शिक्षा का असली मकसद: संस्कार, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता
आजाद भारत को शिक्षा का जो धरातल मिला, उसमें संस्कार और प्रेरणा का अभाव था, इसलिए स्वाभिमानी और स्वावलम्बी नागरिक पैदा नहीं हुए। इस उद्देश्य को मैकाले ने यह कहकर व्यक्त किया था कि हमें क्लर्क पैदा करना है। अंग्रेज भारतवासियों को डॉक्टर, इंजीनियर अथवा तकनीकी लोग नहीं बनाना चाहते थे। आजादी के बाद भी भारतीय छात्रों के सामने लक्ष्य बना रहा कि पढ़-लिखकर नौकरी पाना है, और आज भी लगभग वही लक्ष्य है। इसी उद्देश्य से हमारी शिक्षा नीति बनती रही और शिक्षा पर सरकारी बजट का पांच प्रतिशत से भी कम खर्च होता रहा।
स्वतंत्रता संग्राम और मानसिकता का प्रभाव
40 के दशक में जब द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था, तो हमारे देश के नौजवान अंग्रेजों की फौज में अंग्रेज और अंग्रेजियत को बचाने में काम कर रहे थे। जब देश में आजादी की आवाज उठी, तो स्वतंत्रता संग्राम में स्वतंत्रता सेनानियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया, लेकिन न तो वह सेनानी थे और न ही वह संग्राम था। जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भारतीय राष्ट्रीय सेना ने संग्राम शुरू किया, तो यह वास्तविक संग्राम था, लेकिन परिस्थितिवश अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाया। जब दक्षिण अफ्रीका से गांधी जी देश में आजादी के लिए जुटे, तब वह सत्य और अहिंसा पर आधारित सत्याग्रह था और सही अर्थों में वह कामयाब भी हुआ। लेकिन सत्याग्रहियों ने लाठी, डंडे और कोड़े खाकर सहनशीलता का परिचय दिया, पर भारतवासियों में जुझारू मानसिकता और संघर्षशील व्यक्तित्व पैदा नहीं कर सका। उधर अंग्रेज द्वितीय विश्व युद्ध में परास्त हो चुके थे और सम्मानपूर्वक भारत की जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थे। उनके लिए सत्याग्रह का मुकाबला करना भी मुश्किल हो गया था। अंग्रेज भारत छोड़कर इसे विभाजित करके अपने देश चले गए, लेकिन भारत के नागरिक सहनशीलता के भाव से शांतिपूर्ण ढंग से जीवन बिताते रहे। इस सबका प्रभाव भारतीय जीवन और शिक्षा पद्धति पर भी पड़ा। मैं समझता हूं कि यदि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में भारत को आजादी मिली होती, तो आज का भारत शांतिपूर्ण और सहनशील भले ही कुछ कम होता, लेकिन उद्यमशील और जुझारू जरूर होता।
नेतृत्व और विकास की दिशा
गाँधी जी सत्य और अहिंसा के सूत्रधार थे और सनातन मूल्यों को अपने जीवन में उतारने वाले महापुरुष थे, लेकिन जब आजाद भारत की बागडोर संभालने का समय आया, तो उन्होंने पटेल की जगह नेहरू जी को देश की बागडोर सौंपी। उन्होंने सोच-समझकर ही ऐसा किया होगा, लेकिन यह भी सच्चाई है कि नेहरू जी के मन में सनातन मूल्य, ग्राम स्वराज और कुटीर उद्योग-धंधों के प्रति वह लगाव नहीं था, जिसकी गांधी जी अपेक्षा करते थे। भारत विभाजन से भी गांधी जी को बहुत पीड़ा हुई थी। जो भी हो, नेहरू जी की अपनी सोच थी। नेहरू जी आजाद भारत को तेज रफ्तार से आगे बढ़ाना चाहते थे और बड़े उद्योग-धंधों, बड़े विद्युत परियोजनाओं तथा केंद्रीय व्यवस्था के अंतर्गत देश का विकास चाहते थे, जैसा तत्कालीन साम्यवादी रूस में हो रहा था। लेकिन वह सब नेहरू जी शांतिपूर्ण रास्ते से लाना चाहते थे। यह तो नहीं पता कि यदि वल्लभभाई पटेल के हाथ में देश की बागडोर गांधी जी ने सौंपी होती, तो विकास की दिशा किधर होती, लेकिन इतना जरूर है कि वल्लभभाई को गाँव और ग्रामीण जीवन का अधिक अनुभव था। आजाद भारत का इतिहास बताता है कि तेज विकास के लिए अपनाया गया पब्लिक सेक्टर और उद्योग एक प्रयास में असफल रहे, तथा दूसरी तरफ देश के किसानों की 70% आबादी में कोई जोश नहीं था, वह अपना जीवन किसी प्रकार चलाती रही। इस प्रक्रिया का अंत 60 के दशक में भुखमरी और अन्न की कमी के साथ हुआ। नेहरू जी का गाँव से परिचय कम ही था, क्योंकि वह विदेशों में पले-बढ़े और अंग्रेज तथा अंग्रेजियत को निकट से जानते थे।
