गाँवों की कमाई थमी, उधारी बढ़ी! दो साल में सबसे धीमी पड़ी ग्रामीणों की आय की रफ़्तार, नाबार्ड के सर्वे ने बढ़ाई चिंता
देश के ग्रामीण इलाक़ों में आय बढ़ने की रफ़्तार पिछले दो वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गई है। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के ताज़ा सर्वे के अनुसार, केवल 27.7 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों ने पिछले एक वर्ष के दौरान अपनी आय बढ़ने की जानकारी दी है। वहीं आधे से अधिक परिवारों की आय में कोई बदलाव नहीं आया, जबकि क़रीब पाँचवें हिस्से के परिवारों ने आय घटने की बात कही है। सर्वे से यह भी पता चला है कि ग्रामीण परिवारों की अनौपचारिक क़र्ज़ पर निर्भरता अब तक के सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गई है।
नाबार्ड के ‘रूरल इकोनॉमिक कंडीशंस ऐंड सेंटिमेंट्स सर्वे’ (राउंड-12, जुलाई 2026) के अनुसार, ग्रामीण उपभोग अभी भी अपेक्षाकृत मज़बूत बना हुआ है, लेकिन आय में सुस्ती और अनौपचारिक उधारी में तेज़ बढ़ोतरी गाँवों में उभरते वित्तीय दबाव की ओर इशारा करती है। यह सर्वे 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 20,000 ग्रामीण परिवारों पर आधारित है।
आय बढ़ने की रफ़्तार सबसे निचले स्तर पर
सर्वे के मुताबिक़ केवल 27.7 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों ने बताया कि उनकी आय पिछले वर्ष की तुलना में बढ़ी है। यह सर्वे शुरू होने के बाद का सबसे कम आँकड़ा है। वहीं 52.6 प्रतिशत परिवारों ने कहा कि उनकी आय में कोई बदलाव नहीं हुआ, जो अब तक का सबसे बड़ा हिस्सा है। इसके अलावा 19.8 प्रतिशत परिवारों ने आय में गिरावट दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर 2025 के बाद से लगातार ऐसे परिवारों की संख्या घट रही है, जिन्होंने आय बढ़ने की बात कही है। इससे ग्रामीण आय में लगातार सुस्ती आने के संकेत मिल रहे हैं।
महँगाई और कमज़ोर मानसून का दिखा असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण आय पर दबाव ऐसे समय में बढ़ा है, जब महँगाई भी ऊँचे स्तर पर है। जून 2026 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित खुदरा महँगाई बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुँच गई, जो 17 महीनों का उच्चतम स्तर है। कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर कमज़ोर और देर से पहुँचे मानसून का भी असर पड़ा है। अल नीनो की आशंकाओं के बीच 1 जून से 15 जुलाई तक देश में सामान्य से 23 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। इसका असर खरीफ़ फसलों की बुवाई पर भी दिखाई दिया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6 प्रतिशत कम रही।
उपभोग बरकरार, लेकिन आय का बड़ा हिस्सा ख़र्च में जा रहा
सर्वे के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोग पूरी तरह कमज़ोर नहीं पड़ा है। जुलाई 2026 में 74.1 प्रतिशत लोगों ने उपभोग व्यय बढ़ने की बात कही। हालांकि यह आँकड़ा मई 2026 के 77.2 प्रतिशत और जुलाई 2025 के 76.6 प्रतिशत से कम है। सर्वे शुरू होने के बाद यह दूसरी बार है, जब यह आँकड़ा 75 प्रतिशत से नीचे आया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण परिवार अब भी अपनी मासिक आय का लगभग दो-तिहाई हिस्सा उपभोग पर ख़र्च कर रहे हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि आय में सुस्ती के बावजूद दैनिक ज़रूरतों पर ख़र्च जारी है।
औपचारिक क़र्ज़ से दूरी, अनौपचारिक उधारी बढ़ी
ग्रामीण परिवारों की औपचारिक वित्तीय संस्थानों से क़र्ज़ लेने की हिस्सेदारी घटकर 51 प्रतिशत रह गई है, जबकि नवंबर 2025 में यह 58.3 प्रतिशत थी। दूसरी ओर, केवल अनौपचारिक स्रोतों जैसे रिश्तेदारों, दोस्तों और साहूकारों से क़र्ज़ लेने वाले परिवारों की हिस्सेदारी बढ़कर 23.6 प्रतिशत हो गई, जो सर्वे के सभी चरणों में सबसे अधिक है। अनौपचारिक उधारी लेने वाले परिवारों में 16.2 प्रतिशत ने केवल दोस्तों या रिश्तेदारों से क़र्ज़ लिया, 6 प्रतिशत ने केवल साहूकारों से और 1.4 प्रतिशत ने दोनों स्रोतों का सहारा लिया।
'मिंट' की रिपोर्ट के अनुसार, अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह सर्वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उभरती कमज़ोरी का शुरुआती संकेत देता है। उनका मानना है कि कृषि पर अत्यधिक निर्भरता के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि रोज़गार के अवसर बढ़ाने की ज़रूरत है। साथ ही, औपचारिक बैंकिंग सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद क़र्ज़ लेने की जटिल प्रक्रिया के कारण कई लोग अब भी रिश्तेदारों या साहूकारों से उधार लेना आसान समझते हैं। वहीं कुछ अर्थशास्त्रियों ने इसे व्यापक ग्रामीण मंदी का अंतिम निष्कर्ष मानने के बजाय शुरुआती चेतावनी बताया है और कहा है कि आने वाले महीनों में रोज़गार, मज़दूरी और उपभोग के आँकड़ों पर भी नज़र रखनी होगी।