प्रकृति के प्रहरी: 'जंगल मैन' से लेकर 'लेडी टार्जन' तक, मिलिए पर्यावरण को नया जीवन देने वाले इन 5 अनोखे नायकों से

Umang | Jun 05, 2026, 19:29 IST
विश्व पर्यावरण दिवस पर पढ़िए भारत के पांच ऐसे पर्यावरण योद्धाओं की प्रेरक कहानियां जिन्होंने अपने प्रयासों से प्रकृति संरक्षण की मिसाल कायम की। असम के जादव पायेंग ने जंगल खड़ा किया, उत्तराखंड की मलिका विर्दी ने जल और जंगल बचाए, झारखंड की जमुना टुडू ने वन माफियाओं से लड़ाई लड़ी, राजस्थान के नरपत सिंह राजपुरोहित ने रेगिस्तान को हरियाली दी और बुंदेलखंड के रामबाबू तिवारी ने जल संरक्षण को जनआंदोलन बना दिया।

पर्यावरण बचाने की बात अक्सर बड़े मंचों, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और सरकारी योजनाओं में सुनने को मिलती है। लेकिन देश के कुछ ऐसे साधारण लोग भी हैं, जिन्होंने बिना किसी बड़े संसाधन, पद या सत्ता के प्रकृति संरक्षण की ऐसी मिसालें कायम की हैं जो किसी आंदोलन से कम नहीं हैं। किसी ने अकेले पूरा जंगल खड़ा कर दिया, किसी ने सूखे तालाबों में फिर से पानी लौटा दिया, तो किसी ने हजारों महिलाओं को जोड़कर जंगलों को कटने से बचाया। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर हम आपको भारत के ऐसे ही 5 प्रेरणादायक पर्यावरण योद्धाओं की कहानी बता रहे हैं जिन्होंने अपने जुनून, संघर्ष और सामूहिक प्रयासों से न केवल प्रकृति को नया जीवन दिया, बल्कि पूरे देश के लिए मिसाल भी पेश की। भारत के गांवों में रहने वाले आम लोग अपने अनोखे और सामूहिक प्रयासों से पर्यावरण को बचाने की अद्भुत मिसाल पेश कर रहे हैं। इन गांवों के लोगों ने न सिर्फ जंगलों को कटने से बचाया है, बल्कि पानी और जमीन को भी नया जीवन दिया है—



1. असम के जादव पायेंग (Jadav Payeng), जिन्हें मिला 'जंगल मैन' का खिताब

• अकेले उगाया पूरा जंगल: जादव पायेंग ने पिछले 40 से अधिक वर्षों में अकेले अपने दम पर ब्रह्मपुत्र नदी के एक बंजर रेतीले टापू पर 1,360 एकड़ (करीब 550 हेक्टेयर) का एक विशाल जंगल खड़ा कर दिया। इस जंगल को उनके निकनेम (उपनाम) 'मोलाई' के नाम पर 'मोलाई फॉरेस्ट' कहा जाता है।


• शुरुआत की वजह: साल 1979 में असम में आई भीषण बाढ़ के बाद, taptee धूप के कारण सैकड़ों सांप और जानवर बिना छांव के तड़पकर मर गए। महज 16 साल के जादव ने तब ठान लिया कि वह इस बंजर जमीन को हरा-भरा बनाएंगे।


• रोज की मेहनत: वे बिना थके रोज उस टापू पर जाते und नए पौधे लगाते थे। आज उनके लगाए जंगल में बाघ, एक सींग वाले गैंडे, हाथी और कई तरह के पक्षी रहते हैं।


• पद्म श्री सम्मान: पर्यावरण संरक्षण के इस अनोखे और ऐतिहासिक काम के लिए भारत सरकार ने उन्हें साल 2015 में देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान 'पद्म श्री' से नवाजा था।


साल 2008 तक सरकार या किसी भी इंसान को इस जंगल के बारे में पता नहीं था। एक दिन वन्यजीव फोटोग्राफर जितु कलिता जंगलों की फोटो लेते हुए वहां पहुंचे और उन्होंने जादव को देखा। उनके जरिए ही दुनिया को इस महान इंसान के बारे में पता चला।



