Budget 2026 : बजट कटौती, मनरेगा, आवास योजनाओं पर क्या हैं ग्राम प्रधानों की उम्मीदें?
Manvendra Singh | Jan 22, 2026, 18:57 IST
01 फरवरी 2026 को पेश होने वाले केंद्रीय बजट से देश भर की ग्राम पंचायतों को काफी उम्मीदें हैं। 16वें केंद्रीय वित्त आयोग की रिपोर्ट पहले ही सौंपी जा चुकी है और अब गांवों के विकास के लिए काम करने वाले ग्राम प्रधान सरकार से अपनी मांगें रख रहे हैं। गाँव कनेक्शन ने देश की अलग-अलग ग्राम पंचायतों के ग्राम प्रधानों से बात कर जाना कि उनकी आने वाले बजट से क्या उम्मीदें हैं?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस बार 9वां बजट पेश करेंगी। 16वें वित्त आयोग के रिपोर्ट सौंपने के बाद 01 फरवरी, 2026 को आने वाले बजट से पंचायतों की उम्मीदें बढ़ गई हैं।
गाँव कनेक्शन ने देश के अलग-अलग राज्यों के ग्राम प्रधानों से बात कर बजट को लेकर उनकी उम्मीदों को जाना। बजट में कटौती, मनरेगा का अटका पैसा, आवास योजनाओं में रुकावट और युवाओं के लिए रोजगार आदि पर ग्राम प्रधानों ने खुल कर अपनी राय रखी।
धरातल पर ग्राम प्रधानों की असली तस्वीर
देश के अलग-अलग कोनों से प्रधानों ने कहा कि पंचायत बजट में बढ़ोतरी जरूरी है। उत्तर प्रदेश के अकबरपुर ज़िले बेनीगंज गाँव के ग्राम प्रधान निशांत ने साफ कहा, "सरकार गाँवों के क्षेत्रों पर भी थोड़ा ध्यान दे और बजट बढ़ाए। हमारे क्षेत्रों के लिए बजट बहुत कम आता है, जिससे कई काम पिछड़ रहे हैं।"
पिछले 10 साल से ग्राम प्रधान निशांत ने बताया, हालात और बदतर हुए हैं। उन्होंने कहा, "बजट पिछले 5 साल में बढ़ा नहीं है, बल्कि घटा है। शायद सरकार के पास पैसे की कमी हो, इस वजह से पंचायत का बजट घटाया गया है।"
उन्होंने गिनाया कि इंटरलॉकिंग के काम, नाली निर्माण, स्कूलों में बच्चों के लिए झूले लगवाना, लाइब्रेरी बनवाना और गांवों में ओपन जिम की सुविधा - ये सब काम पैसों की कमी से रुके पड़े हैं।
2011 की जनगणना का बोझ
उन्नाव के भगवंतनगर ज़िले के दुवा गाँव, उत्तर प्रदेश के ग्राम प्रधान अजय ने एक बहुत ही अहम मुद्दा उठाते हुए कहा, "पंचायत बजट दरअसल जनगणना के हिसाब से आता है। अभी तक नई जनगणना नहीं हुई है, इसलिए हम पुरानी जनगणना के आधार पर मिलने वाले बजट पर ही काम कर रहे हैं, जबकि जनसंख्या बढ़ चुकी है।"
अजय ने सुझाव दिया, "विकास कार्यों को प्रभावी ढंग से करने और सभी की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए, बजट को कुछ प्रतिशत बढ़ाकर दिया जाना चाहिए। जनगणना फाइनल होने से पहले ही जनसंख्या वृद्धि का कोई फॉर्मूला लगाकर बजट बढ़ा दिया जाए।"
राजस्थान के टोंक ज़िले अन्वा गाँव के ग्राम प्रधान दिव्यांश ने भी इस मुद्दे को और मजबूती दी। उन्होंने कहा, "कोरोना के बाद हमने देखा है कि गाँवों की जनसंख्या फिर से बढ़ने लगी है क्योंकि बहुत से लोग शहरों से वापस गाँवों में शिफ्ट हो गए हैं। उनके साथ रोजगार की समस्या है।"
पचायतों को चाहिए पूरी आजादी
