अल नीनो का असर! अगले साल घट सकती है सार्डिन मछलियों की उपलब्धता, जानें क्यों खास हैं ये मछलियाँ

Gaon Connection | Jul 13, 2026, 13:11 IST
अल नीनो के कारण अगले वर्ष भारतीय ऑयल सार्डिन (तेल सार्डिन) मछली की उपलब्धता घट सकती है। आईसीएआर-सीएमएफआरआई का कहना है कि अक्टूबर-दिसंबर 2026 से समुद्री गर्माहट बढ़ने और अप्रैल-मई 2027 तक उत्तरी हिंद महासागर में समुद्री हीटवेव की आशंका है। इससे समुद्री मत्स्य उत्पादन, कोरल रीफ़ और तटीय मत्स्य पालन प्रभावित हो सकते हैं। संस्थान मछुआरों और मत्स्य पालकों के लिए समय-समय पर एडवाइजरी जारी करेगा।

समुद्र का बदलता तापमान अब केवल मौसम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर मछलियों की उपलब्धता और मत्स्य पालन पर भी पड़ने लगा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि समुद्री तापमान लगातार बढ़ता रहा, तो आने वाले समय में कई समुद्री प्रजातियों की संख्या प्रभावित हो सकती है। इसका सीधा असर मछुआरों की आजीविका और समुद्री मत्स्य उत्पादन पर पड़ने की आशंका है।



इसी बीच भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीएमएफआरआई) ने आगाह किया है कि एल नीनो की वजह से अगले वर्ष भारतीय ऑयल सार्डिन (तेल सार्डिन) मछली की उपलब्धता में बड़ी गिरावट आ सकती है। संस्थान का कहना है कि इस वर्ष सार्डिन का भंडार पर्याप्त है, लेकिन यदि अनुमानित समुद्री गर्माहट बढ़ी तो वर्ष 2027 में इसकी उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।



क्यों खास है यह मछली

भारतीय तेल सार्डिन एक बहुत ही महत्वपूर्ण पेलाजिक मछली प्रजाति है जो भारत में कुल समुद्री मछली उत्पादन में लगभग 15% का योगदान देती है। तेल सार्डिन के स्थानीय नाम हैं, मथी, नल्ला मथी, नेई चाला (मलयालम); भुताई (कन्नड़); तारली (मराठी और हिंदी); नोनालाई, पेइचलाई (तमिल); नूना-कवल्लू (तेलुगु); न्ना कवाला, डिस्को कबाला (उड़िया) है। यह मछली पोषक तत्वों से भरपूर और किफायती होने के साथ-साथ लगभग पूरे वर्ष प्रचुर मात्रा में पाई जाती है।



यह कई उद्योगों में उपयोग होने वाले सार्डिन तेल और पशुओं और मुर्गी पालन के लिए मछली के चारे के रूप में उपयोग होने वाले मछली-भोजन जैसे मूल्यवान उप-उत्पादों का भी स्रोत है। इसके मत्स्य पालन में मौसमी, वार्षिक और दशकीय स्तर पर उल्लेखनीय उतार-चढ़ाव देखे जाते हैं। तेल सार्डिन मत्स्य पालन के सफल वर्ष मछली पकड़ने वाले समुदाय के लिए उतनी ही समृद्धि लाते हैं, जितनी इसकी विफलता एक बड़ा आर्थिक झटका साबित होती है।



अक्टूबर से तेज़ होगा अल नीनो का असर, 2027 में बढ़ सकती हैं समुद्री हीटवेव

सीएमएफआरआई के निदेशक ग्रिन्सन जॉर्ज ने बताया कि अल नीनो से जुड़ी गर्माहट अक्टूबर से दिसंबर 2026 के दौरान और तेज़ होने की संभावना है। इसका प्रभाव अप्रैल-मई 2027 तक उत्तरी हिंद महासागर में महसूस किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि उपलब्ध वैज्ञानिक संकेत बताते हैं कि अप्रैल और मई 2027 के दौरान समुद्री हीटवेव, समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि और लवणता बढ़ने की संभावना है। ऑयल सार्डिन जैसी छोटी पेलाजिक मछलियाँ समुद्री गर्मी और हीटवेव के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होती हैं। ऐसे हालात बनने पर इनकी संख्या घट सकती है, जिससे कुल समुद्री मत्स्य उत्पादन पर भी असर पड़ने की आशंका है।



उन्होंने यह भी बताया कि लंबे समय तक समुद्र का तापमान बढ़ने से प्रवाल भित्तियाँ (कोरल रीफ़) प्रभावित हो सकती हैं। इससे कोरल ब्लीचिंग की स्थिति पैदा होगी और रेड स्नैपर जैसी प्रवाल भित्तियों पर निर्भर मछलियों की प्राकृतिक उपलब्धता भी कम हो सकती है।



मछुआरों और मत्स्य पालकों को जारी होंगी सलाह, समुद्री हालात पर निगरानी ज़रूरी

सीएमएफआरआई ने कहा है कि संभावित एल नीनो के असर को देखते हुए इस वर्ष मछुआरों और मत्स्य पालकों के लिए समय-समय पर परामर्श (एडवाइजरी) जारी किए जाएँगे, ताकि वे बदलते समुद्री हालात के अनुसार तैयारी कर सकें। संस्थान ने यह भी आगाह किया कि लंबे समय तक अधिक तापमान और लवणता रहने के बाद यदि अचानक तेज़ बारिश होती है, तो समुद्री और तटीय क्षेत्रों में लवणता का स्तर तेज़ी से बदल सकता है। इससे तटीय मत्स्य पालन और जलीय कृषि गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती हैं।



ग्रिन्सन जॉर्ज ने कहा कि समुद्री परिस्थितियों की लगातार निगरानी और परिस्थितियों के अनुरूप प्रबंधन अपनाना ज़रूरी होगा, ताकि जलवायु परिवर्तन से समुद्री संसाधनों, मछुआरों और तटीय मत्स्य पालकों की आजीविका पर पड़ने वाले असर को कम किया जा सके। इस दौरान सीएमएफ़आरआई के वैज्ञानिकों ने तटीय मत्स्य पालन, केज फ़िश कल्चर, समुद्री मछली बीज उत्पादन, ब्लैक सोल्जर फ़्लाई आधारित जैविक अपशिष्ट प्रबंधन, फ़ीड निर्माण तथा मत्स्य पालकों के लिए उपलब्ध सरकारी योजनाओं और सब्सिडी से जुड़ी तकनीकी जानकारी भी साझा की।

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