BUDGET 2026: ग्राम पंचायतों को मिला उम्मीद से कम, सिर्फ़ ₹5.16 करोड़ बढ़ी राशि
देश की लगभग 2.5 लाख ग्राम पंचायतें भारत के विकास की सबसे अहम कड़ी हैं। लेकिन इन ग्राम पंचायतों के खातें में उतना पैसा नहीं आया जितने की उन्हें उम्मीद थी। पिछली बार की तुलना में इस बार पंचायती राज का बजट मात्र ₹5.16 करोड़ ही बढ़ा है।
केंद्र सरकार ने 2026–27 के लिए पंचायती राज मंत्रालय को ₹1,190.16 करोड़ आवंटित किए हैं। इसमें से ₹1,186.88 करोड़ रोज़मर्रा के खर्च (राजस्व मद) के लिए हैं, जबकि सिर्फ ₹3.28 करोड़ पूंजीगत खर्च के लिए रखे गए हैं। पिछले साल के बजट अनुमान (2025–26) में यह राशि ₹1,185 करोड़ थी। इस साल बढ़ोतरी सिर्फ ₹5.16 करोड़, लगभग आधा प्रतिशत से भी कम है। जो ग्राम पंचायतों के विकास के लिए उम्मीद से काफ़ी कम है।गाँव कनेक्शन ने अलग-अलग ग्राम प्रधानों से बात की जिसमें सभी ने बजट बढ़ने की बात कही।
उत्तर प्रदेश के अकबरपुर बेनीगंज के ग्राम प्रधान निशांत ने साफ शब्दों में कहा, "सरकार गाँवों के क्षेत्रों पर भी थोड़ा ध्यान दे और बजट बढ़ाए। हमारे क्षेत्रों के लिए बजट बहुत कम आता है, जिससे कई काम पिछड़ रहे हैं।" वहीं बुलढाणा, महाराष्ट्र के खतखेड़ गांव की ग्राम प्रधान रामा पाटिल थरकर ने गाँव कनेक्शन से बताया कि,"अभी लगभग ₹410 प्रति व्यक्ति के हिसाब से आवंटन आता है। इतने कम पैसे में गाँव का विकास कैसे होगा? अगर इस बजट को दोगुना कर दिया जाए, तभी गाँव में कुछ बदलाव दिख सकता है।"
ये भी पढ़ें: Budget 2026 : बजट कटौती, मनरेगा, आवास योजनाओं पर क्या हैं ग्राम प्रधानों की उम्मीदें?
वहीं पंचायतों को दिए जाने वाले बजट पर भारत सरकार के पंचायती राज के पूर्व सचिव सुनील कुमार के अनुसार, पंचायतों की सबसे बड़ी जरूरत है कि उन्हें दिया जाने वाला फंड 'अनटाइड' यानी बिना किसी शर्त का हो। उन्होंने समझाया कि 15वें केंद्रीय वित्त आयोग ने जो 'टाइड' यानी शर्तों वाला अनुदान देने का फैसला किया था, उससे पंचायतों की स्वायत्तता गंभीर रूप से प्रभावित हुई।
अगर पिछले साल के संशोधित अनुमान से तुलना करें, तो तस्वीर थोड़ी बेहतर दिखती है। 2025–26 में संशोधित बजट घटकर ₹965.96 करोड़ रह गया था। उस हिसाब से इस साल करीब ₹224 करोड़ ज्यादा दिखाए गए हैं। लेकिन यह बढ़ोतरी नई पहल से ज्यादा, पिछले साल की कटौती की भरपाई जैसी लगती है।
सबसे बड़ा बदलाव बजट की बनावट में दिखता है क्योंकि सरकार ने इस बार पूंजीगत खर्च में भारी कटौती की है। पिछले साल जहां इस मद में ₹14 करोड़ से ज्यादा थे, वहीं इस बार यह घटकर सिर्फ ₹3.28 करोड़ रह गया है। पूंजीगत खर्च वही होता है जिससे पंचायत भवन, डिजिटल सिस्टम, प्रशिक्षण केंद्र और स्थायी ढांचा बनता है। ऐसे में इस कटौती का सीधा असर गांवों में बुनियादी सुविधाओं पर पड़ सकता है।
हालांकि सरकार का फोकस राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (RGSA) पर बना हुआ है। इस योजना के लिए 2026–27 में लगभग ₹1,142 करोड़ रखे गए हैं, जो पिछले साल से करीब 7% ज्यादा है। RGSA के तहत पंचायत प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण, ई-पंचायत प्रणाली और बेहतर प्रशासन पर काम किया जाता है। यह एक सकारात्मक कदम है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ प्रशिक्षण से पंचायतें मजबूत होंगी, जब उनके पास काम करने के लिए पक्का ढांचा ही न हो?
पिछले कुछ वर्षों में पंचायतों की जिम्मेदारियां लगातार बढ़ी हैं। जल जीवन मिशन, स्वच्छता अभियान, स्थानीय विकास योजनाएं और सामाजिक योजनाओं की निगरानी सब कुछ पंचायतों के कंधों पर है। इन कामों के लिए सिर्फ मीटिंग और ट्रेनिंग नहीं, बल्कि संसाधन, भवन और तकनीक भी चाहिए। यह बजट पंचायतों को चलाने के लिए तो मदद करता है, लेकिन उन्हें आत्मनिर्भर और मजबूत बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। रोज़मर्रा का खर्च निकल जाएगा, लेकिन लंबे समय का विकास धीमा पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, पंचायती राज मंत्रालय का बजट 2026–27 न ज्यादा निराश करता है और न ज्यादा उम्मीद जगाता है। बजट में सरकार ने खर्च बढ़ाने से ज्यादा उसे सीमित रखने का रास्ता चुना है। अब असली तस्वीर तब साफ होगी, जब देखा जाएगा कि साल के अंत तक सरकार वास्तव में पंचायतों पर कितना खर्च करती है, क्योंकि मजबूत लोकतंत्र की नींव आज भी गांवों से ही शुरू होती है।