कंपनियाँ कैसे करती हैं फाइनेंशियल फ्रॉड? राजेश एक्सपोर्ट्स विवाद के बीच जानिए कागज़ों पर गढ़े गए फर्ज़ी कारोबार का खेल

Umang | Jun 05, 2026, 14:31 IST
राजेश एक्सपोर्ट्स पर सेबी की कार्रवाई ने एक बार फिर कॉरपोरेट धोखाधड़ी को लेकर बहस छेड़ दी है। भारत में पहले भी सत्यम और हर्षद मेहता जैसे बड़े मामले सामने आ चुके हैं, जहां निवेशकों का भरोसा टूटा था। आइये जानते हैं कि कंपनियां या बाजार के खिलाड़ी किस तरह वित्तीय हेरफेर करते हैं और निवेशकों को किन बातों से सतर्क रहना चाहिए।

शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध कंपनियों पर निवेशक भरोसा करते हैं। वे मानते हैं कि कंपनी अपनी बैलेंस शीट, सालाना रिपोर्ट और स्टॉक एक्सचेंज को जो आंकड़े देती है, वे उसकी वास्तविक स्थिति को दर्शाते हैं। लेकिन जब इन्हीं आंकड़ों की सच्चाई पर सवाल उठने लगते हैं, तब नुकसान सिर्फ एक कंपनी की साख का नहीं होता, बल्कि पूरे बाज़ार का भरोसा डगमगाने लगता है।



राजेश एक्सपोर्ट्स पर सेबी की हालिया कार्रवाई ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि आखिर कंपनियां वित्तीय हेरफेर कैसे करती हैं। कभी राजस्व बढ़ाकर दिखाया जाता है, कभी मुनाफा। कहीं नकदी के आंकड़े फुला दिए जाते हैं तो कहीं शेयरों की कीमतों में कृत्रिम तेजी पैदा की जाती है। भारतीय कॉरपोरेट इतिहास में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जिन्होंने निवेशकों को बड़ा सबक दिया है।



कंपनियां आमतौर पर कैसे करती हैं वित्तीय हेरफेर?

किसी भी वित्तीय धोखाधड़ी का सबसे आसान तरीका कंपनी के आकार (वैल्यूऐशन) को वास्तविकता से बड़ा दिखाना होता है। इसके लिए राजस्व, मुनाफा, परिसंपत्तियां या नकदी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि निवेशकों को लगे कि कंपनी तेजी से बढ़ रही है और उसका कारोबार मजबूत है। जब बाज़ार को कंपनी की तस्वीर चमकदार दिखाई जाती है, तब शेयरों में निवेश बढ़ता है, कर्ज जुटाना आसान होता है और कंपनी की साख भी मजबूत दिखाई देती है।



ताज़ा केस: राजेश एक्सपोर्ट्स, जब राजस्व के आंकड़ों पर उठे सवाल

सोने के कारोबार से जुड़ी राजेश एक्सपोर्ट्स इस समय सेबी की जांच के दायरे में है। बुधवार को जारी अंतरिम आदेश में सेबी ने आरोप लगाया कि राजेश एक्सपोर्ट्स ने वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच लगभग ₹15.15 लाख करोड़ का राजस्व बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। नियामक के अनुसार, कंपनी की कुछ विदेशी सहायक इकाइयों द्वारा दिखाए गए लगभग 99.8 प्रतिशत राजस्व के आंकड़े संदिग्ध हो सकते हैं। सेबी का आरोप है कि कंपनी द्वारा घोषित कुल राजस्व का 97 से 99 प्रतिशत हिस्सा स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया जा सका और वह विदेशी संस्थाओं से जुड़े लेनदेन पर आधारित था।



राजेश एक्सपोर्ट्स ने सेबी के अंतरिम आदेश पर सफाई देते हुए कहा है कि कंपनी के खिलाफ अभी कोई अंतिम निष्कर्ष, जुर्माना या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई है। कंपनी का दावा है कि उसके वित्तीय आंकड़े और राजस्व पूरी तरह सही हैं। कंपनी के अनुसार, वैलकैंबी के राजस्व और EBITDA को लेकर हुए भ्रम की वजह से लगभग 97 प्रतिशत राजस्व अंतर का मुद्दा सामने आया है। राजेश एक्सपोर्ट्स ने कहा कि वह सभी ज़रूरी दस्तावेज़ सेबी को उपलब्ध करा रही है और जल्द ही स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। कंपनी का यह भी कहना है कि सेबी ने उसकी आय (Earnings) पर कोई सवाल नहीं उठाया है, केवल राजस्व को लेकर संदेह जताया है।



