ट्रेन से सफर कर रहा है किंग कोबरा? बढ़ सकता है मानव-वन्यजीव संघर्ष

Divendra Singh | Feb 09, 2026, 12:34 IST
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पश्चिमी घाट के किंग कोबरा अनजाने में ट्रेनों में छिपकर लंबी दूरी तय कर रहे हैं। लेकिन ऐसे सूखे और निचले क्षेत्रों में पहुँचने के बाद उनके जिंदा रहने की संभावना कम हो जाती है।
पश्चिमी घाट में किंग कोबरा अनजाने में ट्रेनों के जरिए लंबी दूरी तय कर सकते हैं।
सोचिए, आप आराम से ट्रेन में सफर कर रहे हों और अचानक खबर मिले कि उसी ट्रेन में कहीं एक पाँच फीट लंबा किंग कोबरा भी मौजूद है। सुनने में यह किसी फिल्म का दृश्य लगता है, लेकिन वैज्ञानिकों के एक हालिया अध्ययन ने ऐसी ही एक हैरान कर देने वाली संभावना को सामने रखा है, किंग कोबरा अनजाने में ट्रेनों के जरिए लंबी दूरी का सफर कर रहे हैं।

भारत के पश्चिमी घाट के घने, नम और ठंडे जंगल किंग कोबरा का प्राकृतिक घर माने जाते हैं। यह दुनिया का सबसे लंबा विषैला साँप है, जो आम तौर पर ऐसे जंगलों में रहता है जहाँ शिकार, पानी और छिपने की जगह भरपूर मिलती है। लेकिन अब वैज्ञानिकों के सामने एक नया सवाल खड़ा हुआ है, आखिर ये जंगलों में रहने वाले कोबरा रेलवे पटरियों तक कैसे पहुँच रहे हैं, और ट्रेन का सफर क्यों कर रहे हैं?

वैज्ञानिक पत्रिका Biotropica में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, किंग कोबरा (Ophiophagus kaalinga) अनजाने में ट्रेनों के जरिए अपने प्राकृतिक आवास से दूर पहुँच सकते हैं। इससे न केवल उनके वितरण में बदलाव आ सकता है, बल्कि संरक्षण और लोगों की सुरक्षा से जुड़े नए सवाल भी सामने आते हैं।

इस अध्ययन का नेतृत्व सूरत के जीवविज्ञानी दिकांश एस. परमार ने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम के साथ मिलकर किया। वे बताते हैं कि यह विचार अचानक नहीं आया, बल्कि एक वास्तविक घटना से शुरू हुआ। साल 2023 में जब वे गोवा के Animal Rescue Squad के साथ काम कर रहे थे, तब उन्हें एक कॉल मिली कि चांदर रेलवे स्टेशन पर एक किंग कोबरा देखा गया है।

चांदर रेलवे स्टेशन पर किंग कोबरा।
चांदर रेलवे स्टेशन पर किंग कोबरा।


वे याद करते हैं, “जब मैं वहाँ पहुँचा, तो देखा कि प्लेटफॉर्म के पास पाँच फीट से भी लंबा किंग कोबरा मौजूद था। यह जगह उसके प्राकृतिक आवास से बिल्कुल अलग थी।”

लेकिन ये पहली बार नहीं था, इससे पहले वो सूरत रेलवे स्टेशन पर भी साँप को रेस्क्यू कर चुके थे। दिकांश कहते हैं, "साल 2017 की बात होगी जब मुझे रात में 12 बजे कॉल आयी की सूरत रेलवे स्टेशन पर सॉप दिखाई दिया, सामने से कॉल करने वाला घबराया हुआ था, जब मैं पहुँचा तो भीड़ इकट्ठा थी, किसी तरह सॉप को रेस्क्यू करके जंगल में छोड़ा।

यही घटनाएँ इस शोध की शुरुआत बनी। फिर उन्होंने जर्मनी के Leibniz Institute for the Analysis of Biodiversity Change के साथ मिलकर इस पर अध्ययन शुरू किया। इसके बाद वैज्ञानिकों ने 2002 से 2024 तक के 22 वर्षों के बचाव रिकॉर्ड और स्थानीय रिपोर्टों का विश्लेषण किया। इस दौरान गोवा में किंग कोबरा के कुल 47 मामलों का रिकॉर्ड मिला, 18 उत्तरी गोवा और 29 दक्षिणी गोवा में। इन स्थानों में पहाड़ी जंगलों के साथ-साथ निचले इलाकों के कस्बे भी शामिल थे।

गोवा में पश्चिमी घाट किंग कोबरा का अनुमानित वितरण।
गोवा में पश्चिमी घाट किंग कोबरा का अनुमानित वितरण।<br>