शिक्षा नीति और मौलिक चिंतन की कमी
उन्होंने आजाद भारत के पहले मंत्रिमंडल में मौलाना अबुल कलाम आजाद को देश का शिक्षा मंत्री बनाया। मौलाना आजाद विद्वान व्यक्ति थे, लेकिन अरबी और फारसी के विद्वान थे। शायद अधिक प्रभावी होते यदि भारतीय भाषाओं में महारत होती। उनका सनातन संस्कृति, भारतीय परंपराओं और गांधी जी के भारत से अधिक संपर्क नहीं था। गांव में रहने का अनुभव भी कम था। यही कुछ कारण थे कि आजाद भारत में भारतीय पृष्ठभूमि पर आधारित मौलिक चिंतन वाली, स्वावलम्बन और स्वाभिमान जगाने वाली शिक्षा प्रारंभ नहीं हो पाई। मौलिक चिंतन के बिना क्लर्क बनाने वाली मानसिकता का ही जन्म हो सकता था, और वही हुआ।
इतिहास और आत्मसम्मान का प्रश्न
कई बार ध्यान में आता है कि हजारों साल के इतिहास वाले और एक से एक बढ़कर योद्धाओं के देश में नागरिकों का आत्मविश्वास और स्वाभिमान इतना दबा हुआ क्यों है। यदि हम विचार करें, तो अंग्रेजों ने हमें जो कुछ पढ़ाया अथवा आजाद भारत में पढ़ाया गया, वह देश में स्वाभिमानी नागरिक पैदा करने के लिए नहीं था। यदि हम बाबर, अकबर तथा औरंगजेब द्वारा आक्रमण और भारतीयों की पराधीनता बताते रहेंगे और राणा सांगा, महाराणा प्रताप तथा शिवाजी की कहानियों को उजागर नहीं करेंगे, तो हमारे बच्चों में शर्मिंदगी और हीनभाव पैदा होगा, न कि स्वाभिमान और देशाभिमान। यह सच हो सकता है कि बाबर से लड़ते हुए राणा सांगा के शरीर में 80 घाव होने के बाद उनकी सेना पराजित हुई, लेकिन वह कहीं विजयी भी हुए होंगे, तो उनकी विजय गाथाओं की चर्चा नहीं होती। औरंगजेब की दक्षिण तक विजय यात्रा तो पढ़ाई जाती है, लेकिन शिवाजी महाराज की शौर्य गाथाएं नहीं बताई जातीं। ऐसा क्यों होता है, इस पर भी विचार होना चाहिए। जब हम बताते हैं कि सिकंदर ने भारत पर हमला किया था और विश्व विजय की यात्रा पर निकला था, लेकिन वह भारत से टकराकर लौट गया, उसकी सेना ने आगे बढ़ने से इंकार कर दिया, तो यह नहीं बताया जाता कि सही अर्थों में पुरु के साथ युद्ध में सिकंदर नहीं जीता था। अन्यथा विश्व विजय पर निकला हुआ सिकंदर आखिर यहीं से क्यों लौट गया, आगे क्यों नहीं बढ़ा।
शिक्षा सामग्री और राष्ट्रीय चेतना
ज्यादा पुरानी बातें न भी सोचें, तो हमारे स्कूल-कॉलेजों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद और ऐसे ही अनेक योद्धाओं की कहानियां नहीं पढ़ाई जातीं, बल्कि बताया जाता है कि शांति और अहिंसा के रास्ते पर चलने का प्रयास करना चाहिए और सेनाओं तथा युद्धाभ्यास की उपेक्षा करनी चाहिए, चाहे फिर चीन के हाथों पराजय ही क्यों न हो जाए। शिक्षण सामग्री का चयन मानव निर्माण और राष्ट्रीय चेतना को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
स्वदेशी, चिकित्सा और परंपरा का महत्व
देश में स्वाभिमानी नागरिक पैदा करने के लिए स्वदेशी और विदेशी का विचार भी आवश्यक है। मैं समझता हूं कि गांधी जी ने खादी का प्रचार-प्रसार करके भारतीयों में स्वाभिमान की भावना जगाई थी और स्वदेशी सामान का प्रयोग करके वर्तमान सरकार भी कुछ प्रयास कर रही है। यह अफसोस की बात है कि हजारों साल के लंबे अनुभव के बाद विकसित हुआ आयुर्वेद आजाद भारत में उचित स्थान नहीं पा सका और एलोपैथिक पर बड़े-बड़े शोध संस्थान और अस्पताल बनते रहे। आयुर्वेद का ज्ञान भारतीय मानसिकता के अनुकूल है, क्योंकि वह निश्चित