पंचायत फंड को लेकर विशेषज्ञों की भी प्रतिक्रिया आयी है जहां उन्होंने पंचायतों को विकास कार्यों और अपने मुद्दों के चुनाव के लिए आज़ादी की बात की है। भारत सरकार में पंचायतीराज विभाग के पूर्व सचिव सुनील कुमार के अनुसार, पंचायतों की सबसे बड़ी जरूरत है कि उन्हें दिया जाने वाला फंड 'अनटाइड' यानी बिना किसी शर्त का हो। उन्होंने समझाया कि 15वें केंद्रीय वित्त आयोग ने जो 'टाइड' यानी शर्तों वाला अनुदान देने का फैसला किया था, उससे पंचायतों की स्वायत्तता गंभीर रूप से प्रभावित हुई।
सुनील कुमार ने कहा कि फंड को 'अनटाइड' करने से पंचायतों को 'स्थानीय सरकार' के रूप में पहचान मिलेगी। इससे वे अपनी प्राथमिकताएं खुद तय कर सकेंगी और उसी हिसाब से पैसा खर्च कर पाएंगी। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि पंचायतों को वित्त आयोग से मिले धन का उपयोग राजस्व व्यय के लिए भी करने की अनुमति मिलनी चाहिए।
"सार्वजनिक संपत्तियों का उचित संचालन और रखरखाव नई संपत्तियों के निर्माण जितना ही, या शायद उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है," उन्होंने कहा।
सुनील कुमार ने केंद्र सरकार से अपेक्षा जताई कि वे उन पंचायतों को प्रोत्साहित करें जो अपने स्वयं के संसाधन जुटाने में अग्रणी हैं और पूरी तरह से सरकारी फंड पर निर्भर नहीं हैं। सुनील कुमार 'ग्राम ऊर्जा स्वराज अभियान' शुरू करने का भी सुझाव दिया, जिसके तहत ग्राम पंचायतों को नवीकरणीय और स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादक बनने की दिशा में प्रोत्साहित किया जाए।
महाराष्ट्र के गाँव की गंभीर समस्या
बुलढाणा, महाराष्ट्र के खतखेड़ गांव के ग्राम प्रधान रामा पाटिल थरकर ने एक गंभीर मुद्दा उठाते हुए बताया, "हमारा जिला 'आत्महत्या ग्रस्त' घोषित है। साल भर में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्याएँ इसी बुलढाणा जिले में होती हैं। यह बहुत दुर्गम भाग है, विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों में स्थिति और भी खराब है।"
रामा पाटिल ने बजट की असलियत बयान करते हुए कहा, "अभी लगभग ₹410 प्रति व्यक्ति के हिसाब से आवंटन आता है। इतने कम पैसे में गाँव का विकास कैसे होगा? ऊपर से यह बजट अलग-अलग 'हेड्स' में बँटा होता है- जैसे 15% महिलाओं के लिए, 20% अनुसूचित जाति के लिए। जब पैसा टुकड़ों में बँट जाता है, तो कोई बड़ा या ठोस काम नहीं हो पाता।"
उन्होंने मांग करते हुए कहा, "अगर इस बजट को दोगुना कर दिया जाए, तभी गाँव में कुछ बदलाव दिख सकता है। अगर आप पश्चिम महाराष्ट्र या अन्य विकसित राज्यों से तुलना करें, तो हमारा विदर्भ क्षेत्र बहुत पीछे है।"
रामा पाटिल ने किसानों की दुर्दशा का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, "हम सब यहाँ खेती करने वाले लोग हैं, लेकिन यहाँ किसान खुश नहीं है। फसल का जो उचित भाव मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता। जब किसान ही खुशहाल नहीं होगा, तो मजदूर कैसे सुखी रहेंगे?"
