बढ़ती गर्मी के बीच क्यों जरूरी है 'राजस्थान के मीठी जाल' जैसे पेड़ों को बचाना, जो 45 डिग्री तापमान में भी देते हैं ठंडक?

Preeti Nahar | May 03, 2026, 16:46 IST
देश के कई हिस्सों में भीषण गर्मी पड़ रही है। लेकिन ऐसे में राजस्थान का मीठी जाल पेड़ इस मौसम में लोगों को राहत दे रहा है। यह पेड़ इंटरनेट की दुनिया में भी खासा वायरल हो रहा है। पेड़ कम पानी में उगता है और घनी छांव देता है। इसकी वजह से तापमान कम महसूस होता है। यह पेड़ मिट्टी के कटाव को भी रोकता है।
<p>हीटवेव में काम आ रहा देसी जुगाड़<br></p>

Natural Cooling Tree India: देश के कई हिस्सों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुँच रहा है। राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के कई इलाकों में भीषण गर्मी लोगों का जीना मुश्किल कर रही है। मौसम विभाग और वर्ल्ड मेट्रोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन (WMO) ने भी आने वाले महीनों में गर्मी बढ़ने की चेतावनी दी है। ऐसे समय में कुछ पारंपरिक पेड़ ऐसे हैं जो न सिर्फ गर्मी से राहत देते हैं, बल्कि पर्यावरण और ग्रामीण जीवन के लिए भी बेहद अहम हैं। राजस्थान का ‘मीठी जाल’ पेड़ इन्हीं में से एक है, जो रेगिस्तानी इलाकों में भी ठंडक देने के लिए जाना जाता है। सोशल मीडिया पर भी ‘देसी AC/मीठी जा’ की चर्चा तेज हो गई है। आइए जानते हैं यह देसी AC क्या है?



क्या है मीठी जाल पेड़?

इस पेड़ को ‘मिठी जल’ या ‘पीलू’ भी कहते हैं, जिसका वैज्ञानिक नाम Salvadora oleoides है। जो राजस्थान के जोधपुर, बाड़मेर, बीकानेर, जैसलमेर, चूरू, झुंझुनू और नागौर जैसे गर्म और शुष्क इलाकों में बड़ी संख्या में पाया जाता है। मीठी जाल पेड़ रेतीले इलाकों में पाया जाने वाला पारंपरिक पेड़ है जो कम पानी में भी आसानी से जीवित रहता है और इसकी घनी छांव तेज गर्मी में लोगों और पशुओं को राहत देती है। 45 डिग्री तापमान में भी इस पेड़ के नीचे तापमान आसपास के मुकाबले काफी कम महसूस होता है।



क्यों खास है इसकी ठंडक?

इस पेड़ की छांव में ठंडक होने के पीछे कारण है इसकी घनी पत्तियाँ। पेड़ की घनी शाखाएं और पत्तियां सूरज की सीधी किरणों को जमीन तक पहुंचने से रोकती हैं। यही वजह है कि इसके नीचे प्राकृतिक रूप से ठंडक बनी रहती है। ग्रामीण इलाकों में किसान, चरवाहे और पशु अक्सर इसकी छांव में आराम करते नजर आ जाते हैं। माना जाता है कि गर्मी के मौसम में यह पेड़ प्राकृतिक कूलर की तरह काम करता है। इस पेड़ के नीचे का तापमान आसपास के मुकाबले 5 से 8 डिग्री सेल्सियस तक कम महसूस होता है।



Salvadora oleoides सिर्फ छाया देने वाला पेड़ नहीं है। इस पेड़ पर मीठे बेर जैसे फल भी लगते हैं जो खाने योग्य होते हैं और इसकी टहनियों का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से दातून के रूप में किया जाता है। यह कम पानी में भी आसानी से उग जाता है, इसलिए इसे शुष्क क्षेत्रों के लिए बेहद उपयोगी पेड़ माना



पर्यावरण के लिए भी बेहद जरूरी

यह पेड़ ट्रांसपिरेशन प्रक्रिया के जरिए पत्तियों से महीन जलवाष्प छोड़ता है, जो आसपास की गर्म हवा को ठंडा करने में मदद करता है। पेड़ के नीचे से गुजरने वाली हवा पत्तियों से टकराकर धीमी और ठंडी हो जाती है, इसलिए राजस्थान जैसे शुष्क इलाकों में इसका असर ज्यादा महसूस होता है। आपके बता दें कि मीठी जाल सिर्फ छाया ही नहीं देता, बल्कि मिट्टी संरक्षण में भी मदद करता है। यह पेड़ रेगिस्तानी इलाकों में मिट्टी के कटाव को रोकता है और जैव विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। साथ ही इसके फल और पत्तियां पशुओं के चारे के रूप में भी इस्तेमाल होती हैं।



क्यों घट रही है संख्या?

शहरीकरण, पेड़ों की कटाई और जागरूकता की कमी के कारण ऐसे पारंपरिक पेड़ों की संख्या धीरे-धीरे कम हो रही है। कई क्षेत्रों में विकास कार्यों के नाम पर पारंपरिक पेड़ों को काटा जा रहा है, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी पर असर पड़ रहा है। इसलिए बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसे पेड़ों का संरक्षण बेहद जरूरी हो गया है। अगर गाँवों और शहरों में मीठी जाल जैसे पेड़ों को बचाया जाए और अधिक संख्या में लगाया जाए, तो गर्मी के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।



बचाने होंगे मीठी जाल जैसे पेड़

जहाँ शहरों में बढ़ती गर्मी के कारण बिजली की खपत और AC पर निर्भरता बढ़ रही है, वहीं ग्रामीण इलाकों में यह पेड़ बिना किसी खर्च के प्राकृतिक राहत दे रहा है। बढ़ती हीटवेव के बीच ‘मिठी जल’ जैसे पेड़ यह याद दिलाते हैं कि प्रकृति के पास गर्मी से बचने के कई सरल और टिकाऊ समाधान मौजूद हैं। ऐसे पेड़ों को बटाके लिए स्थानीय स्तर पर पौधारोपण अभियान चलाए जा सकते हैं। किसानों और ग्रामीण समुदायों को ऐसे पेड़ों के महत्व के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह प्राकृतिक ठंडक देने वाले पेड़ सुरक्षित रह सकें।

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