सुपर अल नीनो आया तो भारत में खेती पर क्या होगा असर? कौनसी फसलें बोएं, किनसे बचें? मौसम विशेषज्ञ ने समझाया पूरा गणित

Umang | Jun 13, 2026, 15:08 IST
अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA ने अल नीनो के सक्रिय होने और इसके बेहद शक्तिशाली सुपर अल नीनो में बदलने की आशंका जताई है। इस पर सीएसए विश्वविद्यालय के मौसम विशेषज्ञ डॉ. एस. सुनील पांडे ने कहा कि यदि यह स्थिति बनती है तो भारत के मानसून, कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने किसानों को मौसम संबंधी जोखिमों को देखते हुए पहले से तैयारी करने की सलाह दी है।

अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA ने अल नीनो के सक्रिय होने की आधिकारिक पुष्टि कर दी है और इसके बेहद मजबूत होकर "सुपर अल नीनो" में बदलने की आशंका जताई है। एजेंसी के अनुसार यह 1950 के बाद के सबसे शक्तिशाली अल नीनो घटनाक्रमों में शामिल हो सकता है। ऐसे में भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह संकेत चिंता बढ़ाने वाले हैं। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सुपर अल नीनो मजबूत होता है तो इसका सीधा असर दक्षिण-पश्चिम मानसून, कृषि उत्पादन, जल संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।



चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (CSA) के मौसम विशेषज्ञ डॉ. एस. सुनील पांडेय ने कहा कि आईएमडी, स्काईमेट और अन्य मौसम एजेंसियों के आकलन भी ऐसे सुपर अल नीनो की ओर संकेत कर रहे हैं, जो दक्षिण-पश्चिम मानसून को गंभीर रूप से कमजोर कर सकता है। उन्होंने कहा कि भारत की 60-65 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है और बड़े पैमाने पर खेती की जाती है, इसलिए सुपर अल नीनो का प्रभाव व्यापक हो सकता है।



क्या होता है सुपर अल नीनो?

डॉ. एस. सुनील पांडेय के अनुसार जब प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से दो डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है तो उसे सुपर अल नीनो की श्रेणी में रखा जाता है। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियां अल नीनो के और मजबूत होने की ओर इशारा कर रही हैं, जिससे मानसून और कृषि दोनों पर सीधा असर पड़ने की आशंका है।



मानसूनी हवाएं पड़ सकती हैं कमजोर

मौसम विशेषज्ञ ने बताया कि प्रशांत महासागर में बनने वाली व्यापारिक हवाएं (ट्रेड विंड्स) और समुद्री परिस्थितियां भारत आने वाली मानसूनी हवाओं को प्रभावित करती हैं। सुपर अल नीनो के दौरान इन हवाओं की ताकत कमजोर पड़ जाती है, जिससे भारत में मानसूनी हवाओं की रफ्तार कम हो सकती है और बारिश में कमी आ सकती है। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि लगभग 90 प्रतिशत अल नीनो वर्षों में सामान्य से कम वर्षा हुई है। वहीं करीब 65 प्रतिशत मामलों में सूखे जैसी परिस्थितियां बनी हैं। सुपर अल नीनो की स्थिति में यह खतरा और अधिक बढ़ जाता है।



मानसून में देरी और बारिश का असमान वितरण

मौसम विशेषज्ञ के मुताबिक सुपर अल नीनो के कारण मानसून के आगमन में देरी हो सकती है और बारिश का वितरण भी असमान हो सकता है। कुछ क्षेत्रों में लंबे समय तक सूखा बना रह सकता है, जबकि कुछ जगहों पर अचानक अत्यधिक वर्षा या बाढ़ जैसी स्थितियां भी बन सकती हैं। इससे खेती की योजना और फसल प्रबंधन दोनों प्रभावित होते हैं।



बढ़ सकती हैं हीटवेव की घटनाएं

उन्होंने कहा कि जून से सितंबर तक के मानसूनी महीनों में तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना रहती है। सुपर अल नीनो के दौरान लंबे समय तक चलने वाली हीटवेव की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं, जिससे खेतों में नमी की कमी और फसलों पर अतिरिक्त दबाव पैदा होता है।



धान, कपास, मक्का और सोयाबीन की बुवाई पर असर

डॉ. पांडेय ने कहा कि जून और जुलाई में पर्याप्त बारिश नहीं होने की स्थिति में धान, कपास, मक्का, सोयाबीन और दलहनी फसलों की बुवाई समय पर नहीं हो पाती। इससे फसलों की शुरुआती बढ़वार प्रभावित होती है और उत्पादन घटने का जोखिम बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि बढ़ते तापमान और नमी की कमी के कारण फसलों को हीट स्ट्रेस का सामना करना पड़ता है। इसके चलते उत्पादन घटता है, उत्पादकता कम होती है और फसलों की गुणवत्ता पर भी नकारात्मक असर पड़ता है।



सिंचाई लागत बढ़ने से किसानों पर आर्थिक दबाव

डॉ. पांडेय के अनुसार बारिश में कमी आने पर किसानों को सिंचाई पर अधिक निर्भर होना पड़ता है। बारिश की कमी की भरपाई के लिए डीजल पंप और बिजली का अधिक उपयोग करना पड़ता है, जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि जब सरकार किसानों की लागत कम करने और आय बढ़ाने पर जोर दे रही है, तब ऐसी परिस्थितियां किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल सकती हैं।



जल संकट और पशुपालन पर भी असर

उन्होंने बताया कि कुछ क्षेत्रों में बड़े जलाशयों में पर्याप्त पानी उपलब्ध रह सकता है, लेकिन वर्षा आधारित और पूर्वी क्षेत्रों में गंभीर जल संकट पैदा हो सकता है। पानी की कमी का असर केवल फसलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पशुपालन क्षेत्र भी प्रभावित हो सकता है। डॉ. पांडेय ने कहा कि सूखे और जल संकट की स्थिति में पशुओं के लिए पानी और चारे की उपलब्धता प्रभावित होती है। इससे दूध उत्पादन में गिरावट आ सकती है और पशु सामान्य से कम दूध दे सकते हैं। फसल नुकसान और बढ़ती लागत के कारण छोटे और सीमांत किसानों का मुनाफा भी समाप्त हो सकता है, जिससे कर्ज और आर्थिक तंगी की स्थिति पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है।



किसानों को क्या करना चाहिए?

उन्होंने किसानों को संभावित जोखिम से बचने के लिए फसल विविधीकरण और जल संरक्षण पर जोर देने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि किसानों को मोटे अनाज, बाजरा और तिलहनी फसलों की खेती बढ़ानी चाहिए। इसके अलावा कम अवधि में तैयार होने वाली फसल किस्मों को अपनाना भी लाभकारी रहेगा। उन्होंने माइक्रो सिंचाई प्रणाली को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताते हुए कहा कि बूंद-बूंद (ड्रिप) सिंचाई जैसी तकनीकों का अधिक उपयोग किया जाना चाहिए। इससे कम पानी में भी फसलों की सिंचाई संभव होगी और संभावित सूखे की स्थिति में नुकसान को कम किया जा सकेगा।

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