2. मलिका विर्दी - दिल्ली से पहाड़ों का सफर

मलिका, मूल रूप से दिल्ली की रहने वाली थीं और एक कुशल पर्वतारोही (Mountaineer) थीं। लेकिन साल 1992 में उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया और चकाचौंध वाली जिंदगी छोड़कर उत्तराखंड के इस सुदूर पहाड़ी गांव 'सरमोली' में आकर बस गईं।


• एक किसान के रूप में जीवन: उन्होंने वहां की स्थानीय संस्कृति को अपनाया, खुद खेती करना शुरू किया और ग्रामीण जीवन का हिस्सा बन गईं।


• सरपंच पद का इतिहास: उनके सेवा भाव को देखकर ग्रामीणों ने उन्हें साल 2003 में पहली बार 'वन पंचायत' का सरपंच चुना। इसके बाद वे 2018 में दोबारा सरपंच बनीं। वर्तमान में वे मुनस्यारी रेंज की 209 वन पंचायतों की क्षेत्रीय सलाहकार समिति की अध्यक्ष भी हैं।


• आंदोलनों की शुरुआत: 'माटी संगठन': सरपंच बनने से पहले मलिका जी ने देखा कि पहाड़ी महिलाओं को दो बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता था-घरेलू हिंसा/शराबखोरी और जंगलों पर उनका कोई कानूनी हक न होना। उन्होंने स्थानीय महिलाओं को एकजुट करके 'माटी संगठन' की स्थापना की। इस संगठन ने महिलाओं को अपनी आवाज उठाना सिखाया और यह तय किया कि चूंकि महिलाएं ही चारा और ईंधन के लिए सबसे ज्यादा जंगल जाती हैं, इसलिए जंगल को बचाने की मुख्य कमान भी उन्हीं के हाथ में होनी चाहिए।



वन पंचायत का अनोखा कार्य मॉडल (Working Model)


मलिका विर्दी के नेतृत्व में वन पंचायत ने पर्यावरण बचाने के लिए कई ऐतिहासिक कदम उठाए, जो आज पूरी दुनिया के लिए एक केस स्टडी बन चुके हैं:


• मेसर कुंड (Mesar Kund) का जीर्णोद्धार: मुनस्यारी के ऊपर स्थित यह ऐतिहासिक प्राकृतिक तालाब पूरी तरह सूख चुका था और कूड़ेदान बन गया था। मलिका जी और गांव की महिलाओं ने बिना किसी सरकारी फंड के, सामूहिक रूप से मिट्टी और पत्थर हटाकर इस तालाब को पुनर्जीवित किया। आज यह तालाब नीचे की 3 ग्राम पंचायतों के लिए पानी का मुख्य स्रोत है और पर्यावरण को स्थिर रखता है।


• बायोडायवर्सिटी रजिस्टर (जैव-विविधता रिकॉर्ड): उन्होंने गांव के युवाओं और महिलाओं को ट्रेनिंग दी कि वे अपने जंगल में पाए जाने वाले पक्षियों, तितलियों, जड़ी-बूटियों और पेड़ों का खुद एक लिखित (Biodiversity Register) रखें, ताकि कोई बाहरी कंपनी चोरी-छिपे वहां की प्राकृतिक संपदा का पेटेंट न करा सके।


• पेड़ और पानी की पहरेदारी: वन पंचायत अपने फंड से एक 'फॉरेस्ट गार्ड' (जंगल रक्षक) रखती है। यदि कोई व्यक्ति अवैध रूप से घास, रिंगाल (पहाड़ी बांस) या लकड़ी काटते पकड़ा जाता है, तो उसके औजार जब्त कर लिए जाते हैं और उस पर सख्त जुर्माना लगाया जाता है।



3. जमुना टुडू 'लेडी टार्जन'

• जंगल से गहरा लगाव: जैसे टार्जन जंगल और जानवरों की रक्षा करता है, वैसे ही जमुना जी ने अपनी जान दांव पर लगाकर झारखंड के जंगलों को कटने से बचाया।