उन्होंने रोजगार के संकट की ओर इशारा करते हुए कहा, "हमारे क्षेत्र में इंडस्ट्रीज आने चाहिए ताकि स्थानीय लोगों को कामकाज मिल सके। यहाँ सबसे बड़ा सवाल यही है कि इंडस्ट्रीज आएँ ताकि पलायन रुके और लोगों को रोजगार मिले।"
आवास और स्वच्छता का संकट
उन्नाव के अजय ने आवास योजना में आई दिक्कतों का जिक्र किया। उन्होंने कहा, "पिछले ढाई-तीन साल से ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों के लिए जो आवास आते थे, उनमें काफी सीमाएँ आ गई हैं। अभी तक केवल जाँच ही चल रही है। कई गरीब परिवार ऐसे हैं जिन्हें आवास की बहुत आवश्यकता है।"
स्वच्छता की बात करते हुए अजय ने कहा, "स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों के लिए जो सहायता दी जाती है, उसकी रजिस्ट्रेशन साइट लगभग एक साल से बंद चल रही है। यदि वह चालू होती है, तो लोगों को तुरंत मदद मिल पाती है।"
राजस्थान के दिव्यांश ने आवास योजना में एक और समस्या बताई। उन्होंने कहा, "आवास को लेकर समस्या यह है कि अब सबके राशन कार्ड अलग-अलग हो गए हैं। भले ही बेटा माता-पिता से अलग रह रहा हो, लेकिन अगर एक के पास मकान है तो दूसरे को मिलने में दिक्कत होती है। परिवार के हर पात्र व्यक्ति के पास मकान होना चाहिए।"
मनरेगा का अटका हुआ पैसा
दिव्यांश ने एक बड़ी समस्या की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा, "राजस्थान में जो नई रोजगार गारंटी योजना आई है, उससे पहले मनरेगा चलता था। मनरेगा का हमारा पुराना पेमेंट अटका हुआ है। राजस्थान की कई ग्राम पंचायतों के खातों में अभी तक पैसा नहीं आया है, सरकार को उसे जल्द जारी करना चाहिए।"
रोजगार के दिनों को बढ़ाने की मांग करते हुए दिव्यांश ने कहा, "अभी जो 125 दिन का रोजगार दिया जा रहा है, उसे बढ़ाकर कम से कम 150 से 200 दिन करना चाहिए ताकि लोगों के पास साल भर काम रहे।"
युवाओं के लिए रोजगार और पारदर्शिता
दिव्यांश ने युवाओं के भविष्य की चिंता जताते हुए कहा, "मेरी एक तो युवाओं को लेकर उम्मीदें हैं; उन्हें ज्यादा से ज्यादा नौकरियां मिलनी चाहिए। केंद्र सरकार को भी युवाओं के लिए नए पद सृजित करने चाहिए। सबसे मुख्य मुद्दा यह है कि परीक्षाओं में पूरी पारदर्शिता रहनी चाहिए।"
उन्होंने खेलकूद को बढ़ावा देने की भी मांग की। दिव्यांश ने कहा, "बजट में खेलकूद को ज्यादा प्रोत्साहन मिलना चाहिए। जिस तरह राजस्थान में खेलकूद की गतिविधियां चल रही हैं, वैसा ही पूरे देश में होना चाहिए।"
क्या कहती है जमीनी हकीकत?
उन्नाव के अजय कहते हैं, "बस यही है, बाकी सारी चीजें और पहल चल रही हैं। सरकार काफी अच्छा काम कर रही है और पंचायत भी सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही है। हम गाँवों को डिजिटल बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।"
1 फरवरी को पेश होने वाले बजट में ग्रामीण भारत को कितनी राहत मिलती है, यह देखना बाकी है। पंचायतों की मांग साफ है - अधिक बजट, अधिक स्वतंत्रता और अधिक रोजगार के अवसर। देश के करोड़ों ग्रामीणों की निगाहें अब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की घोषणाओं पर टिकी हैं।
गाँव कनेक्शन ने देश के अलग-अलग राज्यों के ग्राम प्रधानों से बात कर बजट को लेकर उनकी उम्मीदों को जाना। बजट में कटौती, मनरेगा का अटका पैसा, आवास योजनाओं में रुकावट और युवाओं के लिए रोजगार आदि पर ग्राम प्रधानों ने खुल कर अपनी राय रखी।
धरातल पर ग्राम प्रधानों की असली तस्वीर
देश के अलग-अलग कोनों से प्रधानों ने कहा कि पंचायत बजट में बढ़ोतरी जरूरी है। उत्तर प्रदेश के अकबरपुर ज़िले बेनीगंज गाँव के ग्राम प्रधान निशांत ने साफ कहा, "सरकार गाँवों के क्षेत्रों पर भी थोड़ा ध्यान दे और बजट बढ़ाए। हमारे क्षेत्रों के लिए बजट बहुत कम आता है, जिससे कई काम पिछड़ रहे हैं।"
पिछले 10 साल से ग्राम प्रधान निशांत ने बताया, हालात और बदतर हुए हैं। उन्होंने कहा, "बजट पिछले 5 साल में बढ़ा नहीं है, बल्कि घटा है। शायद सरकार के पास पैसे की कमी हो, इस वजह से पंचायत का बजट घटाया गया है।"