रूप से शाकाहारी पदार्थों से बनी दवाइयों और रोगों को जड़ से समाप्त करने की विधा पर जोर देता है। वैसे तो यूनानी पद्धति भी अच्छी और पुरातन है, लेकिन उसे शाकाहार के तराजू पर खड़ा नहीं उतार सकते। इन स्वदेशी पद्धतियों में साइड इफेक्ट नहीं होता, लाभ थोड़ा देर से होता है। इसके विपरीत एलोपैथिक दवाइयां हानिकारक भी हो सकती हैं और उनके साइड इफेक्ट भी होते हैं, फिर भी आजाद भारत ने सारी ताकत एलोपैथिक के विकास पर लगा दी। अब जाकर एलोपैथिक की लाभकारी विधियां, जैसे शल्य चिकित्सा और निदान की विधियां, आयुर्वेद में सम्मिलित की जा रही हैं। आशा है शिक्षा, चिकित्सा और शारीरिक प्रतिस्पर्धा में अपने पुरातन तरीकों को विस्मृत नहीं किया जाएगा।
वैश्विक तुलना और शिक्षा की भूमिका
हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि क्या कारण है कि दुनिया के तमाम देश हमसे अधिक विषम परिस्थितियों को झेलते हुए आगे निकल गए और हम पीछे रह गए। जर्मनी और जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध में तमाम संकट झेले थे, लेकिन आज वे अग्रणी भूमिका में हैं। इसी प्रकार रूस और चीन के लोगों ने भले ही विकास की कीमत आजादी खोकर चुकाई है, लेकिन वे भी आगे बढ़ रहे हैं। भौतिक विकास पाने के लिए शारीरिक और मानसिक पक्ष को भी ध्यान में रखना चाहिए और उसके लिए शिक्षा और चिकित्सा उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितना औद्योगिक और वैज्ञानिक पक्ष।
भाषा, इतिहास और भविष्य की दिशा
अनायास ध्यान में आता है कि यदि आजाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद के स्थान पर कोई दूसरा व्यक्ति होता, तो क्या अंतर पड़ता। वैसे नेहरू जी ने कहा था कि भगवान ने आंखें सामने दी हैं, अर्थात इतिहास पर बहुत अधिक आग्रह करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में देखते हुए इतिहास की गलतियों से लाभ तो उठाया जा सकता है। इतना जरूर है कि दुनिया के जो देश आगे बढ़ रहे हैं, वे अपनी भाषा के माध्यम से शिक्षा देते हुए और उसमें शोध करते हुए बढ़ रहे हैं। भले ही दूसरी भाषाओं में किए गए शोध का लाभ भी मिलता रहता है। लेकिन हमारे देश की तो कोई राष्ट्रभाषा ही नहीं है, तब बाकी क्या कहा जाए। प्रत्येक नागरिक को अपने अतीत और सनातन इतिहास का ज्ञान हो, उसकी उपलब्धियों पर गर्व हो और जहाँ तक हो सके, पुरातन को युवानुकूल बनाकर वर्तमान में उसका लाभ उठाया जा सके। जब विदेशों में संस्कृत भाषा पर इस बात के लिए शोध हो रहा है कि क्या इसे कंप्यूटर भाषा के रूप में विकसित किया जा सकता है अथवा नहीं, तो हमें भी इन पक्षों पर विचार करना चाहिए।
इतिहास से सीख और राष्ट्रीय एकता
भारत के हजारों साल के गौरवशाली इतिहास में पराजय और पराधीनता के अवसर इसलिए नहीं आए कि देश में योद्धाओं की कमी थी, बल्कि इसलिए कि हमारे बीच मुखबिर बैठे थे, आपस में अहंकार के कारण भेदभाव थे और आक्रांताओं ने विजय प्राप्त की। पुरु के समय अंबी, पृथ्वीराज के समय जयचंद और चंद्रशेखर आजाद की मुखबिरी करने वाला कोई तिवारी था। महाराणा प्रताप की अकबर के सामने स्थिति अलग होती, यदि उनके सगे भाई शक्तिसिंह और जयपुर के राजा मानसिंह उनके साथ होते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इतिहास दुर्भाग्यपूर्ण रहा। आज भी बहुत से भारतीय देश-विदेश में भारत की आलोचना करते हैं। ऐसे में स्वाभिमानी और आत्मविश्वासी नागरिक पैदा होने में कठिनाई होगी। लेकिन इन समस्याओं का समाधान हमारी राष्ट्रवादी शिक्षा में और ऐसी संस्थाओं में है, जो समाज को सही दिशा दे सकें। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो इतिहास अपने आप को दोहराता रहेगा।