नीतिगत ढांचा तैयार करना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे पारंपरिक खादों के लिए 'फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर' काम करता है। अगर सरकार की तरफ से तय क्वालिटी स्टैंडर्ड, सर्टिफिकेशन और किसानों के लिए विशेष प्रोत्साहन जैसी नीतियां बनाई जाएं, तो इस पूरे सेक्टर में भरोसा बढ़ेगा। ठीक वैसे ही जैसे सरकारी नीतियों के सपोर्ट से आज बायोगैस का एक बड़ा मार्केट खड़ा हो गया है।
मिट्टी को दोबारा कार्बन लौटाने की चुनौती
ऑर्गेनिक रीसाइक्लिंग सिस्टम्स लिमिटेड के यशस भंड ने कहा, "हमारे बायोगैस प्लांट्स से गुजरने वाले हर टन गीले कचरे (ऑर्गेनिक वेस्ट) में वो कीमती कार्बन मौजूद होता है जो कभी भारत की मिट्टी का हिस्सा था। जैविक खाद के जरिए हम इसी कार्बन को वापस धरती मां को सौंप सकते हैं। आज हमारे पास प्लांट्स हैं, साइंस है और बेहतरीन प्रॉडक्ट भी तैयार है; कमी है तो बस एक मजबूत मार्केट और इसे बनाने के लिए मजबूत नीतिगत इच्छाशक्ति की।"