उत्तर भारत में उड़द की बुवाई ने पकड़ी रफ़्तार, यूपी में बुवाई 75% की रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी

Gaon Connection | Jul 25, 2026, 15:55 IST
मानसून के दूसरे चरण की बारिश ने उत्तर भारत के किसानों को राहत दी है। उड़द की बुवाई का रकबा पिछले साल की तुलना में आठ प्रतिशत बढ़ा है। उत्तर प्रदेश में उड़द की खेती में सबसे अधिक 75% की वृद्धि हुई है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में बारिश की कमी से बुवाई पिछड़ गई है। उत्तर भारत की अच्छी बुवाई देश में दालों की उपलब्धता को संतुलित रखेगी।

मानसून के दूसरे चरण में हुई झमाझम बारिश ने उत्तर भारत के किसानों के चेहरों पर खुशी ला दी है। खरीफ सीजन की शुरुआत में पिछड़ रही उड़द की खेती अब रफ़्तार पकड़ चुकी है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के बड़े हिस्से में हुई अच्छी बारिश के बाद किसानों ने उड़द का रकबा तेजी से बढ़ाया है, जिससे इस साल दलहन उत्पादन को लेकर उम्मीदें बढ़ गई हैं।


कृषि मंत्रालय की ओर से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 24 जुलाई तक देश में उड़द की बुवाई का कुल दायरा 18.67 लाख हेक्टेयर तक पहुँच चुका है। अगर बीते साल के इसी समय से तुलना करें, तो तब 17.27 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई थी। यानी इस बार उड़द के रकबे में 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।


दिलचस्प बात यह है कि जुलाई के मध्य तक उड़द की बुवाई बीते साल के मुकाबले काफी पीछे चल रही थी। लेकिन केवल एक हफ्ते के भीतर मौसम का मिजाज बदला और उत्तर भारत के राज्यों में किसानों ने 5 लाख हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर उड़द की बुवाई पूरी कर डाली।



यूपी में 75% बढ़ा रकबा, एमपी और राजस्थान का भी शानदार प्रदर्शन

उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में बारिश का सीधा असर उड़द के रकबे पर दिखा है। उत्तर प्रदेश में इस बार उड़द के रकबे में सबसे बड़ा उछाल आया है। राज्य में बुवाई का क्षेत्रफल 75 फीसदी बढ़कर 4.99 लाख हेक्टेयर हो गया है, जो पिछले साल महज 2.84 लाख हेक्टेयर था। देश के सबसे बड़े उड़द उत्पादक राज्य मध्य प्रदेश में बुवाई का दायरा 13 फीसदी बढ़कर 6.17 लाख हेक्टेयर (बीते साल 5.48 लाख हेक्टेयर) दर्ज किया गया है। राजस्थान में भी मानसूनी फुहारों के बाद उड़द का रकबा 16 फीसदी बढ़कर 3.25 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है। गुजरात में भा रकबा 25 फीसदी बढ़कर 0.49 लाख हेक्टेयर हो चुका है।



महाराष्ट्र और कर्नाटक में सुस्त मानसून ने बिगाड़ा गणित

जहाँ एक तरफ उत्तर भारत के किसान बुवाई में आगे निकल गए हैं, वहीं दक्षिण और पश्चिम भारत में मानसून की बेरुखी का असर साफ दिख रहा है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में समय पर बारिश न होने से उड़द की बुवाई पिछड़ गई है। महाराष्ट्र में उड़द का रकबा 53 प्रतिशत घट गया है और यह महज 1.6 लाख हेक्टेयर रह गया है जो पिछले साल 3.43 लाख हेक्टेयर था। कर्नाटक में भी बुवाई 24 फीसदी गिरकर 0.71 लाख हेक्टेयर पर सिमट गई है।



क्यों उड़द की तरफ खिंचे चले आ रहे हैं किसान?

'इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन' का मानना है कि इस समय बाजार में उड़द के भाव किसानों के लिए काफी फायदेमंद हैं। बेहतर कीमतों की उम्मीद में किसान दूसरी फसलों के बजाय उड़द को प्राथमिकता दे रहे हैं। राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों में तो किसान दोबारा बुवाई तक कर रहे हैं। उडद की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह महज 60 से 80 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसमें पानी की खपत भी धान जैसी फसलों के मुकाबले बहुत कम होती है। इसलिए मानसून में थोड़ी भी देरी होने पर उड़द किसानों के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प बन जाती है।



उत्तर भारत से पूरी होगी दक्षिण की कमी

महाराष्ट्र और कर्नाटक में बारिश की कमी से उड़द की पैदावार घटने की पूरी आशंका है। दलहन कारोबारियों का अनुमान है कि इस बार इन दोनों राज्यों में सामान्य से एक-चौथाई फसल ही मिल पाएगी।


ऐसे में देश में दालों की उपलब्धता और कीमतों को संतुलित रखने की पूरी जिम्मेदारी अब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के किसानों पर आ टिकी है। अगर सितंबर और अक्टूबर के महीने में मौसम ने साथ दिया, तो उत्तर भारत की यह बम्पर बुवाई देश में उड़द की कमी नहीं होने देगी

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