सोयामील एक्सपोर्ट में 50 प्रतिशत से भी अधिक की बड़ी गिरावट का ख़तरा! सोयाबीन किसानों की आय पर क्यों मंडरा रहा संकट?

Preeti Nahar | May 25, 2026, 18:51 IST
भारत का सोयामील निर्यात 2025-26 मार्केटिंग सीजन में घटकर करीब 9 लाख टन रह सकता है, जबकि पिछले साल यह करीब 20.2 लाख टन था। उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ने के कारण भारतीय सोयामील वैश्विक बाजार में महंगा हो गया है, जिससे विदेशी खरीदार दक्षिण अमेरिकी देशों की ओर रुख कर रहे हैं। इसका असर देश के सोयाबीन किसानों और प्रोसेसिंग उद्योग पर पड़ सकता है।

भारत दुनिया के बड़े सोयामील निर्यातकों में गिना जाता है, लेकिन इस बार हालात बदलते नजर आ रहे हैं। सोयामील की कीमतों में रिकॉर्ड तेजी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण भारत का निर्यात तेजी से घट सकता है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक अगर यही स्थिति बनी रही तो इसका सीधा असर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों के लाखों सोयाबीन किसानों की आय पर पड़ सकता है। घरेलू बाजार में दाम बढ़ने से जहाँ किसानों को कुछ समय के लिए फायदा मिला है, वहीं निर्यात घटने से भविष्य में बाजार दबाव बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।



क्या है पूरा मामला?

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भारत का सोयामील निर्यात 2025-26 मार्केटिंग सीजन में घटकर करीब 9 लाख टन रह सकता है, जबकि पिछले साल यह करीब 20.2 लाख टन था। यानी निर्यात लगभग आधा होने का अनुमान है। यह पिछले चार वर्षों का सबसे निचला स्तर हो सकता है।



क्यों घट रहा है सोयामील का निर्यात?

विशेषज्ञों के अनुसार सबसे बड़ी वजह भारतीय सोयामील की ऊंची कीमतें हैं। भारतीय सोयामील जून शिपमेंट के लिए करीब 680 डॉलर प्रति टन FOB रेट पर ऑफर किया जा रहा है, जबकि दक्षिण अमेरिकी देशों जैसे ब्राजील और अर्जेंटीना का सोयामील करीब 430 डॉलर प्रति टन में उपलब्ध है। कीमतों में इतना बड़ा अंतर होने के कारण विदेशी खरीदार भारत से दूरी बना रहे हैं।



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गाँव कनेक्शन ने महाराष्ट्र के कृषि विशेषज्ञ विजय जवांधिया से इस मामले को लेकर चर्चा की। विजय ने बताया, भारत से सोयामील निर्यात घटने के पीछे सिर्फ एक कारण नहीं, बल्कि कई घरेलू और वैश्विक वजहें एक साथ काम कर रही हैं। उन्होंने बताया कि भारत मुख्य रूप से Non-GM (नॉन जेनेटिकली मॉडिफाइड) सोयाबीन का उत्पादन करता है, जबकि ब्राजील, अर्जेंटीना और अमेरिका जैसे देशों में बड़े स्तर पर GM सोयाबीन की खेती होती है।



GM फसल का उत्पादन ज्यादा और लागत कम पड़ती है, इसलिए दक्षिण अमेरिकी देशों का सोयामील भारतीय सोयामील की तुलना में काफी सस्ता मिलता है। यही वजह है कि वियतनाम समेत कई विदेशी खरीदार अब भारत के बजाय दक्षिण अमेरिका से सोयामील खरीद रहे हैं।



अभी क्या चल रहे हैं सोयामील के रेट?

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भारत में सोयामील की घरेलू कीमत करीब 64,625 रुपये प्रति टन तक पहुंच गई है। यह पिछले एक महीने में करीब 47 प्रतिशत और चालू सीजन की शुरुआत यानी 1 अक्टूबर से अब तक लगभग 85 प्रतिशत बढ़ चुकी है।



कृषि विशेषज्ञ विजय जवांधिया ने बताया कि भारत में सोयाबीन की कीमतें MSP से काफी ऊपर चली गई हैं। MSP करीब ₹5300 प्रति क्विंटल होने के बावजूद कई मंडियों में सोयाबीन के भाव ₹6000 से ₹6,5000 प्रति क्विंटल तक पहुँच गए। जब कच्चा माल महंगा होता है तो उससे बनने वाला सोयामील भी महंगा हो जाता है।



यही कारण है कि भारतीय सोयामील का एक्सपोर्ट रेट करीब 680 डॉलर प्रति टन पहुंच गया, जबकि ब्राजील और अर्जेंटीना का सोयामील करीब 430 डॉलर प्रति टन में उपलब्ध है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इतनी बड़ी कीमत का अंतर भारतीय निर्यातकों को कमजोर बना रहा है।



दाम इतने तेजी से क्यों बढ़े?