उन्होंने गिनाया कि इंटरलॉकिंग के काम, नाली निर्माण, स्कूलों में बच्चों के लिए झूले लगवाना, लाइब्रेरी बनवाना और गांवों में ओपन जिम की सुविधा - ये सब काम पैसों की कमी से रुके पड़े हैं।
2011 की जनगणना का बोझ
उन्नाव के भगवंतनगर ज़िले के दुवा गाँव, उत्तर प्रदेश के ग्राम प्रधान अजय ने एक बहुत ही अहम मुद्दा उठाते हुए कहा, "पंचायत बजट दरअसल जनगणना के हिसाब से आता है। अभी तक नई जनगणना नहीं हुई है, इसलिए हम पुरानी जनगणना के आधार पर मिलने वाले बजट पर ही काम कर रहे हैं, जबकि जनसंख्या बढ़ चुकी है।"
अजय ने सुझाव दिया, "विकास कार्यों को प्रभावी ढंग से करने और सभी की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए, बजट को कुछ प्रतिशत बढ़ाकर दिया जाना चाहिए। जनगणना फाइनल होने से पहले ही जनसंख्या वृद्धि का कोई फॉर्मूला लगाकर बजट बढ़ा दिया जाए।"
राजस्थान के टोंक ज़िले अन्वा गाँव के ग्राम प्रधान दिव्यांश ने भी इस मुद्दे को और मजबूती दी। उन्होंने कहा, "कोरोना के बाद हमने देखा है कि गाँवों की जनसंख्या फिर से बढ़ने लगी है क्योंकि बहुत से लोग शहरों से वापस गाँवों में शिफ्ट हो गए हैं। उनके साथ रोजगार की समस्या है।"
पचायतों को चाहिए पूरी आजादी
पंचायत फंड को लेकर विशेषज्ञों की भी प्रतिक्रिया आयी है जहां उन्होंने पंचायतों को विकास कार्यों और अपने मुद्दों के चुनाव के लिए आज़ादी की बात की है। भारत सरकार में पंचायतीराज विभाग के पूर्व सचिव सुनील कुमार के अनुसार, पंचायतों की सबसे बड़ी जरूरत है कि उन्हें दिया जाने वाला फंड 'अनटाइड' यानी बिना किसी शर्त का हो। उन्होंने समझाया कि 15वें केंद्रीय वित्त आयोग ने जो 'टाइड' यानी शर्तों वाला अनुदान देने का फैसला किया था, उससे पंचायतों की स्वायत्तता गंभीर रूप से प्रभावित हुई।
सुनील कुमार ने कहा कि फंड को 'अनटाइड' करने से पंचायतों को 'स्थानीय सरकार' के रूप में पहचान मिलेगी। इससे वे अपनी प्राथमिकताएं खुद तय कर सकेंगी और उसी हिसाब से पैसा खर्च कर पाएंगी। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि पंचायतों को वित्त आयोग से मिले धन का उपयोग राजस्व व्यय के लिए भी करने की अनुमति मिलनी चाहिए।
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सुनील कुमार ने केंद्र सरकार से अपेक्षा जताई कि वे उन पंचायतों को प्रोत्साहित करें जो अपने स्वयं के संसाधन जुटाने में अग्रणी हैं और पूरी तरह से सरकारी फंड पर निर्भर नहीं हैं। सुनील कुमार 'ग्राम ऊर्जा स्वराज अभियान' शुरू करने का भी सुझाव दिया, जिसके तहत ग्राम पंचायतों को नवीकरणीय और स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादक बनने की दिशा में प्रोत्साहित किया जाए।
महाराष्ट्र के गाँव की गंभीर समस्या
बुलढाणा, महाराष्ट्र के खतखेड़ गांव के ग्राम प्रधान रामा पाटिल थरकर ने एक गंभीर मुद्दा उठाते हुए बताया, "हमारा जिला 'आत्महत्या ग्रस्त' घोषित है। साल भर में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्याएँ इसी बुलढाणा जिले में होती हैं। यह बहुत दुर्गम भाग है, विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों में स्थिति और भी खराब है।"
रामा पाटिल ने बजट की असलियत बयान करते हुए कहा, "अभी लगभग ₹410 प्रति व्यक्ति के हिसाब से आवंटन आता है। इतने कम पैसे में गाँव का विकास कैसे होगा? ऊपर से यह बजट अलग-अलग 'हेड्स' में बँटा होता है- जैसे 15% महिलाओं के लिए, 20% अनुसूचित जाति के लिए। जब पैसा टुकड़ों में बँट जाता है, तो कोई बड़ा या ठोस काम नहीं हो पाता।"
उन्होंने मांग करते हुए कहा, "अगर इस बजट को दोगुना कर दिया जाए, तभी गाँव में कुछ बदलाव दिख सकता है। अगर आप पश्चिम महाराष्ट्र या अन्य विकसित राज्यों से तुलना करें, तो हमारा विदर्भ क्षेत्र बहुत पीछे है।"
रामा पाटिल ने किसानों की दुर्दशा का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, "हम सब यहाँ खेती करने वाले लोग हैं, लेकिन यहाँ किसान खुश नहीं है। फसल का जो उचित भाव मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता। जब किसान ही खुशहाल नहीं होगा, तो मजदूर कैसे सुखी रहेंगे?"