• अकेले शुरू की लड़ाई, फिर जुड़ीं हजारों महिलाएं:


• शादी के बाद का बदलाव: जमुना जी का जन्म ओडिशा में हुआ था, लेकिन साल 1998 में शादी के बाद वह झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के मुटुरखाम गांव आईं।


• जंगलों की बर्बादी देखी: उन्होंने देखा कि वन माफिया (लकड़ी चोर) उनके गांव के आसपास के कीमती जंगलों को अंधाधुंध काट रहे थे। गांव के लोग डर के मारे कुछ नहीं बोलते थे।


• वन सुरक्षा समिति: जमुना जी ने हार नहीं मानी। उन्होंने शुरुआत में गांव की सिर्फ 5 महिलाओं को साथ लिया और 'वन सुरक्षा समिति' बनाई।


• तीर-कमान और लाठी से मुकाबला: ये महिलाएं हाथ में लाठी, डंडे और तीर-कमान लेकर दिन-रात तीन शिफ्टों में जंगलों की पहरेदारी करने लगीं। उन्होंने सीधे खतरनाक लकड़ी माफियाओं और नक्सलियों से लोहा लिया।


• माफिया से मुकाबला: वे बिना डरे हाथ में लाठी और तीर-कमान लेकर अकेले ही खतरनाक लकड़ी चोरों (माफिया) से जंगल बचाने निकल पड़ती थीं।


• बड़ा संगठन: आज उनके साथ 10,000 से ज्यादा ग्रामीण महिलाएं जुड़ चुकी हैं, जो झारखंड के 300 से अधिक गांवों में जंगलों की रक्षा कर रही हैं।



पर्यावरण बचाने के लिए अनोखे नियम


• पेड़ों को राखी बांधना: जमुना जी की टीम पेड़ों को अपने भाई की तरह मानती है और हर साल रक्षाबंधन पर उन्हें राखी बांधकर उनकी रक्षा का संकल्प लेती है।


• बेटी के जन्म पर उपहार: गांव में जब भी किसी के घर बेटी का जन्म होता है, तो ये महिलाएं उस परिवार को 10 से 15 पौधे गिफ्ट करती हैं, ताकि बेटी के बड़े होने तक वे पेड़ भी बड़े हो जाएं और उसकी शादी व भविष्य में काम आ सकें।



जानलेवा हमले झेले और मिला 'पद्म श्री'
जान का खतरा: जंगल बचाने के इस सफर में माफियाओं ने जमुना जी के घर को लूटा, उन पर और उनके पति पर कई बार जानलेवा पथराव और हमले किए, लेकिन वे कभी पीछे नहीं हटीं।


• सर्वोच्च सम्मान: उनके इसी अदम्य साहस को देखते हुए भारत सरकार ने साल 2019 में उन्हें देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'पद्म श्री' (Padma Shri) से सम्मानित किया।



4. 'ग्रीनमैन' नरपत सिंह राजपुरोहित

राजस्थान के बाड़मेर जिले के रहने वाले 'नरपत सिंह राजपुरोहित' (Narpat Singh Rajpurohit) को 'ग्रीनमैन' (Greenman) के नाम से जाना जाता है। वे पिछले 15 वर्षों से थार रेगिस्तान के भीषण पर्यावरण को बचाने, पेड़ लगाने और बेजुबान पशु-पक्षियों की सेवा में जुटे हुए हैं।


• स्कूल प्रोजेक्ट से शुरुआत: नरपत सिंह के पर्यावरण प्रेमी बनने की शुरुआत बचपन में स्कूल के एक प्रोजेक्ट से हुई थी। Teacher के कहने पर उन्होंने 4 बीज बोए, और पौधों को बढ़ते देख प्रकृति से उनका ऐसा लगाव हुआ कि उन्होंने इसे ही अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया।



