Animal Husbandry: छोटे पशु कराएं बड़ी आमदनी, यूपी सरकार दे रही पूरी मदद
घर के आंगन में बंधी बकरियां, चरवाहे संग चलता भेड़ों का छोटा-सा झुंड या घर के पीछे बना सूकर का बाड़ा। ग्रामीण परिवारों के लिए ये रोज की आमदनी का जरिया हैं। उत्तर प्रदेश में लघु पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए सरकारी योजनाओं, नस्ल सुधार, पशु स्वास्थ्य सेवाओं और सब्सिडी के जरिए छोटे पशुपालकों से लेकर बड़े उद्यमियों तक को प्रोत्साहित करने की कोशिश की जा रही है।
गांवों में किसानों के लिए छोटे पशु पालना आजीविका का साधन बन सकते हैं। इन पशुओं की खासियत यह है कि इन इकाइयों को अपेक्षाकृत कम जगह में शुरू किया जा सकता है। हालांकि, इससे होने वाली कमाई पशुओं की नस्ल, चारे की उपलब्धता, देखभाल, बाजार और प्रबंधन पर निर्भर जरूर करती है, लेकिन इनका पालन किसान आसानी से कम पूंजी में कर सकते हैं।
बकरी पालन के लिए पाएं 90 प्रतिशत सब्सिडी
उत्तर प्रदेश में पशुपालन विभाग के अपर मुख्य सचिव मुकेश मेश्राम के मुताबिक, “राज्य में छोटे पशुपालकों को बकरी और भेड़ पालन से जोड़ने के लिए योजनाएं चलाई जा रही हैं। बकरी पालन की एक योजना में पांच बकरियों और एक बकरे की इकाई के लिए 60 हजार रुपये की लागत निर्धारित है। इसमें लाभार्थी का अंशदान छह हजार रुपये और सरकार की ओर से 54 हजार रुपये की सहायता का प्रावधान है।
मेश्राम आगे बताते हैं, देश में बकरियों की ऐसी नस्लें भी हैं, जिन्हें कम जगह में पाला जा सकता है। इसके अलावा, भेड़ पालन और सूकर पालन के लिए भी योजनाएं हैं। बड़े स्तर पर पशुपालन शुरू करने के इच्छुक उद्यमियों को केंद्र सरकार के राष्ट्रीय पशुधन मिशन (National Livestock Mission) से भी सहायता मिलती है। विभाग पशुपालकों को बेहतर नस्ल चुनने, पशुओं की देखभाल और उपलब्ध योजनाओं की जानकारी देने के लिए जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित कर रहा है।”
लघु पशु योजना में कैसे करें आवेदन? कहां से मिलेगी पूरी जानकारी?
पशुपालन विभाग के निदेशक, प्रशासन एवं विकास डॉ. राजेंद्र प्रसाद बताते हैं, “योजनाओं का प्रचार-प्रसार सोशल मीडिया समेत विभिन्न माध्यमों से किया जा रहा है। इच्छुक पशुपालक अपने क्षेत्र के पशु चिकित्सा अधिकारी या मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी के कार्यालय से आवेदन प्रक्रिया और पात्रता की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।”
डॉ. प्रसाद ने बताया, “आवेदन के लिए निर्धारित प्रारूप पर ग्राम प्रधान और संबंधित विभागीय अधिकारी के हस्ताक्षर की आवश्यकता होती है। हालांकि, अलग-अलग योजनाओं की पात्रता और दस्तावेजों की शर्तें अलग हो सकती हैं, इसलिए आवेदन करने से पहले संबंधित कार्यालय से जानकारी लेना जरूरी है।”
छोटी शुरुआत से बड़ी इकाई तक
बकरी पालन को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे उत्तर प्रदेश के जिला जालौन , कालपी के मोहल्ला सदर बाजार निवासी राजेंद्र कुमार साहू ने शुरुआत में पांच से दस बकरियां पालीं। जब उन्हें इस काम में आमदनी की संभावना दिखाई दी, तो उन्होंने अपनी इकाई का विस्तार करने का फैसला किया। साहू बताते हैं, “हमने विकास भवन में पशुपालन विभाग की योजनाओं के बारे में जानकारी ली। इसके बाद सौ बकरियों और पांच बकरों की इकाई के लिए 20 लाख रुपये की योजना के तहत आवेदन किया।”
सही नस्ल, आहार और शेड से बढ़ती है आमदनी
सूकर पालक कुनाल बाधवा बताते हैं, “पशुपालन में सफलता के लिए केवल पशु खरीद लेना पर्याप्त नहीं है। उनके लिए उपयुक्त शेड बनाना, मौसम के अनुसार व्यवस्था करना और सही नस्ल का चुनाव भी जरूरी है।” बाधवा आगे बताते हैं, “पशुओं के प्रजनन के दौरान उनके पोषण का ध्यान रखना चाहिए। साथ ही नियमित टीकाकरण और पशुओं की उम्र तथा शारीरिक जरूरतों के अनुसार आहार देना भी महत्वपूर्ण है।”
