खेती से थाली तक पहुँचा प्लास्टिक: गेहूं और टमाटर जैसे पौधों में घुसे माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक, फसल और खाद्य सुरक्षा पर आई रिपोर्ट
Wheat Tomato Microplastic Research: खेती की मिट्टी में बढ़ता प्लास्टिक प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरणीय समस्या नहीं रहा, बल्कि सीधे हमारी खाद्य सुरक्षा और सेहत से जुड़ा खतरा बनता जा रहा है। हालिया वैज्ञानिक अध्ययनों से यह सामने आया है कि माइक्रो और नैनोप्लास्टिक जैसे सूक्ष्म कण गेहूं और टमाटर जैसी रोजमर्रा की फसलों के भीतर तक पहुंच रहे हैं और उनकी वृद्धि, जड़ों के विकास और पोषण प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं।
इस शोध में पाया गया है कि माइक्रोप्लास्टिक (MPs) और नैनोप्लास्टिक (NPs) न केवल मिट्टी में मौजूद रहते हैं, बल्कि पौधों की जड़ों के जरिए उनके अंदर प्रवेश कर जाते हैं और उनके विकास को प्रभावित करते हैं।यह संकेत देता है कि प्लास्टिक अब मिट्टी से होते हुए खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर रहा है, जो आने वाले समय में मानव स्वास्थ्य और कृषि व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
क्या कहती है स्टडी?
Griffith University के शोधकर्ताओं द्वारा की गई इस स्टडी में कृषि परिस्थितियों के अनुरूप माइक्रो और नैनोप्लास्टिक के प्रभावों का अध्ययन किया गया। इस शोध का नेतृत्व Dr Shima Ziajahromi ने किया। इस अध्ययन में गेहूं और टमाटर के पौधों पर माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक के प्रभावों को देखा गया। शोध में पाया गया कि माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी से पौधों की वृद्धि धीमी हो गई और उनमें क्लोरोफिल की मात्रा भी कम हो गई, जिससे पौधों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता प्रभावित होती है।
क्यों खास है यह शोध?
इस स्टडी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप प्रयोग किए गए। पहले के कई शोधों में बहुत अधिक मात्रा में या नए (pristine) प्लास्टिक का उपयोग किया जाता था, जबकि इस अध्ययन में पुराने (aged) प्लास्टिक, वास्तविक आकार और प्रकार और खेतों में पाए जाने वाले स्तर का उपयोग किया गया। इससे यह शोध अधिक व्यावहारिक और भरोसेमंद माना जा रहा है।
कैसे पौधों में पहुंच रहे हैं प्लास्टिक कण?
शोध के दौरान यह पाया गया कि माइक्रोप्लास्टिक कण पौधों की जड़ों के आसपास जमा हो जाते हैं और वहीं फंस जाते हैं। खासतौर पर फाइबर (रेशेदार) आकार के प्लास्टिक, जो अक्सर सिंथेटिक कपड़ों से आते हैं, सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। वहीं नैनोप्लास्टिक कण इतने छोटे होते हैं कि वे जड़ों के जरिए पौधों के अंदर प्रवेश कर जाते हैं और धीरे-धीरे तनों और पत्तियों तक पहुंच जाते हैं। इसका मतलब है कि ये कण खाद्य फसलों के खाने योग्य हिस्सों तक भी पहुंच सकते हैं।
फसल उत्पादन पर क्या असर पड़ा
इस स्टडी में स्पष्ट हुआ कि-
माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी में पौधों की लंबाई और बायोमास (कुल वृद्धि) कम हो गई।
क्लोरोफिल की कमी के कारण पौधों की ऊर्जा उत्पादन क्षमता घट गई।
टमाटर के पौधों पर इसका असर ज्यादा गंभीर देखा गया, खासकर जब फाइबर आधारित प्लास्टिक मौजूद थे। इससे यह संकेत मिलता है कि भविष्य में फसल उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
माइक्रो और नैनोप्लास्टिक का संयुक्त असर
शोध में यह भी सामने आया कि जब माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक एक साथ मौजूद होते हैं, तो उनका असर और ज्यादा खतरनाक हो जाता है। इसे वैज्ञानिक “synergistic effect” कहते हैं, यानी दोनों मिलकर ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। यह स्थिति वास्तविक कृषि परिस्थितियों में ज्यादा आम हो सकती है, क्योंकि खेतों में अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक कण एक साथ मौजूद रहते हैं।
खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य पर खतरा
सबसे बड़ी चिंता यह है कि नैनोप्लास्टिक पौधों के अंदर जाकर पत्तियों तक पहुंच सकते हैं। इसका मतलब है कि ये कण खाद्य श्रृंखला (food chain) में प्रवेश कर सकते हैं और अंततः मानव शरीर तक पहुंच सकते हैं। यह स्थिति भविष्य में, खाद्य सुरक्षा, मानव स्वास्थ्य और पोषण गुणवत्ता पर गंभीर असर डाल सकती है।
क्या हमारी थाली तक पहुंच चुका है प्लास्टिक?
वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर अभी से प्लास्टिक प्रदूषण को नहीं रोका गया, तो इसका असर सीधे हमारी सेहत पर पड़ सकता है। इसलिए जरूरी है कि प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम किया जाए, बेहतर तरीके से उसका प्रबंधन किया जाए और इस पर सख्त नियम बनाए जाएं, ताकि हमारे भोजन और स्वास्थ्य को सुरक्षित रखा जा सके।
दुनिया के कई देशों जैसे चीन, अमेरिका और जर्मनी में हुए एक अन्य अध्ययन में भी यह पाया गया है कि माइक्रोप्लास्टिक पौधों की प्रकाश संश्लेषण (खुद खाना बनाने की प्रक्रिया) की क्षमता को करीब 12 फीसदी तक कम कर सकता है। इसका मतलब है कि पौधे ठीक से विकसित नहीं हो पाते।
पहले के शोध भी इस खतरे को लेकर चेतावनी दे चुके हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर यही स्थिति जारी रही, तो अगले 25 वर्षों में मक्का, धान और गेहूं जैसी मुख्य फसलों की पैदावार में 4 से 13.5 फीसदी तक की कमी आ सकती है। इसका सीधा मतलब है कि हर साल करीब 36 करोड़ मीट्रिक टन अनाज का नुकसान हो सकता है, जो दुनिया की खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
क्या हो सकते हैं समाधान?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए कृषि में प्लास्टिक के उपयोग को कम करना होगा, बेहतर कचरा प्रबंधन और रीसाइक्लिंग सिस्टम अपनाना होगा और इस विषय पर सख्त नीतियां (regulations) बनानी होंगी। इसके अलावा किसानों और नीति निर्माताओं को भी इस खतरे के प्रति जागरूक होना जरूरी है।