सोयाबीन उत्पादन में 'गिरावट' को इसकी सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है। खराब मौसम, बेमौसम बारिश और उत्पादन घटने के कारण बाजार में सोयाबीन की सप्लाई कम हुई है। सप्लाई कम होने से बाजार में कीमतें और बढ़ीं। इसके साथ ही ट्रांसपोर्ट लागत और प्रोसेसिंग खर्च भी बढ़ गया, जिससे भारतीय सोयामील अंतरराष्ट्रीय बाजार में और महंगा हो गया। दूसरी ओर पोल्ट्री उद्योग में पशु चारे के रूप में सोयामील की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है।



किसानों पर क्या होगा असर?

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शुरुआती दौर में ऊंचे दामों से किसानों को फायदा मिल सकता है, लेकिन अगर निर्यात लगातार घटता है तो घरेलू बाजार में मांग कमजोर पड़ सकती है। इससे आने वाले महीनों में सोयाबीन के दाम दबाव में आ सकते हैं। मध्य प्रदेश देश का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक राज्य है और वहां के किसान इस स्थिति से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं।



कौन-कौन से देश खरीदते हैं भारतीय सोयामील?

भारत से सोयामील का निर्यात मुख्य रूप से बांग्लादेश, नेपाल, जर्मनी और नीदरलैंड जैसे देशों में होता है। भारतीय सोयामील की खासियत यह है कि यह नॉन-GM (Non-Genetically Modified) सोयाबीन से तैयार किया जाता है, इसलिए इसे प्रीमियम प्रोडक्ट माना जाता है। लेकिन इस बार ऊंची कीमतों के कारण विदेशी खरीदार सस्ते विकल्प तलाश रहे हैं।



विजय जवांधिया ने अमेरिका के साथ संभावित ट्रेड डील और वैश्विक व्यापार नीतियों का भी जिक्र किया। उनका कहना है कि आने वाले समय में अगर वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा और बढ़ती है, तो भारत के लिए Non-GM सोयामील के प्रीमियम मॉडल को बचाए रखना चुनौती बन सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय Non-GM सोयामील की गुणवत्ता बेहतर मानी जाती है और यूरोप जैसे कुछ बाजारों में इसकी मांग अभी भी बनी हुई है।



उद्योग जगत ने क्या कहा?

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मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक महाराष्ट्र ऑयल एक्सट्रैक्शंस की तरफ से बताय गया है कि भारतीय कीमतें वैश्विक बाजार से काफी ज्यादा हैं और तेल मिलों को नए निर्यात ऑर्डर तक नहीं मिल रहे। वहीं कृषि निर्यातक बता रहे हैं कि दक्षिण अमेरिकी देशों की सप्लाई अधिक प्रतिस्पर्धी हो गई है और खरीदार अब वहीं से माल खरीद रहे हैं।



आगे क्या हो सकता है?

अगर उत्पादन में सुधार नहीं हुआ और वैश्विक बाजार में कीमतों का अंतर बना रहा, तो भारत का सोयामील निर्यात लंबे समय तक दबाव में रह सकता है। इससे घरेलू बाजार में भी अस्थिरता बढ़ सकती है। वहीं पोल्ट्री उद्योग की मजबूत मांग फिलहाल कीमतों को सहारा दे रही है, लेकिन आने वाले महीनों में निर्यात और उत्पादन दोनों पर नजर बनी रहेगी। ऐसे में किसानों के को सोयबाीन के निर्यात पर



कृषि विशेषज्ञ ने सुझाया क्या रास्ता?

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कृषि विशेषज्ञ विजय बताते हैं कि सरकार से एक्सपोर्ट सब्सिडी/ Export Subsidy की मांग की जा रही है ताकि भारतीय सोयामील अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ता हो सके और ब्राजील-अर्जेंटीना जैसे देशों से मुकाबला कर पाए।



अभी भारत का सोयामील करीब 680 डॉलर प्रति टन है, जबकि दक्षिण अमेरिकी देशों का माल लगभग 430 डॉलर प्रति टन में मिल रहा है। महंगा होने के कारण विदेशी खरीदार भारत से कम खरीद रहे हैं।



अगर सरकार ट्रांसपोर्ट, टैक्स या फ्रेट पर राहत दे या एक्सपोर्ट इंसेंटिव दे, तो भारतीय कंपनियां कम कीमत पर माल बेच पाएंगी और भारत अपने पुराने विदेशी बाजार व ट्रेड डील बचा सकेगा।


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