सूकर पालन पर मेरठ के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. पवित्रजीत बताते हैं, “सूकर पालन छोटे स्तर से भी शुरू किया जा सकता है। इसमें प्रजनन के साथ नवजात बच्चों की देखभाल, पोषण और उनके स्वस्थ विकास पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।
नस्ल सुधार से बढ़ती है उत्पादन क्षमता
छोटे पशुओं के पालन में बेहतर नस्ल का चुनाव उत्पादन क्षमता को बढ़ाता है। इसी उद्देश्य से राजकीय भेड़ एवं बकरी प्रजनन फार्म, बोहदपुरा में भी पशुपालकों को नस्ल सुधार के लिए सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है।
फार्म की अधीक्षक राखी शर्मा के मुताबिक, निर्धारित अंशदान पर नर बकरे और नर भेड़ उपलब्ध कराने का उद्देश्य पशुओं की नस्ल में सुधार करना है। इसके साथ ही पशुओं को बीमारियों से बचाने के लिए टीकाकरण और अन्य जरूरी उपाय किए जाते हैं। नस्ल सुधार के साथ संतुलित आहार, स्वच्छ आवास और नियमित स्वास्थ्य जांच से पशुपालक अपनी इकाई के बेहतर प्रबंधन की दिशा में काम कर सकते हैं।
सरकारी फार्मों से मिल रही पशुपालकों को मदद
सीतापुर के नीलगांव स्थित राजकीय पशुधन एवं कृषि फार्म में सूकर पालन की इकाई भी संचालित है। फार्म प्रबंधक डॉ. सुनील कुमार के अनुसार, यहां प्रजनन के लिए सूकरों का स्टॉक रखा जाता है। यहां पैदा होने वाले बच्चों को विभागीय व्यवस्था के माध्यम से पात्र पशुपालकों तक पहुंचाया जाता है, जिससे वे सूकर पालन शुरू कर अपनी आमदनी बढ़ाने का प्रयास कर सकें।” ये सरकारी फार्म पशुपालन से जुड़ी सुविधाओं को लाभार्थियों तक पहुंचाने और ग्रामीण परिवारों को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
पशुओं की सेहत और बाड़े की सुरक्षा जरूरी
पशुपालन में बीमारी और संक्रमण से होने वाला नुकसान परिवार की आमदनी को प्रभावित कर सकता है। इसलिए समय पर टीकाकरण, स्वच्छता और उचित पोषण के साथ फार्म की सुरक्षा व्यवस्था पर भी ध्यान देना जरूरी है। सूकर पालन में जैव-सुरक्षा के उपाय विशेष महत्व रखते हैं। फार्म में अनावश्यक बाहरी आवाजाही को नियंत्रित करना, साफ-सफाई बनाए रखना और संक्रमण से बचाव के लिए उचित व्यवस्था करना पशुओं के स्वास्थ्य की रक्षा में मदद करता है। इसके अलावा, पशुधन बीमा आर्थिक जोखिम को कम करने का एक माध्यम हो सकता है। मेरठ के मुख्य जिला पशु चिकित्सा अधिकारी के मुताबिक, पशुओं के बीमा में सरकारी सहायता से पशुपालकों के खर्च का बोझ कम करने का प्रावधान है। बीमा की लागू शर्तों के अनुसार, पशु की मृत्यु होने पर पात्र लाभार्थी को मुआवजा मिल सकता है।
व्हाट्सऐप चैनल से दी जा रही जानकारी
पशुपालन की योजनाओं का लाभ लेने के लिए सही जानकारी तक पहुंच भी जरूरी है। अपर मुख्य सचिव मुकेश मेश्राम बताते हैं, “विभाग ने पशुपालकों के लिए व्हाट्सऐप चैनल बनाया है, जिसके माध्यम से पशुओं की बीमारियों, टीकाकरण, बचाव के उपायों और सरकारी योजनाओं से जुड़ी जानकारियां साझा की जाती हैं। इस तरह डिजिटल माध्यमों के जरिए पशुपालकों को योजनाओं और वैज्ञानिक पशुपालन पद्धतियों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।”
युवाओं को गाँव में ही रोजगार
लघु पशुपालन की अहमियत केवल पशुओं की संख्या या किसी योजना के तहत मिलने वाली सहायता तक सीमित नहीं है। इसका महत्व उस अतिरिक्त आमदनी में भी है, जो किसी परिवार को रोजमर्रा के खर्च पूरे करने, बच्चों की पढ़ाई में सहयोग देने या अपने छोटे व्यवसाय को आगे बढ़ाने में मदद कर सकती है।
उत्तर प्रदेश में छोटे और सीमांत किसानों के लिए बकरी, भेड़ और सूकर पालन खेती के साथ आमदनी का एक अतिरिक्त विकल्प बन सकता है। हालांकि, इसके लिए सरकारी सहायता के साथ सही जानकारी, बाजार की समझ, बेहतर प्रबंधन और पशुओं की नियमित देखभाल जरूरी है।
आंगन में बंधी बकरियां, भेड़ों का छोटा-सा झुंड या सूकर पालन की एक इकाई किसी परिवार के लिए नई शुरुआत बन सकती है। ऐसी शुरुआत, जिसमें रोजगार के लिए गाँव छोड़ना ही एकमात्र रास्ता न हो और ग्रामीण परिवार अपने संसाधनों के सहारे गाँव में रहकर भी आगे बढ़ने की संभावनाएं तलाश सकें।