ICAR की नई रिसर्च: जलवायु-अनुकूल गेहूं उत्पादन में 25% तक उर्वरक बचत, किसानों की आय दोगुनी
भारत में कृषि क्षेत्र को आत्मनिर्भर और जलवायु-अनुकूल बनाने की दिशा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद लगातार महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है। इसी क्रम में डॉ. एम. एल. जाट ने करनाल स्थित अनुसंधान संस्थानों का दौरा कर चल रही रिसर्च परियोजनाओं की समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने कहा कि देश इस वर्ष गेहूं उत्पादन के मामले में पूरी तरह तैयार है और उच्च उत्पादन की संभावना है, जिससे न केवल देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत होगी बल्कि वैश्विक स्तर पर भी भारत की भूमिका बढ़ेगी।
अनुसंधान और विकास पहलों की समीक्षा
डॉ. जाट ने ICAR-भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान और ICAR-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान में चल रही अनुसंधान गतिविधियों का जायजा लिया। उन्होंने विशेष रूप से गंगा के मैदानी क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ाने, लागत घटाने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए किए जा रहे कार्यों की सराहना की।
जलवायु-अनुकूल और संसाधन-कुशल खेती पर जोर
ICAR का फोकस जलवायु-प्रतिरोधी और पोषक तत्वों से भरपूर फसल किस्मों के विकास पर है। वैज्ञानिकों द्वारा विकसित नई तकनीकें न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मदद कर रही हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दे रही हैं। विशेष रूप से जैविक नाइट्रिफिकेशन अवरोधन (BNI) तकनीक के जरिए उर्वरकों के उपयोग में 25% तक कमी संभव हो रही है।
संरक्षण कृषि से बड़े लाभ
संरक्षण कृषि (Conservation Agriculture) के तहत किए जा रहे प्रयोगों ने शानदार परिणाम दिए हैं। इससे सिंचाई जल में 85% तक बचत, उर्वरक उपयोग में 28% कमी और फसल अवशेष जलाने की घटनाओं में 95% तक गिरावट दर्ज की गई है। इसके साथ ही ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 46% की कमी और किसानों की आय में लगभग दोगुनी वृद्धि देखने को मिली है।
मृदा स्वास्थ्य और पर्यावरणीय सुधार
दीर्घकालिक अनुसंधान के परिणामस्वरूप मृदा में कार्बनिक कार्बन और सूक्ष्मजीवों की संख्या दोगुनी हो गई है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। यह पहल न केवल जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायक है, बल्कि भारत के कार्बन न्यूट्रैलिटी लक्ष्यों को भी समर्थन देती है।
गेहूं रस्ट निगरानी और फसल सुरक्षा
ICAR द्वारा संचालित गेहूं रस्ट निगरानी कार्यक्रम फसलों को स्ट्राइप, लीफ और स्टेम रस्ट जैसे खतरनाक रोगों से बचाने में अहम भूमिका निभा रहा है। देशभर में फैले 30 से अधिक संस्थानों का नेटवर्क करीब 1 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में निगरानी करता है और हर साल 1000 से अधिक नई किस्मों का परीक्षण किया जाता है।
BNI और नई किस्मों पर रिसर्च
BNI तकनीक से नाइट्रोजन उपयोग दक्षता में सुधार हो रहा है और उर्वरक की जरूरत कम हो रही है। वर्तमान में 19 नई गेहूं किस्मों का परीक्षण किया जा रहा है, जिससे भविष्य में किसानों को कम लागत में बेहतर उत्पादन मिल सकेगा। अनुमान है कि इस तकनीक के व्यापक उपयोग से हर साल लगभग 2000 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।
पोषण सुरक्षा और जैव-संरक्षित फसलें
ICAR ने अब तक आयरन, जिंक और प्रोटीन से भरपूर 55 जैव-संरक्षित गेहूं किस्में विकसित की हैं। देश में लगभग 45% गेहूं क्षेत्र में इन किस्मों की खेती हो रही है, जो किसानों की बढ़ती जागरूकता और बेहतर उत्पादन का संकेत है।
जौ की खेती और भविष्य की संभावनाएं
जौ (Barley) को भी एक महत्वपूर्ण फसल के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। यह कम पानी और कम उर्वरक में अच्छी पैदावार देती है और स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। बढ़ती मांग के चलते जौ भविष्य में टिकाऊ कृषि का एक प्रमुख हिस्सा बन सकता है।ICAR के वैज्ञानिक नवाचार और अनुसंधान भारत की कृषि को आधुनिक, टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इन पहलों से न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि देश की खाद्य और पोषण सुरक्षा भी मजबूत होगी। वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में ये प्रयास मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।