22 साल में उत्तराखंड के पहाड़ों की हरियाली कैसे बदली, उपग्रह से मिली जानकारी
उत्तराखंड के पहाड़ों में पिछले 22 सालों (2001-2023) में हरियाली के साथ क्या हो रहा है, इस पर नैनीताल के वैज्ञानिकों ने एक बड़ा अध्ययन किया है। उपग्रह तस्वीरों और आधुनिक तकनीक से पता चला है कि मौसम बदलने, प्रदूषण बढ़ने और जंगल की आग जैसी वजहों से पहाड़ों की हरियाली पर असर पड़ रहा है। मानसून के बाद जहां जंगल सबसे हरे-भरे होते हैं, वहीं गर्मियों में सबसे कम। यह शोध बताता है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो हिमालय की यह अनमोल धरोहर खतरे में पड़ सकती है।
उत्तराखंड के पहाड़, जहां ऊंची चोटियां, घने जंगल और बहती नदियां हैं, आज एक नई मुश्किल से जूझ रहे हैं। जलवायु बदल रही है, तापमान बढ़ रहा है और प्रदूषण पहाड़ों तक पहुंच रहा है। इन सबका असर यहां की हरियाली पर साफ दिख रहा है। नैनीताल स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान संस्थान (ARIES) के वैज्ञानिकों ने 22 साल तक उत्तराखंड के 13 जिलों की हरियाली का अध्ययन किया है। डॉ. उमेश चंद्र दुमका और उनकी टीम ने पाया कि यहां के जंगलों और घास के मैदानों में कई तरह के बदलाव हो रहे हैं।
उपग्रह से रखी पहाड़ों पर नजर
पहाड़ों में जाकर हर जगह हरियाली मापना मुमकिन नहीं। ऊंचाई, खतरनाक रास्ते और मौसम की मार - ये सब मुश्किलें हैं। लेकिन अब तकनीक ने यह काम आसान कर दिया है। Google Earth Engine की मदद से वैज्ञानिक अंतरिक्ष से ही धरती की तस्वीरें देख सकते हैं और समझ सकते हैं कि कहां क्या हो रहा है। इस अध्ययन में NDVI और EVI नाम के दो खास इंडेक्स का इस्तेमाल हुआ। आसान भाषा में समझें तो ये बताते हैं कि किसी इलाके में कितनी हरियाली है और पेड़-पौधे कितने स्वस्थ हैं। NDVI से पता चलता है कि जमीन कितनी हरी है - बंजर है या जंगल से भरी। EVI थोड़ा और बेहतर है, खासकर जहां बहुत घने जंगल हों।
साल भर बदलती है हरियाली
अध्ययन में सबसे दिलचस्प बात यह निकली कि पहाड़ों की हरियाली हर मौसम में बदलती रहती है। सितंबर में, यानी मानसून खत्म होने के बाद, जंगल सबसे ज्यादा हरे-भरे होते हैं। बारिश से पेड़-पौधों को भरपूर पानी मिलता है और वे तेजी से बढ़ते हैं। लेकिन अप्रैल-मई में हालात उलट होते हैं। गर्मी शुरू होते ही हरियाली कम होने लगती है। यही वह समय भी है जब जंगलों में आग लगने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है।मई से सितंबर तक का समय उत्तराखंड के जंगलों के लिए 'बढ़ने का मौसम' है। इस दौरान गर्मी और बारिश दोनों मिलकर पौधों को जोरदार बढ़ावा देते हैं।
हर जिले की अलग कहानी
उत्तराखंड के 13 जिलों में हरियाली का हाल एक जैसा नहीं है। नैनीताल, पौड़ी और चंपावत में सबसे घने जंगल हैं। यहां पेड़-पौधे अच्छी हालत में हैं। वहीं उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ जैसे ऊंचे पहाड़ी जिलों में हरियाली कम है। वजह साफ है - यहां बहुत ऊंचाई है, बर्फ पड़ती है और सर्दी बहुत होती है। ऐसे में पेड़-पौधों का उगना मुश्किल हो जाता है। हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर की बात अलग है। यहां मैदानी इलाके हैं और खूब खेती होती है। खासकर गन्ने की। जुलाई-अगस्त में जब गन्ने की फसल लहलहाती है, तो इन जिलों में हरियाली बढ़ जाती है।
प्रदूषण का बढ़ता असर
यह सिर्फ मौसम और जलवायु की बात नहीं है। प्रदूषण भी पहाड़ों की हरियाली को नुकसान पहुंचा रहा है। उत्तराखंड के दक्षिणी हिस्से, जो गंगा के मैदानों के पास पड़ते हैं, वहां प्रदूषण ज्यादा है। गंगा का मैदान दुनिया के सबसे प्रदूषित इलाकों में से एक है। यहां से धूल और गंदी हवा पहाड़ों तक पहुंचती है। सबसे बड़ी समस्या है ब्लैक कार्बन यानी काला कार्बन। यह कोयला, डीजल जलाने और जंगल की आग से निकलता है। जब यह हिमालय के ग्लेशियरों पर जमता है, तो बर्फ की चमक कम हो जाती है और वह तेजी से पिघलने लगती है। यह सिर्फ पर्यावरण के लिए ही नहीं, पानी की आपूर्ति के लिए भी खतरा है। हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर में प्रदूषण सबसे ज्यादा मिला, जबकि ऊंचे पहाड़ी इलाकों में कम।
जंगल की आग से बढ़ती मुसीबत
उत्तराखंड में जंगल की आग बड़ी समस्या है। पिछले 22 सालों में 184 बार जंगलों में आग लगी। ज्यादातर आग गर्मियों में लगती है, जब सूखा होता है। नैनीताल और ऊधम सिंह नगर में सबसे ज्यादा आग की घटनाएं हुईं। अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ सालों में ये घटनाएं कम हुई हैं। बारिश उत्तराखंड के जंगलों की जान है। जितनी अच्छी बारिश, उतनी अच्छी हरियाली। लेकिन एक मजेदार बात सामने आई - कुछ जगहों पर बहुत ज्यादा बारिश भी नुकसान कर देती है। तेज बारिश से भूस्खलन होता है, मिट्टी बह जाती है और पेड़-पौधों को नुकसान होता है। मिट्टी में नमी कितनी है, यह भी बहुत अहम है। वैज्ञानिकों ने देखा कि गहरी मिट्टी में नमी लगातार बढ़ी है। यह अच्छी बात है और शायद सिंचाई, मिट्टी बचाने के काम और पेड़ लगाने के नतीजे हैं।
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22 साल में क्या बदला
2001 से 2022 तक के इन 22 सालों में उत्तराखंड की हरियाली में कुछ अच्छे बदलाव देखे गए। ज्यादातर जिलों में हरियाली बढ़ी है। यह उम्मीद देने वाली बात है।पौड़ी, अल्मोड़ा और देहरादून में सबसे अच्छा सुधार हुआ। लेकिन ऊंचे पहाड़ी इलाकों - चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ - में थोड़ी चिंता है। यहां हरियाली में मामूली कमी आई है। 2001, 2015, 2020 और 2022 में हरियाली सबसे अच्छी रही। इन सालों में अच्छी बारिश हुई थी। 2008, 2010 और 2012 में कम बारिश की वजह से हालात खराब रहे।