"क्या पराली जलाने पर लगेगी लगाम? जानिए 46,000 से ज्यादा मशीनों और ड्रोन निगरानी के साथ सरकार की क्या है नई तैयारी"
पराली जलाने से दिल्ली-NCR समेत उत्तर भारत के कई इलाकों में सर्दियों के दौरान वायु प्रदूषण बढ़ जाता है। लेकिन इसका असर सिर्फ हवा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खेत की मिट्टी पर भी पड़ता है। कृषि मंत्री ने कहा कि पराली जलाने से मिट्टी के पोषक तत्वों को नुकसान पहुंचता है और जमीन की उर्वरता धीरे-धीरे कम हो सकती है।
धान की कटाई के बाद इस साल करीब 2.762 करोड़ टन पराली निकलने का अनुमान लगाया गया है। इतनी बड़ी मात्रा में निकलने वाले फसल अवशेष को संभालना बड़ी चुनौती है। अगर पराली को जलाने के बजाय खेत में मिलाया जाए तो इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ सकते हैं और जमीन की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है।
क्या है पराली सुरक्षा बल
पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखने के लिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के 14 जिलों में विशेष निगरानी व्यवस्था तैयार की जाएगी। इसके तहत कम से कम 70 तहसीलों में ‘पराली सुरक्षा बल’ सक्रिय करने के निर्देश दिए गए हैं।
अब तक पराली जलाने की जानकारी मुख्य रूप से सैटेलाइट तस्वीरों से मिलती थी, लेकिन शाम के समय होने वाली घटनाओं की निगरानी में दिक्कत आती थी। इसे देखते हुए ड्रोन के जरिए रियल टाइम निगरानी की व्यवस्था मजबूत करने की तैयारी है।
2026-27 में पराली प्रबंधन के लिए 544 करोड़ रुपये का प्रावधान
फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत वर्ष 2026-27 के लिए 544.15 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। इसमें से 272.07 करोड़ रुपये की पहली किस्त राज्यों को जारी की जा चुकी है। इस राशि से किसानों तक पराली प्रबंधन मशीनें पहुंचाने, कस्टम हायरिंग सेंटर बनाने और पराली के उपयोग से जुड़ी परियोजनाओं को बढ़ावा देने का काम किया जाएगा।
46 हजार से ज्यादा मशीनें बांटने की तैयारी
धान कटाई के समय किसानों को पराली न जलानी पड़े, इसके लिए इस साल बड़ी संख्या में मशीनें उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई है। योजना के अंतर्गत 46,000 से ज्यादा पराली प्रबंधन मशीनें किसानों तक पहुंचाई जाएंगी, 910 कस्टम हायरिंग सेंटर बनाए जाएंगे, 141 पराली आपूर्ति परियोजनाएं शुरू की जाएंगी। इन मशीनों में हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, स्ट्रॉ रीपर और अन्य कृषि उपकरण शामिल हैं, जिनकी मदद से किसान फसल अवशेष को खेत में ही उपयोग कर सकते हैं।
अब तक बांटी जा चुकी हैं 3.54 लाख से ज्यादा मशीनें
फसल अवशेष प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए साल 2018-19 से अब तक पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कृषि अनुसंधान संस्थानों को 4,266.47 करोड़ रुपये की सहायता दी जा चुकी है। इस दौरान राज्यों में 3.54 लाख से ज्यादा पराली प्रबंधन मशीनें उपलब्ध कराई गई हैं। हालांकि, कई जगह मशीनों के खराब होने की समस्या भी सामने आई है। अब खराब मशीनों की मरम्मत कर उन्हें दोबारा उपयोग में लाने पर जोर दिया जा रहा है।
किसानों के लिए पराली बनेगी कमाई का जरिया
सरकार अब पराली को सिर्फ समस्या नहीं बल्कि संसाधन के रूप में इस्तेमाल करने पर जोर दे रही है। किसानों को बताया जा रहा है कि पराली को बायोगैस प्लांट, एथेनॉल यूनिट, सीबीजी प्लांट और बिजली संयंत्रों तक पहुंचाकर आमदनी हासिल की जा सकती है। अगर गाँव स्तर पर पराली एकत्र कर इन इकाइयों तक पहुंचाई जाती है तो किसानों को अतिरिक्त आय का मौका मिल सकता है।
कम अवधि वाली धान किस्मों और सीधी बुवाई पर जोर
पराली की समस्या कम करने के लिए खेती के तरीके में बदलाव पर भी ध्यान दिया जा रहा है। किसानों को कम समय में तैयार होने वाली और कम पानी की जरूरत वाली धान की किस्में अपनाने की सलाह दी जा रही है। इसके अलावा सीधी बुवाई (Direct Seeding) तकनीक को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे धान कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच किसानों को ज्यादा समय मिल सकता है और पराली जलाने की मजबूरी कम हो सकती है।