देश में दलहन उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी, विदेशी दालों पर घट रही निर्भरता; जाने कैसे बदली तस्वीर
दाल हर भारतीय रसोई का अहम हिस्सा है। यही वजह है कि इसकी उपलब्धता और कीमत दोनों आम लोगों से सीधे जुड़ी हैं। पिछले कुछ वर्षों में देश को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए बड़ी मात्रा में दालों का आयात करना पड़ा, लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है। घरेलू उत्पादन बढ़ने और दलहन को बढ़ावा देने वाली सरकारी योजनाओं के कारण आयात पर निर्भरता धीरे-धीरे कम हो रही है। इससे किसानों के लिए नए अवसर बनने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को भी भविष्य में अपेक्षाकृत स्थिर कीमतों का लाभ मिल सकता है। दलहन उत्पादन में बढ़ोतरी और सरकार के आत्मनिर्भरता प्रयासों का असर अब आयात पर भी दिखने लगा है। उत्पादन की यही रफ्तार बनी रही तो आने वाले वर्षों में देश की विदेशी दालों पर निर्भरता और कम हो सकती है।
दलहन के उत्पादन में दर्ज हुई बढ़ोत्तरी
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी वर्ष 2025-26 के तीसरे अग्रिम उत्पादन अनुमान के अनुसार, देश का कुल दलहन उत्पादन 27.41 मिलियन टन रहने का अनुमान है। पिछले वर्ष यह लगभग 25.68 मिलियन टन था। चने का उत्पादन बढ़कर 12.514 मिलियन टन और मसूर का उत्पादन 1.762 मिलियन टन रहने का अनुमान है। वहीं अरहर का उत्पादन लगभग पिछले वर्ष के बराबर रहने की संभावना जताई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्पादन बढ़ने से घरेलू बाजार में उपलब्धता बेहतर होगी और आयात की आवश्यकता पहले की तुलना में कम पड़ सकती है। चने के अलावा मूंग, उड़द और मटर जैसी कई दलहनी फसलों के उत्पादन में भी सुधार का अनुमान लगाया गया है कि उत्पादन बढ़ने से घरेलु उपलब्धता मजबूत होगी और भविष्य में आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।
सरकारी प्रयासों का दिख रहा असर
पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी, किसानों से सरकारी खरीद, दलहन उत्पादन बढ़ाने के कार्यक्रम और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में किए जा रहे प्रयासों का असर अब उत्पादन पर दिखाई दे रहा है। कृषि मंत्रालय का कहना है कि बेहतर किस्मों के बीज, वैज्ञानिक खेती, मौसम आधारित सलाह और किसानों तक तकनीक पहुँचाने जैसे प्रयासों ने भी उत्पादन बढ़ाने में भूमिका निभाई है। सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत भी दलहन उत्पादन बढ़ाने पर विशेष ज़ोर दिया है। इसके अंतर्गत किसानों को उन्नत बीज, आधुनिक कृषि तकनीक और फसल प्रबंधन संबंधी सहायता उपलब्ध कराई जा रही है, ताकि प्रति हेक्टे.र उत्पादन बढ़ाया जा सके।
क्या दलहन क्षेत्र में बनेगी आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव?
किसानों को अच्छी गुणवत्ता के बीज, समय पर सिंचाई, वैज्ञानिक सलाह और फसल का लाभकारी मूल्य मिलना भी उतना ही ज़रूरी है। यदि इन पहलुओं पर लगातार काम होता रहा, तो देश में दलहन उत्पादन को और बढ़ाया जा सकता है। इससे किसानों की आय में सुधार होगा, आयात पर होने वाला खर्च घटेगा और घरेलू बाज़ार में दालों की उपलब्धता भी बेहतर बनी रहेगी। कृषि क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि दलहन उत्पादन में आई यह बढ़ोतरी एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसे स्थायी उपलब्धि बनाने के लिए उत्पादन के साथ-साथ भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा। यदि सरकार, कृषि वैज्ञानिक और किसान मिलकर इसी दिशा में काम करते रहे, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल अपनी ज़रूरत के अनुरूप दालों का उत्पादन कर सकेगा, बल्कि वैश्विक बाज़ार में भी अपनी मजबूत पहचान बना सकता है।