साइकिल से बनाई दुनिया में पहचान


• गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड: नरपत सिंह ने पर्यावरण बचाने का संदेश देने के लिए साइकिल से 30,121 किलोमीटर लंबी ऐतिहासिक यात्रा की। किसी एक देश के भीतर साइकिल से सबसे लंबी दूरी तय करने के लिए उनका नाम 'गिनीज बुक ऑफ World Records' (Guinness World Records) में भी दर्ज है। अपनी 3 साल से ज्यादा लंबी इस यात्रा के दौरान उन्होंने रास्ते में हजारों पौधे लगाए।



रेगिस्तान के बेजुबानों के मसीहा


• 2.5 लाख से ज्यादा पेड़: उन्होंने बाड़मेर, जैसलमेर और जोधपुर जैसे बेहद गर्म इलाकों में करीब 2.5 लाख पेड़ लगाए हैं।


• 20,000 कृत्रिम घोंसले: गर्मियों में 50 डिग्री तापमान के बीच पक्षियों को मरने से बचाने के लिए उन्होंने पेड़ों पर 20,000 से अधिक घोंसले टांगे हैं।


• अमृत कुंड (पानी की टंकियां): रेगिस्तान के जंगलों में भटकने वाले हिरण, गाय और अन्य जानवरों के लिए उनकी संस्था 'ग्रीन डेजर्ट' ने कई बड़े जलकुंड (पानी के हौद) बनवाए हैं ताकि कोई भी जीव प्यास से न मरे।



अनोखा उपहार देने की परंपरा


• वे किसी भी शादी, जन्मदिन या सामाजिक समारोह में महंगे गिफ्ट्स देने के बजाय लोगों को पौधे और पक्षियों के घोंसले उपहार में देते हैं। अपनी खुद की बहन की शादी में भी उन्होंने विदाई के समय 251 पौधे बांटे थे।



5. रामबाबू तिवारी - बुंदेलखंड के 'वॉटर हीरो'

जिन्होंने अपने सूखे इलाके में पानी की कमी को दूर करने के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी। लोग उन्हें प्यार से "वॉटर हीरो" कहते हैं, क्योंकि उन्होंने अकेले नहीं, बल्कि पूरे समाज को साथ लेकर पानी बचाने का बड़ा काम किया है।


• 75 से ज्यादा सूखे तालाबों को सुधारा: जो तालाब बरसों से सूखे पड़े थे और जिनमें कचरा भरा था, उन्होंने गांव वालों के साथ मिलकर उन्हें दोबारा गहरा किया और साफ किया ताकि उनमें बारिश का पानी रुक सके।


• 5,000 'जल मित्र' बनाए: उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को समझाया और 5,000 से ज्यादा लोगों की ऐसी टीम बनाई जो बिना एक भी पैसा लिए खुद फावड़ा उठाकर तालाब खोदने निकल पड़ते हैं।


• किसानों को मुफ्त खाद मिली: तालाब खोदते समय जो नीचे की उपजाऊ मिट्टी (गाद) निकली, उसे किसानों ने अपने खेतों में डाला। इससे खेतों की फसल अच्छी हुई और बाजार से महंगी खाद खरीदने का खर्चा बच गया।


• अनोखा तरीका (तालाब महोत्सव): लोगों को पानी की कीमत समझाने के लिए वे गांवों में 'पानी चौपाल' लगाते हैं और तालाबों के पास त्योहार जैसा माहौल बनाकर पूजा-पाठ और नाटक करते हैं।


• कम पानी वाली खेती की सलाह: वे किसानों को समझाते हैं कि धान और गेहूं जैसी फसलों में बहुत पानी बर्बाद होता है। इसकी जगह बाजरा और ज्वार जैसे मोटे अनाज बोएं, जो कम पानी में भी अच्छे उगते हैं।



सरकार से मिले बड़े सम्मान


• पीएम मोदी ने की तारीफ: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2021 में अपने रेडियो प्रोग्राम 'मन की बात' में रामबाबू के काम की जमकर तारीफ की थी और पूरे देश को उनसे सीखने को कहा था।


• 'वॉटर हीरो' और 'जल प्रहरी' अवार्ड: भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय ने उन्हें पानी बचाने के इस बेहतरीन काम के लिए देश के बड़े पुरस्कारों से नवाजा है।





रिसर्च & इनपुट: मो. आरिफ

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