पेंच से सह्याद्री तक: कोयना के जंगलों में छोड़ी गई बाघिन, पश्चिमी घाट में बाघों के भविष्य को नई उम्मीद
पेंच टाइगर रिजर्व की बाघिन STR-T6 को कोयना क्षेत्र में छोड़ा गया। यह कदम पश्चिमी घाट में बाघों की आबादी मजबूत करने और नए आवास विकसित करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
उत्तरी पश्चिमी घाट के जंगलों में बाघों की मौजूदगी मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। महाराष्ट्र में पेंच टाइगर रिजर्व से लाई गई एक बाघिन STR-T6 को सह्याद्री टाइगर रिजर्व के कोयना क्षेत्र में सफलतापूर्वक छोड़ दिया गया। इस अभियान को वैज्ञानिक योजना, कई संस्थाओं के सहयोग और सूक्ष्म निगरानी के साथ अंजाम दिया गया।
यह केवल एक बाघिन का स्थानांतरण नहीं, बल्कि एक बड़े संरक्षण प्रयास का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य पश्चिमी घाट के उन जंगलों में बाघों की स्थायी आबादी स्थापित करना है, जहाँ उपयुक्त आवास होने के बावजूद उनकी संख्या कम रही है।
सह्याद्री टाइगर रिजर्व का कोयना क्षेत्र घने जंगलों, जल स्रोतों और शिकार प्रजातियों से समृद्ध है। इसके बावजूद यहाँ बाघों की संख्या लंबे समय तक सीमित रही। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से बाघों को बसाने से नई आबादी विकसित की जा सकती है और जंगलों का पारिस्थितिक संतुलन मजबूत किया जा सकता है।
इसी रणनीति के तहत पेंच टाइगर रिजर्व से एक स्वस्थ और उपयुक्त उम्र की बाघिन का चयन किया गया। उसे पकड़ने से पहले उसके स्वास्थ्य, व्यवहार और अनुकूलन क्षमता का आकलन किया गया, ताकि नए क्षेत्र में उसके सफलतापूर्वक बसने की संभावना अधिक रहे।
इस पूरे अभियान में कई संस्थाओं और टीमों ने मिलकर काम किया। सह्याद्री टाइगर रिजर्व, पेंच टाइगर रिजर्व, ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व, वन्यजीव रेस्क्यू संगठन और वन्यजीव संस्थान के शोधकर्ताओं ने संयुक्त रूप से इस ट्रांसलोकेशन को अंजाम दिया।
बाघिन को पकड़ने से लेकर उसके परिवहन और नए जंगल में छोड़ने तक की हर प्रक्रिया वैज्ञानिक प्रोटोकॉल के तहत की गई। उसे “हार्ड रिलीज़” पद्धति से छोड़ा गया, यानी उसे सीधे जंगल में स्वतंत्र रूप से छोड़ दिया गया ताकि वह स्वाभाविक रूप से अपना इलाका चुन सके और अपने व्यवहार के अनुसार ढल सके।
उत्तरी पश्चिमी घाट में बाघों के आवास कई जगहों पर खंडित हैं। इससे बाघों का आवागमन और प्रजनन प्रभावित होता है। ट्रांसलोकेशन जैसे कदम इन अलग-थलग पड़े जंगलों में नई आबादी बसाने और आनुवंशिक विविधता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अगर STR-T6 सफलतापूर्वक कोयना क्षेत्र में बस जाती है और भविष्य में प्रजनन करती है, तो यह पूरे इलाके में बाघों की संख्या बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।
भारत में बाघ संरक्षण की रणनीति अब केवल संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य अलग-अलग जंगलों के बीच संतुलन बनाना और ऐसे क्षेत्रों को भी आबाद करना है जहाँ उपयुक्त आवास होने के बावजूद बाघ कम हैं।
बाघिन को छोड़ने के बाद सबसे महत्वपूर्ण चरण उसकी निगरानी का होता है। आमतौर पर ऐसे मामलों में बाघों पर रेडियो कॉलर या अन्य ट्रैकिंग तकनीकों के माध्यम से नजर रखी जाती है। इससे यह समझा जाता है कि वह नए इलाके में कैसे ढल रही है, उसका मूवमेंट कैसा है और क्या वह सफलतापूर्वक शिकार कर पा रही है।
यदि बाघिन नए क्षेत्र में अनुकूलित हो जाती है और वहाँ स्थायी रूप से बस जाती है, तो यह सह्याद्री क्षेत्र में बाघों की स्थिर आबादी बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
पेंच से कोयना तक STR-T6 का सफर केवल एक वन्यजीव अभियान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच, संस्थागत सहयोग और दीर्घकालिक संरक्षण दृष्टि का उदाहरण है। यह पहल दिखाती है कि यदि सही योजना और समन्वय हो, तो खाली पड़े जंगलों में भी बाघों की वापसी संभव है।