फल-सब्ज़ी खरीदते समय कहीं आप अनजाने में ज़्यादा कीटनाशक तो नहीं ले रहे? 70 हजार से ज्यादा नमूनों की जाँच, संसद में सामने आए ये आँकड़े
बाज़ार में फल और सब्ज़ियाँ ख़रीदते समय अक्सर मन में एक सवाल आता है, जो चीज़ हम अपने परिवार को खिला रहे हैं, वह कितनी सुरक्षित है? चमकदार सेब, हरी-भरी सब्ज़ियाँ और ताज़ी दिखने वाली पत्तेदार सब्ज़ियाँ देखकर भी मन में यह डर रहता है कि कहीं इनमें ज़रूरत से ज़्यादा कीटनाशक तो नहीं। अब सरकार की ओर से संसद में दिए गए आँकड़ों ने इस सवाल की कुछ तस्वीर साफ़ की है।
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लोकसभा में बताया कि वर्ष 2023-24 से 2025-26 के बीच देशभर में 70,652 नमूनों की जाँच की गई। इनमें से 2,223 नमूनों यानी करीब 3.1% में कीटनाशकों के अवशेष तय अधिकतम सीमा से ज़्यादा मिले। वहीं, 96.9 % नमूने निर्धारित सीमा के भीतर पाए गए। यानी हर फल या सब्ज़ी को ज़हरीला समझने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन जाँच के ये आँकड़े यह ज़रूर बताते हैं कि निगरानी और सावधानी दोनों ज़रूरी हैं।
70 हज़ार से ज़्यादा नमूनों की जाँच
सरकार पिछले कुछ वर्षों से फल, सब्ज़ियों और दूसरे कृषि उत्पादों की गुणवत्ता पर नज़र रख रही है। इसी निगरानी के तहत अलग-अलग जगहों से नमूने लेकर उनकी जाँच की जाती है। जाँच में 2,223 नमूनों में कीटनाशकों के अवशेष भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की तय अधिकतम अवशेष सीमा से ऊपर मिले। यह सीमा इसलिए तय की जाती है ताकि खाद्य पदार्थों में मौजूद कीटनाशक अवशेष सुरक्षित स्तर के भीतर रहें। हालांकि, किसी नमूने में तय सीमा से अधिक अवशेष मिलना यह नहीं बताता कि बाज़ार में मिलने वाली हर सब्ज़ी या फल स्वास्थ्य के लिए ख़तरनाक है। असल चिंता उन मामलों की है, जहाँ तय सीमा का उल्लंघन होता है। इसलिए लगातार जाँच और किसानों को सही मात्रा में कीटनाशक इस्तेमाल करने की जानकारी देना महत्वपूर्ण है।
खेत से थाली तक नज़र रखने की कोशिश
सिर्फ़ नमूने लेकर जाँच करना ही सरकार की रणनीति नहीं है। कृषि उत्पादन और खेतों की गतिविधियों पर भी तकनीक के ज़रिए नज़र रखने की कोशिश की जा रही है। वर्ष 2005 से चल रही निगरानी व्यवस्था में जीपीएस जैसी तकनीक का इस्तेमाल खेतों तक की जानकारी जुटाने के लिए किया जा रहा है। सरकार फसल उत्पादन का सही अनुमान लगाने के लिए डिजिटल सर्वे का भी इस्तेमाल कर रही है। ‘डिजिटल जनरल क्रॉप एस्टिमेशन सर्वे’ अब 23 राज्यों में लागू है। इसके तहत फसल कटाई से जुड़े आँकड़े मोबाइल ऐप और जीपीएस के साथ दर्ज किए जाते हैं। इसका मक़सद सिर्फ़ आँकड़े जुटाना नहीं, बल्कि खेती की वास्तविक स्थिति को बेहतर ढंग से समझना और कृषि व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाना है।
भारत से फल-सब्ज़ियों का निर्यात बढ़ा
भारत में पैदा होने वाले फल और सब्ज़ियाँ अब देश की थाली तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इनकी विदेशों में भी मांग बढ़ रही है। सरकार के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2016-17 में भारत से फल और सब्ज़ियों का निर्यात करीब 2.45 अरब डॉलर था। वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर करीब 3.93 अरब डॉलर हो गया। हालांकि, इसी दौरान इनका आयात भी बढ़ा है। घरेलू मांग बढ़ने के कारण फल और सब्ज़ियों का आयात 1.78 अरब डॉलर से बढ़कर 3.82 अरब डॉलर तक पहुँच गया। एक तरफ़ भारतीय कृषि उत्पादों की विदेशों में मांग बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ़ देश के भीतर भी खपत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा पर ध्यान देना और भी ज़रूरी हो जाता है।
खाद्य तेल और रबर के लिए भी सरकार की तैयारी
सरकार ने खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए ऑयल पाम की खेती को बढ़ावा देने पर भी ज़ोर दिया है। राष्ट्रीय मिशन के तहत अब तक करीब 2.98 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ऑयल पाम की खेती शुरू हो चुकी है। इसका उत्पादन आने वाले चार-पाँच वर्षों में बढ़ने की उम्मीद है। वहीं, रबर के मामले में वर्ष 2025-26 में भारत ने करीब 9.05 लाख टन उत्पादन किया, लेकिन घरेलू ज़रूरत पूरी करने के लिए 4.59 लाख टन रबर का आयात भी करना पड़ा। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बदलाव का असर इसकी कीमत पर भी दिखाई दिया और औसत कीमत करीब 197 रुपये से बढ़कर 253 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुँच गई।
डर नहीं, जागरूकता ज़रूरी
फल और सब्ज़ियों में कीटनाशकों की बात सामने आते ही आम उपभोक्ता के मन में डर पैदा होना स्वाभाविक है। लेकिन उपलब्ध आँकड़ों को पूरी तस्वीर के साथ देखना ज़रूरी है। तीन वर्षों में जाँचे गए 70,652 नमूनों में 96.9% नमूने तय सीमा के भीतर पाए गए। सरकार का ज़ोर अब सुरक्षित खेती, एकीकृत कीट प्रबंधन यानी आईपीएम, डिजिटल निगरानी और कृषि उत्पादों की नियमित जाँच पर है। यानी लक्ष्य सिर्फ़ कीटनाशकों का इस्तेमाल रोकना नहीं, बल्कि उनका ज़िम्मेदारी से इस्तेमाल कराना और खेती से लेकर बाज़ार तक सुरक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाना है।