उन्होंने रोजगार के संकट की ओर इशारा करते हुए कहा, "हमारे क्षेत्र में इंडस्ट्रीज आने चाहिए ताकि स्थानीय लोगों को कामकाज मिल सके। यहाँ सबसे बड़ा सवाल यही है कि इंडस्ट्रीज आएँ ताकि पलायन रुके और लोगों को रोजगार मिले।"
आवास और स्वच्छता का संकट
उन्नाव के अजय ने आवास योजना में आई दिक्कतों का जिक्र किया। उन्होंने कहा, "पिछले ढाई-तीन साल से ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों के लिए जो आवास आते थे, उनमें काफी सीमाएँ आ गई हैं। अभी तक केवल जाँच ही चल रही है। कई गरीब परिवार ऐसे हैं जिन्हें आवास की बहुत आवश्यकता है।"
स्वच्छता की बात करते हुए अजय ने कहा, "स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों के लिए जो सहायता दी जाती है, उसकी रजिस्ट्रेशन साइट लगभग एक साल से बंद चल रही है। यदि वह चालू होती है, तो लोगों को तुरंत मदद मिल पाती है।"
राजस्थान के दिव्यांश ने आवास योजना में एक और समस्या बताई। उन्होंने कहा, "आवास को लेकर समस्या यह है कि अब सबके राशन कार्ड अलग-अलग हो गए हैं। भले ही बेटा माता-पिता से अलग रह रहा हो, लेकिन अगर एक के पास मकान है तो दूसरे को मिलने में दिक्कत होती है। परिवार के हर पात्र व्यक्ति के पास मकान होना चाहिए।"
मनरेगा का अटका हुआ पैसा
दिव्यांश ने एक बड़ी समस्या की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा, "राजस्थान में जो नई रोजगार गारंटी योजना आई है, उससे पहले मनरेगा चलता था। मनरेगा का हमारा पुराना पेमेंट अटका हुआ है। राजस्थान की कई ग्राम पंचायतों के खातों में अभी तक पैसा नहीं आया है, सरकार को उसे जल्द जारी करना चाहिए।"
रोजगार के दिनों को बढ़ाने की मांग करते हुए दिव्यांश ने कहा, "अभी जो 125 दिन का रोजगार दिया जा रहा है, उसे बढ़ाकर कम से कम 150 से 200 दिन करना चाहिए ताकि लोगों के पास साल भर काम रहे।"
युवाओं के लिए रोजगार और पारदर्शिता
दिव्यांश ने युवाओं के भविष्य की चिंता जताते हुए कहा, "मेरी एक तो युवाओं को लेकर उम्मीदें हैं; उन्हें ज्यादा से ज्यादा नौकरियां मिलनी चाहिए। केंद्र सरकार को भी युवाओं के लिए नए पद सृजित करने चाहिए। सबसे मुख्य मुद्दा यह है कि परीक्षाओं में पूरी पारदर्शिता रहनी चाहिए।"
उन्होंने खेलकूद को बढ़ावा देने की भी मांग की। दिव्यांश ने कहा, "बजट में खेलकूद को ज्यादा प्रोत्साहन मिलना चाहिए। जिस तरह राजस्थान में खेलकूद की गतिविधियां चल रही हैं, वैसा ही पूरे देश में होना चाहिए।"
क्या कहती है जमीनी हकीकत?
उन्नाव के अजय कहते हैं, "बस यही है, बाकी सारी चीजें और पहल चल रही हैं। सरकार काफी अच्छा काम कर रही है और पंचायत भी सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही है। हम गाँवों को डिजिटल बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।"
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1 फरवरी को पेश होने वाले बजट में ग्रामीण भारत को कितनी राहत मिलती है, यह देखना बाकी है। पंचायतों की मांग साफ है - अधिक बजट, अधिक स्वतंत्रता और अधिक रोजगार के अवसर। देश के करोड़ों ग्रामीणों की निगाहें अब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की घोषणाओं पर टिकी हैं।