Swachh Bharat Mission:गाँवों में गंदे पानी की समस्या होगी कम! 5.63 लाख गाँवों में तरल कचरा प्रबंधन पूरा, जानिए क्या है सरकार की योजना
गाँवों में स्वच्छता का मतलब सिर्फ़ खुले में शौच से मुक्ति नहीं है। घरों से निकलने वाला गंदा पानी अगर खुले में जमा होता रहे, तो इससे जलभराव, गंदगी और बीमारियों का ख़तरा बढ़ सकता है। इसी वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में तरल कचरे यानी गंदे पानी के बेहतर प्रबंधन पर भी लगातार ज़ोर दिया जा रहा है। सरकार के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़, देश के 5.63 लाख से अधिक गांवों में अब तरल कचरा प्रबंधन की व्यवस्था पूरी हो चुकी है।
जल शक्ति राज्य मंत्री वी. सोमन्ना ने गुरुवार को लोकसभा में लिखित जवाब में बताया कि 7 अगस्त 2026 तक देश के कुल 5,86,944 गाँवों में से 5,63,809 गाँवों को तरल कचरा प्रबंधन की व्यवस्था के दायरे में लाया जा चुका है। यह काम स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के दूसरे चरण के तहत किया जा रहा है।
2020 में शुरू हुआ था मिशन का दूसरा चरण
स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) का दूसरा चरण 1 अप्रैल 2020 से शुरू किया गया था। इसमें गाँवों को खुले में शौच मुक्त बनाए रखने के साथ-साथ ठोस और तरल कचरे के उचित प्रबंधन पर ध्यान दिया जा रहा है। इसका मक़सद गाँवों में ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जिससे घरों और सार्वजनिक स्थानों से निकलने वाले कचरे का निपटारा स्थानीय स्तर पर बेहतर ढंग से हो सके। खास तौर पर घरेलू इस्तेमाल के बाद निकलने वाले गंदे पानी यानी ग्रे-वॉटर को खुले में बहने या जमा होने से रोकने के लिए अलग-अलग तरह की व्यवस्थाएँ विकसित की जा रही हैं।
गाँवों में बनीं 42.98 लाख से अधिक सामुदायिक संपत्तियां
सरकार के अनुसार, ग्रे-वॉटर के प्रबंधन के लिए देशभर में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढाँचा तैयार किया गया है। 7 अगस्त 2026 तक कुल 42,98,194 सामुदायिक संपत्तियां बनाई जा चुकी थीं। इनमें स्थानीय जरूरत और उपलब्ध जगह के हिसाब से अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनमें सोखता गड्ढा, लीच-पिट, मैजिक-पिट, किचन गार्डन, वेस्ट स्टेबिलाइजेशन पोंड और विकेंद्रीकृत अपशिष्ट जल उपचार प्रणाली जैसी व्यवस्थाएँ शामिल हैं। इनका उद्देश्य गंदे पानी को खुले में फैलने से रोकना और उसका स्थानीय स्तर पर उपयोग या उपचार सुनिश्चित करना है।
आबादी के हिसाब से मिलती है आर्थिक मदद
गाँवों में तरल कचरा प्रबंधन की व्यवस्था तैयार करने के लिए सरकार आबादी के आधार पर वित्तीय सहायता भी उपलब्ध करा रही है। 5,000 तक की आबादी वाले गाँवों के लिए अधिकतम 280 प्रति व्यक्ति की सहायता का प्रावधान है। 5,000 से अधिक आबादी वाले गाँवों के लिए अधिकतम 660 प्रति व्यक्ति की सहायता दी जा सकती है। इससे पंचायतों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार गंदे पानी के प्रबंधन की व्यवस्था तैयार करने में आर्थिक मदद मिलती है।
सिर्फ़ एक योजना के फंड पर निर्भर नहीं हैं गाँव
ग्रामीण स्वच्छता से जुड़े कामों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बजट के अलावा दूसरे स्रोतों से भी धन जुटाया जा सकता है। सरकार के अनुसार, राज्यों को स्थानीय जरूरत के हिसाब से वित्त आयोग के अनुदान, मनरेगा, वीबी-जी-राम-जी योजना, CSR फंड और सांसद या विधायक निधि जैसे संसाधनों का इस्तेमाल करने की सुविधा है। इसका मक़सद यह है कि गाँवों में स्वच्छता से जुड़ी योजनाओं के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाए जा सकें और जरूरी काम सिर्फ़ किसी एक फंड पर निर्भर न रहें।
पंचायतों को तकनीकी मदद और जागरूकता पर भी ज़ोर
गंदे पानी के प्रबंधन के लिए केवल ढाँचा तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है। उसे सही तरीके से चलाने और लंबे समय तक बनाए रखने के लिए पंचायतों की क्षमता बढ़ाना भी ज़रूरी है। इसी दिशा में सरकार राज्यों को तकनीकी मैनुअल और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) उपलब्ध करा रही है। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को स्वच्छता और गंदे पानी के उचित निपटारे के प्रति जागरूक करने पर भी ज़ोर दिया जा रहा है। इससे गांवों में जलभराव और गंदगी की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है।
गाँवों की स्वच्छता व्यवस्था को मिल रहा नया विस्तार
स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के दूसरे चरण में अब फोकस सिर्फ़ शौचालय निर्माण या ODF स्थिति बनाए रखने तक सीमित नहीं है। गंदे पानी और ठोस कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन को भी ग्रामीण स्वच्छता का अहम हिस्सा बनाया गया है। 5.63 लाख से अधिक गाँवों में तरल कचरा प्रबंधन की व्यवस्था पूरी होना इसी दिशा में एक बड़ा कदम है।