पंचायत चुनाव से पहले बड़ा फैसला: यूपी में OBC आरक्षण तय करेगा ‘पिछड़ा वर्ग आयोग’
लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में ऐसा फैसला लिया गया, जिसका असर सीधे उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों और ओबीसी राजनीति पर पड़ सकता है। सरकार ने ‘उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग’ के गठन को मंजूरी देकर साफ संकेत दिए हैं कि इस बार पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण पूरी कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत तय किया जाएगा। यह आयोग अब गाँवों में पिछड़े वर्गों की वास्तविक स्थिति और प्रतिनिधित्व का अध्ययन करेगा, जिसके आधार पर आरक्षण का निर्धारण किया जाएगा।
क्या है पिछड़ा वर्ग आयोग?
राज्य सरकार द्वारा गठित किया जाने वाला यह आयोग ग्रामीण निकायों में पिछड़े वर्गों की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति का अध्ययन करेगा। आयोग यह पता लगाएगा कि पंचायतों में ओबीसी वर्ग को किस स्तर पर प्रतिनिधित्व मिल रहा है और आरक्षण का अनुपात किस आधार पर तय होना चाहिए। यह कदम माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में उठाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण लागू करने से पहले “ट्रिपल टेस्ट” प्रक्रिया पूरी करने की बात कही थी। इसी प्रक्रिया के तहत अब यह आयोग गठित किया जा रहा है।
आयोग का मुख्य काम क्या होगा?
आयोग ग्रामीण क्षेत्रों में पिछड़े वर्गों की स्थिति, जनसंख्या और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सर्वेक्षण करेगा। इसके आधार पर पंचायतों में ओबीसी आरक्षण का निर्धारण किया जाएगा। सरकार के अनुसार आयोग निम्न बिंदुओं पर काम करेगा:
- पिछड़ेपन की प्रकृति और प्रभावों का अध्ययन
- पंचायत स्तर पर ओबीसी प्रतिनिधित्व का आंकलन
- निकायवार आनुपातिक आरक्षण तय करने की सिफारिश
- जरूरत पड़ने पर सर्वेक्षण के जरिए आबादी का निर्धारण
पाँच सदस्यीय होगा आयोग
सरकार द्वारा गठित इस आयोग में कुल पाँच सदस्य होंगे। इनमें एक सदस्य उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश होंगे, जिन्हें आयोग का अध्यक्ष बनाया जाएगा। बाकी सदस्य ऐसे लोगों में से चुने जाएंगे जिन्हें पिछड़े वर्गों से जुड़े मामलों की अच्छी जानकारी हो। आयोग का कार्यकाल सामान्य रूप से छह महीने का रखा जाएगा।
पंचायत चुनावों पर क्या पड़ेगा असर?
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है और यहाँ पंचायत चुनावों का राजनीतिक महत्व बेहद बड़ा माना जाता है। गाँव की राजनीति से लेकर विधानसभा और लोकसभा चुनावों तक इसका प्रभाव देखने को मिलता है। सऐसे में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए आयोग का गठन केवल प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी बेहद अहम माना जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला आगामी पंचायत चुनावों को सीधे प्रभावित कर सकता है। आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही पंचायत सीटों और पदों पर ओबीसी आरक्षण की अंतिम तस्वीर साफ होगी। सरकार का दावा है कि इससे आरक्षण प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और संवैधानिक रूप से मजबूत बनेगी। वहीं विपक्ष इसे पंचायत चुनावों से पहले बड़ा राजनीतिक कदम मान रहा है।
27 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होगा आरक्षण
कानूनी प्रावधानों के अनुसार पंचायतों में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण कुल सीटों के 27 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। यदि पिछड़े वर्गों की आबादी के आंकड़े उपलब्ध नहीं होते हैं, तो आयोग सर्वेक्षण के जरिए यह आंकड़े तैयार कर सकेगा।