केस 2: सत्यम, जब मुनाफा और बैंक बैलेंस ही फर्जी निकले

जनवरी 2009 में देश की आईटी दिग्गज कंपनी सत्यम कंप्यूटर सर्विसेज से जुड़ा घोटाला सामने आया था। कंपनी के संस्थापक बी. रामलिंगा राजू ने खुद स्वीकार किया कि वर्षों तक खातों में हेरफेर किया गया। कंपनी ने ऐसे मुनाफे दिखाए जो वास्तव में मौजूद नहीं थे। बैंक खातों में नकदी भी वास्तविक से कहीं अधिक दिखाई गई। निवेशक जिस कंपनी को भारतीय आईटी सेक्टर का सितारा मान रहे थे, वह अचानक देश के सबसे बड़े कॉरपोरेट घोटालों में बदल गई। इस खुलासे ने भारतीय शेयर बाज़ार को झकझोर दिया और कॉरपोरेट गवर्नेंस पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।



केस 3: हर्षद मेहता, जब शेयरों की कीमतें हकीकत से कहीं आगे निकल गईं

1992 का हर्षद मेहता घोटाला भारतीय पूंजी बाज़ार के इतिहास का सबसे चर्चित मामला माना जाता है। यह सीधे किसी कंपनी की बैलेंस शीट से जुड़ा मामला नहीं था, लेकिन इसने दिखाया कि वित्तीय व्यवस्था की कमजोरियों का फायदा उठाकर बाज़ार को कैसे प्रभावित किया जा सकता है। हर्षद मेहता ने बैंकिंग प्रणाली की खामियों और फर्जी बैंक रसीदों का इस्तेमाल करते हुए बड़ी मात्रा में धन शेयर बाज़ार में लगाया। इससे कुछ चुनिंदा शेयरों की कीमतें असामान्य रूप से बढ़ गईं। सबसे चर्चित उदाहरण ACC का शेयर था, जिसकी कीमत कुछ महीनों में कई गुना बढ़ गई। जब घोटाले का खुलासा हुआ तो बाज़ार में भारी गिरावट आई और लाखों निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ा। इसके बाद पूंजी बाज़ार में निगरानी व्यवस्था को और मजबूत किया गया।



ऐसे मामले वर्षों तक पकड़ में क्यों नहीं आते?

वित्तीय हेरफेर अक्सर जटिल कॉरपोरेट ढांचे, विदेशी सहायक कंपनियों, संबंधित पक्षों के लेनदेन और पेचीदा अकाउंटिंग प्रक्रियाओं के ज़रिए किया जाता है। कई बार ऑडिट रिपोर्ट में भी शुरुआती स्तर पर गड़बड़ियां सामने नहीं आ पातीं। जब तक कोई व्हिसलब्लोअर सामने नहीं आता, भुगतान संकट पैदा नहीं होता या नियामक जांच शुरू नहीं होती, तब तक कई अनियमितताएं वर्षों तक छिपी रह सकती हैं।



निवेशकों के लिए सबसे बड़ा सबक

राजेश एक्सपोर्ट्स का मामला अभी जांच के अधीन है और अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है। लेकिन सत्यम से लेकर हर्षद मेहता और अब राजेश एक्सपोर्ट्स तक की कहानियां एक समान संदेश देती हैं कि केवल बड़े राजस्व, ऊंचे मुनाफे या चमकदार दावों के आधार पर किसी कंपनी की विश्वसनीयता तय नहीं की जा सकती। निवेशकों के लिए यह ज़रूरी है कि वे केवल आंकड़ों पर नहीं, बल्कि कंपनी की पारदर्शिता, कॉरपोरेट गवर्नेंस, ऑडिट रिपोर्ट और कारोबारी मॉडल पर भी नज़र रखें। क्योंकि शेयर बाज़ार में कई बार सबसे बड़ा जोखिम वहीं छिपा होता है, जहाँ सब कुछ सबसे ज्यादा चमकदार दिखाई देता है।

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