सांख्यिकीय मॉडलिंग से पता चला कि किंग कोबरा का प्राकृतिक वितरण घने जंगलों और नदियों के आसपास केंद्रित होता है। लेकिन पाँच स्थान ऐसे भी मिले जहाँ आवास पूरी तरह नहीं था। यानी वहाँ किंग कोबरा का होना स्वाभाविक नहीं था। यही वह संकेत था, जिसने वैज्ञानिकों को रेलवे से जुड़े कारणों की ओर ध्यान दिलाया।

गोवा के जंगलों में कई रेल लाइनें सीधे वन क्षेत्रों के बीच से गुजरती हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि किंग कोबरा कभी-कभी शिकार या आश्रय की तलाश में पटरियों के पास पहुँच जाते हैं। इसी दौरान वे मालगाड़ियों या खड़े डिब्बों में चढ़ जाते हैं और अनजाने में लंबी दूरी तय कर लेते हैं। इस तरह वे अपने प्राकृतिक घर से दूर, ऐसे इलाकों में पहुँच जाते हैं जहाँ उनके लिए न भोजन होता है, न सुरक्षित आश्रय।

दिकांश बताते हैं, "क्योंकि कर्नाटक से होकर आने वालीं रेलगाड़ियाँ पश्चिमी घाट के जगलों से होकर गुजरती हैं, कई बार वो रास्ते में खड़ी होती हैं, बस वहीं से साँप भी ट्रेन पर चढ़ जाते होंगे।"

वो आगे कहते हैं, "साँपों का मिलना ऐसा था जैसे रेगिस्तान में ध्रुवीय भालू मिल जाए। हमारे मॉडल साफ दिखाते थे कि ये साँप वहाँ नहीं होने चाहिए थे। एकमात्र तार्किक कड़ी रेलवे लाइन थी, जो गहरे जंगलों से तटीय कस्बों तक एक ज़रिया बन रहीं थीं।"

लेकिन ऐसे सूखे और निचले क्षेत्रों में पहुँचने के बाद उनके जिंदा रहने की संभावना कम हो जाती है। इसके साथ ही इंसान-वन्यजीव संघर्ष का खतरा भी बढ़ जाता है। अचानक किसी कस्बे या स्टेशन पर बड़ा विषैला साँप दिखाई देने से लोगों में डर फैल जाता है और कई बार लोग उसे मार भी देते हैं।

चांदर रेलवे स्टेशन पर 13 फीट लंबे कोबरा को रेस्क्यू करते रिंकू।
चांदर रेलवे स्टेशन पर 13 फीट लंबे कोबरा को रेस्क्यू करते रिंकू।


किंग कोबरा पारिस्थितिकी तंत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह मुख्य रूप से दूसरे साँपों को खाता है और जंगलों में जैविक संतुलन बनाए रखता है। यदि ऐसे शीर्ष शिकारी कम हो जाएँ, तो पूरा पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित हो सकता है।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि रेलवे लाइनें जंगलों में वन्यजीवों के प्राकृतिक रास्तों को प्रभावित करती हैं। कई जानवर पटरियों के आसपास घूमते रहते हैं और ट्रेनों के संपर्क में आ जाते हैं। किंग कोबरा जैसे बड़े और तेज़ी से चलने वाले साँप इस तरह अनजाने में ट्रेन पर चढ़ सकते हैं।

वन्यजीव रेस्क्यू टीमें अब ऐसे मामलों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। जब भी किसी इलाके में किंग कोबरा दिखाई देता है, तो उसे सुरक्षित तरीके से पकड़कर उसके प्राकृतिक आवास में छोड़ा जाता है। इससे साँप और इंसान दोनों सुरक्षित रहते हैं।

शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके पीछे कुछ व्यावहारिक कारण भी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, अनाज या फल ढोने वाली ट्रेनों में चूहे और छोटे जीव आकर्षित होते हैं, जो साँपों के लिए भोजन बन सकते हैं। इसके अलावा, भारी बारिश या बाढ़ के समय जब उनके बिल पानी से भर जाते हैं, तो वे सूखी जगह की तलाश में रेलवे डिब्बों में घुस सकते हैं।

समाधान के तौर पर वैज्ञानिकों ने कुछ सुझाव भी दिए हैं, जंगल क्षेत्रों में ट्रेनों के गैरज़रूरी ठहराव को कम करना, डिब्बों में बचा खाना न छोड़ना ताकि चूहे आकर्षित न हों, और जंगलों के क्षरण को रोकना ताकि साँप पटरियों तक आने को मजबूर न हों।

(Hero Image Courtesy: समीर लखानी ने खिड़की पर बैठे इस कोबरा की तस्वीर खींची और सुरक्षित रूप से उसका रेस्क्यू किया। यह घटना लोकशक्ति एक्सप्रेस में हुई, जो मुंबई की ओर जा रही थी। सांप तब मिला जब ट्रेन वलसाड स्टेशन के पास चल रही थी।)

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