लीची से मखाना तक… बिहार के कृषि वैज्ञानिक 'डॉ. गोपालजी त्रिवेदी' ने बदल दी हजारों किसानों की तकदीर, पद्मश्री से होंगे सम्मानित

Preeti Nahar | May 18, 2026, 15:47 IST
बिहार की खेती को नई दिशा देने वाले एक ऐसे कृषि वैज्ञानिक को देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान से नवाजा जाएगा , जिन्होंने सिर्फ खेती नहीं बदली, बल्कि हजारों किसानों की जिंदगी बदल दी। लीची के पुराने बागानों को फिर से हरा-भरा करना हो, जलजमाव वाली जमीन को मखाना उत्पादन का केंद्र बनाना हो या किसानों को आधुनिक खेती से जोड़ना डॉ. गोपालजी त्रिवेदी का योगदान कई दशकों तक फैला हुआ है। आखिर कौन हैं गोपालजी त्रिवेदी और क्यों उन्हें बिहार की कृषि क्रांति का बड़ा चेहरा माना जाता है, पढ़िए यह खास रिपोर्ट।
बिहार के कृषि वैज्ञानिक गोपाल जी त्रिवेदी

मुजफ्फरपुर की लीची आज सिर्फ स्वाद के लिए नहीं, बल्कि बिहार की पहचान के तौर पर भी जानी जाती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस पहचान को मजबूत करने के पीछे एक ऐसे वैज्ञानिक का बड़ा योगदान है, जिन्होंने सूखते बागानों में फिर से जान फूंक दी। जलभराव वाली जमीन, जिसे कभी खेती के लायक नहीं माना जाता था, वहाँ भी उन्होंने मखाना और सिंघाड़े की खेती से किसानों की तकदीर बदल दी। अब इन्हीं योगदानों के लिए कृषि वैज्ञानिक डॉ. गोपालजी त्रिवेदी को पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा।



कौन हैं डॉ. गोपालजी त्रिवेदी?



सदैव समर्पित कृषि वैज्ञानिक डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी का जीवन संघर्ष, मेहनत और किसानों के प्रति समर्पण की मिसाल है। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मतलूपुर गाँव में एक कृषि परिवार में जन्मे डॉ. त्रिवेदी बचपन से ही मेधावी छात्र थे। लेकिन दसवीं कक्षा के दौरान पिता के निधन के बाद आर्थिक संकट इतना गहरा गया कि उन्हें पढ़ाई छोड़ खेती का काम संभालना पड़ा। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनकी मां और शिक्षकों ने उनका हौसला बढ़ाया। एक पोस्टकार्ड पर आवेदन लिखकर उन्होंने पूसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया, जहाँ उन्हें छात्रवृत्ति भी मिली। आगे चलकर उन्होंने कृषि विस्तार को अपनी पीएचडी का विषय बनाया और प्रोफेसर, निदेशक तथा कुलपति जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया।



लीची खेती में कैसे लाए क्रांति?

Image credit : Gaon Connection Network


डॉ. त्रिवेदी को लीची के पुराने और कमजोर बागानों में “री-जुवनेशन कैनोपी मैनेजमेंट” तकनीक लागू करने का श्रेय दिया जाता है। इस तकनीक के जरिए पुराने पेड़ों की कटाई-छंटाई और वैज्ञानिक देखभाल कर उनकी उत्पादकता बढ़ाई गई। इस बदलाव का सबसे बड़ा असर मुजफ्फरपुर और आसपास के लीची उत्पादक इलाकों में देखने को मिला, जहाँ किसानों की आय में बड़ा इजाफा हुआ। बिहार देश के कुल लीची उत्पादन का बड़ा हिस्सा देता है और मुजफ्फरपुर इसकी सबसे बड़ी पहचान माना जाता है।



गाँव लौटकर बने किसान मित्र और गाँव पुरुष



एक वैज्ञानिक के रूप में डॉ. त्रिवेदी ने हमेशा खेती को आसान और किसानों को सशक्त बनाने की दिशा में काम किया। सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने आराम का रास्ता नहीं चुना, बल्कि अपने गाँव लौटकर किसानों के बीच रहकर उनकी समस्याओं का समाधान करना शुरू किया। धीरे-धीरे किसानों का विश्वास जीतकर वे “किसान मित्र” और “गाँव पुरुष” के रूप में पहचान बनाने लगे। उन्होंने मुजफ्फरपुर में लीची बागानों में कैनोपी मैनेजमेंट तकनीक लागू कर उत्पादन बढ़ाया और जलजमाव वाले क्षेत्रों में मछली पालन, मखाना और सिंघाड़ा आधारित खेती को बढ़ावा देकर किसानों की आय में बड़ा बदलाव लाया।



जलजमाव वाली जमीन को बनाया कमाई का जरिया



उत्तर बिहार के कई इलाके हर साल बाढ़ और जलजमाव की समस्या से प्रभावित रहते हैं। जहाँ किसान पारंपरिक खेती नहीं कर पाते थे, वहाँ डॉ. त्रिवेदी ने मखाना और सिंघाड़े की वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दिया। धीरे-धीरे यह खेती किसानों के लिए लाभ का बड़ा जरिया बन गई। आज बिहार का मखाना देश ही नहीं, विदेशों तक अपनी पहचान बना चुका है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बदलाव के पीछे डॉ. त्रिवेदी जैसे वैज्ञानिकों की सोच और मेहनत का बड़ा योगदान है।



शीतकालीन मक्का खेती को भी दिया बढ़ावा

डॉ. त्रिवेदी ने बिहार में शीतकालीन मक्का (Winter Maize) की खेती को बढ़ावा देने में भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने किसानों को नई तकनीक और बेहतर बीजों के उपयोग के लिए प्रेरित किया। इसी का परिणाम है कि बिहार आज देश के प्रमुख मक्का उत्पादक राज्यों में गिना जाता है।



किसानों के बीच रहकर किया काम

डॉ. त्रिवेदी सिर्फ प्रयोगशाला या विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने गाँवों में जाकर किसानों के साथ काम किया और उनकी समस्याओं का व्यावहारिक समाधान खोजा। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे “बिहार एक्वाकल्चर बेस्ड एग्रीकल्चर (BABA)” संस्था के माध्यम से मछली पालन, पशुपालन और समेकित खेती को बढ़ावा दे रहे हैं। उनको मिलने वाला पद्मश्री सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बिहार की कृषि क्षमता और किसानों की मेहनत की पहचान के रूप में भी देखा जा रहा है।





डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी ने शीतकालीन मक्का की वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा देकर उत्पादन को कई गुना तक बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रयासों ने खेती को विज्ञान से जोड़ा और किसानों को बेहतर मुनाफा और सम्मान दिलाया। कृषि क्षेत्र में उनका योगदान केवल तकनीक तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने यह साबित किया कि जमीन से जुड़े रहकर ही वास्तविक बदलाव लाया जा सकता है। डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी कृषि जगत में निस्वार्थ सेवा, ज्ञान और कर्मयोग की प्रेरणा बन चुके थे, हालांकि प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी का मुजफ्फरपुर में साल 2026 के मई माह में निधन हो गया, जिससे शिक्षा और कृषि जगत में शोक की लहर दौड़ी, लेकिन खेती किसानी से संबंधति उनके कामों को सदैव याद किया जाएगा।


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