जब गाँव के करघो ने जीता दुनिया का दिल: जानें उत्तर-प्रदेश के सीतापुर में बनने वाली हैंडलूम दरियाँ क्यों है विदेशों तक मशहूर
वैसे तो उत्तर प्रदेश के हर क्षेत्र की बात ही अलग है, चाहे वह राधारानी का ब्रज हो या भोलेनाथ की काशी, चिकनकारी वाला लखनऊ हो या चूड़ियों वाला फिरोजाबाद। हर जगह यूपी वाले अपना परचम लहराते ही रहते हैं। पूरे देश में सबसे ज्यादा गाँव भी यूपी में ही हैं। और आज हम बात करेंगे एक ऐसे गाँव की, जिसने विश्व तक अपनी धाक जमा रखी है।
सीतापुर – एक बेहद खूबसूरत और शांत शहर, जिसे राजा विक्रमादित्य ने बसवाया था और देवी सीता के नाम पर इस जगह का नामकरण किया गया। नैमिषारण्य नामक तीर्थ भी इसी शहर में स्थित है, जहाँ हजारों श्रद्धालु रोज दर्शन के लिए आते हैं। यहाँ के घाट भी काफी रमणीय हैं।
लेकिन जिस बात के लिए यह शहर विश्व-प्रख्यात है, वह है यहां के गाँव खैराबाद की हैंडलूम की दरियाँ। एक ऐसा उत्पाद जिसने अपनी सादगी और सुंदरता से सभी का दिल जीत लिया। जिसे यहाँ के कारीगर बहुत मेहनत और शिद्दत से, बिना किसी मशीनी उपकरण के, अपने हाथों द्वारा बनाते हैं। यहाँ दरी बनाने का काम लगभग 17वीं-18वीं शताब्दी से चला आ रहा है, या फिर यह भी कह सकते हैं कि यह परंपरा मुगल काल से ही चली आ रही है।
आइए जानते हैं कि किस प्रकार हमारे कारीगर बंधु इस कला को मेहनत से बुनते हैं और हम तक पहुंचाते हैं:-
1. कच्चे माल का चयन
दरी बनाने की कारीगरी में सबसे पहला चरण आता है धागों का चुनाव, कि किस प्रकार का धागा दरी बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। यह चुनाव दोतरफा होता है। इसे ऐसे समझते हैं कि यदि कारीगर को दरी किसी प्रदर्शनी या सैंपल के लिए भेजनी है तो चुनाव उसका होगा, अन्यथा चुनाव ग्राहक ही करेगा। इसे बनाने में मुख्य तौर पर कॉटन, जूट, हैम्प और वूल के धागों का प्रयोग किया जाता है।
2. रंगाई की प्रक्रिया
अब धागों के चुनाव के बाद आता है रंगाई का नंबर। जैसी मांग ग्राहक की होती है, उसी प्रकार के रंगों का चुनाव किया जाता है। ऐसे रंग जो मन को छू जाएं। रंगों के चुनाव के बाद धागों को कुशलतापूर्वक रंगा जाता है और यह ध्यान रखा जाता है कि रंगों का माप उचित हो।
3. धागों को सुखाना
उसके बाद कारीगर सभी रंगे हुए धागों को सुखाने का कार्य करते हैं। रंगों का अच्छी तरह से सूखना बेहद जरूरी होता है, ताकि यह पता चल सके कि रंग सही से चढ़ा है या नहीं। साथ ही यह भी पता चल सके कि सूखने के बाद वह रंग कैसा लग रहा है।
4. बुनाई की प्रक्रिया
अब रंगे और सूखे धागों का बंडल तैयार किया जाएगा, जिसे बाद में हैंडलूम पर सेट किया जाएगा। हैंडलूम एक ऐसी मशीन है, जिसे पूरी तरह से हाथों से चलाया जाता है। इसी हैंडलूम की मदद से कारीगर बंधु दरियाँ बनाते हैं। लूम पर धागों को बिछाकर उन पर डिजाइन भी बनाए जाते हैं। ये सुंदर डिजाइन ही इन दरियों की खास पहचान भी बनते हैं।
5. फिनिशिंग
इसके बाद बारी आती है फिनिशिंग की। लूम द्वारा तैयार की गई दरियों को साइड से फैब्रिक की मदद से या सिलाई मशीन द्वारा सील किया जाता है, ताकि दरी के धागे खुल न जाएं। पूरी बारीकी से जब यह कार्य संपन्न हो जाता है, तब जाकर एक दरी तैयार होती है।
सीतापुर की इन दरियों को मिला ODOP का साथ
बदलते समय के साथ जहाँ कई हस्तकलाएं पीछे छूटती जा रही हैं, वहीं दरी उद्योग ने खुद को नए दौर के अनुसार ढालना शुरू कर दिया है। इसी परिवर्तन में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) योजना ने। इस योजना के तहत सीतापुर की दरी को न केवल एक विशेष पहचान मिली है, बल्कि कारीगरों को प्रशिक्षण, बेहतर डिजाइन, आधुनिक तकनीक और बाजार तक सीधी पहुँच भी मिली है।
ODOP के साथ से स्थानीय बुनकरों को आर्थिक मजबूती मिली है। उनके उत्पाद अब राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहे जा रहे हैं। पहले जो कला सीमित संसाधनों में संघर्ष कर रही थी, आज वही आत्मनिर्भरता और सम्मान की दिशा में आगे बढ़ रही है।
सरकारी सहयोग, डिजिटल प्लेटफॉर्म और बढ़ती जागरूकता ने इस पारंपरिक कला को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया है। अब जरूरत है इस विरासत को आगे बढ़ाने की, ताकि सीतापुर की दरी केवल एक उत्पाद न रहकर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के रूप में आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रहे।