UN की चेतावनी: भीषण गर्मी से खेती, जंगल और मछली उत्पादन पर संकट, 1 अरब लोगों की आजीविका ख़तरे में

Preeti Nahar | Apr 23, 2026, 10:41 IST
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने दुनिया को आगाह किया है। भीषण गर्मी से खेती, पशुपालन और जंगलों पर संकट मंडरा रहा है। भारत जैसे देशों में किसानों के लिए काम करना मुश्किल हो रहा है। यह जलवायु परिवर्तन की वर्तमान चुनौती है। समाधान के लिए सरकारों को तुरंत कदम उठाने होंगे।

UN Extreme Heat Report 2026: संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट ने दुनिया के सामने गंभीर चेतावनी रखी है। रिपोर्ट के अनुसार बढ़ती भीषण गर्मी, लगातार बढ़ते तापमान और बार-बार आने वाली हीटवेव अब केवल मौसम की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह वैश्विक खाद्य व्यवस्था, खेती-किसानी, जंगलों और करोड़ों लोगों की आजीविका के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है। इस रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों FAO (खाद्य एवं कृषि संगठन) और WMO (विश्व मौसम विज्ञान संगठन) ने जारी किया है।



संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि extreme heat यानी अत्यधिक गर्मी से दुनिया भर में 1 अरब से ज्यादा लोगों की रोजी-रोटी प्रभावित हो सकती है। साथ ही बताया गया है कि अत्यधिक गर्मी की वजह से दुनिया भर में हर साल करीब 50 हजार करोड़ कार्य घंटे (half a trillion work hours) नष्ट हो रहे हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, वैसे-वैसे कामकाज, खेती, मजदूरी और आजीविका पर इसका असर और गंभीर होता जाएगा।



खेती पर सबसे बड़ा असर

रिपोर्ट में बताया गया है कि तापमान बढ़ने से फसलों की पैदावार तेजी से घट रही है। गेहूं, धान, मक्का और सोयाबीन जैसी प्रमुख फसलें ज्यादा गर्मी सहन नहीं कर पातीं। जब तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाता है, तो कई फसलों की वृद्धि रुकने लगती है और उत्पादन कम हो जाता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि औसत वैश्विक तापमान में हर 1 डिग्री वृद्धि पर प्रमुख फसलों की पैदावार करीब 6 प्रतिशत तक घट सकती है।



पशुपालन भी संकट में

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भीषण गर्मी का असर सिर्फ फसलों पर नहीं, बल्कि पशुपालन पर भी पड़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार 25 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान होने पर गाय, भैंस, बकरी, सूअर और मुर्गियों पर हीट स्ट्रेस शुरू हो जाता है। इससे दूध उत्पादन घटता है, वजन कम होता है और गंभीर स्थिति में पशुओं की मौत तक हो सकती है। खासकर पोल्ट्री सेक्टर पर इसका ज्यादा असर देखा जा रहा है।



जंगलों पर बढ़ा खतरा

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रिपोर्ट में कहा गया है कि अत्यधिक गर्मी जंगलों के लिए भी बड़ा खतरा है। गर्म मौसम और सूखे की वजह से जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ रही हैं। इससे जैव विविधता को नुकसान, वन्यजीवों का संकट और कार्बन उत्सर्जन बढ़ने जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। गर्मी के कारण पेड़ों की प्राकृतिक वृद्धि भी प्रभावित हो रही है।



समुद्र और मत्स्य उत्पादन पर असर

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रिपोर्ट के अनुसार 2024 में दुनिया के 91 प्रतिशत समुद्री क्षेत्रों में कम से कम एक बार marine heatwave दर्ज की गई। समुद्र के पानी का तापमान बढ़ने से ऑक्सीजन स्तर घटता है, जिससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों पर संकट आता है। इससे मछुआरों की आय और वैश्विक मत्स्य उत्पादन प्रभावित हो रहा है।



भारत जैसे देशों पर ज्यादा खतरा

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संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि भारत, दक्षिण एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे पहले से गर्म क्षेत्रों में कृषि मजदूरों के लिए बाहर काम करना बेहद कठिन हो सकता है। कुछ इलाकों में साल के 250 दिन तक ऐसी स्थिति बन सकती है जब खेतों में काम करना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो जाएगा। इसका सीधा असर खाद्य उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।



समाधान क्या बताए गए?

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रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल राहत उपाय काफी नहीं होंगे। इसके लिए सरकारों को कई कदम उठाने होंगे:


- हीट सहनशील बीज और फसल किस्में विकसित करना


- मौसम पूर्वानुमान और early warning system मजबूत करना


- सिंचाई और जल प्रबंधन सुधारना


- किसानों को बीमा और आर्थिक सुरक्षा देना


- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना



भविष्य के लिए गंभीर संकेत

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में खाद्य संकट, महंगाई, बेरोजगारी और पलायन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि climate change अब भविष्य की नहीं, वर्तमान की चुनौती है।



FAO के महानिदेशक क्यू डोंग्यू ने कहा कि अत्यधिक गर्मी एक बड़ा जोखिम बढ़ाने वाला कारक बन चुकी है, जो फसलों, पशुधन, मत्स्य उत्पादन, जंगलों और उन पर निर्भर समुदायों व अर्थव्यवस्थाओं पर लगातार दबाव बढ़ा रही है। संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों ने निष्कर्ष में कहा कि कृषि के भविष्य की रक्षा करने और वैश्विक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल खेतों की सहनशीलता बढ़ाना ही काफी नहीं होगा, बल्कि उच्च उत्सर्जन वाले भविष्य से निर्णायक रूप से बाहर निकलना भी जरूरी है।

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