उत्तर प्रदेश में भी हो रही चंदन की खेती, आप भी कर सकते हैं इससे कमाई
Gaon Connection | Feb 09, 2026, 14:53 IST
प्रतापगढ़ के पूर्व सैनिक उत्कृष्ट पांडेय ने चंदन और हल्दी उगाकर अपनी किस्मत चमकाई। उन्होंने अपने गाँव में 'हर घर चंदन' की शुरुआत की, जिससे सैकड़ों किसान प्रेरित हुए और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रहे हैं। यह मॉडल अब गाँवों में खुशहाली ला रहा है।
जहाँ कुछ साल पहले तक सिर्फ़ धान-गेहूँ जैसी परंपरागत फसलों की खेती होती थी, आज उसी जमीन पर चंदन के पेड़ खड़े हैं। ये कहानी है पूर्व सैनिक उत्कृष्ट पांडेय की, जिन्होंने जीवन का एक अध्याय बंद कर खेती के जरिए नया अध्याय शुरू किया और वह भी ऐसा, जिसने न सिर्फ उनकी, बल्कि आसपास के सैकड़ों किसानों की ज़िंदगी की दिशा बदल दी।
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ ज़िले के भदौना गाँव के मिट्टी में उत्कृष्ट पांडेय ने नई उम्मीद बोई है, उन्होंने वर्दी की ज़िंदगी छोड़कर खेतों की राह चुनी। कई लोगों के लिए सेना से रिटायरमेंट या नौकरी छोड़ने के बाद का समय उलझनों से भरा होता है। एक खालीपन, एक असमंजस, अब क्या किया जाए? उत्कृष्ट पांडेय के सामने भी यही सवाल था। लेकिन उन्होंने डर या असमंजस को अपने फैसले पर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने अपने गाँव लौटने का फैसला किया और मिट्टी से रिश्ता जोड़ने का रास्ता चुना।
शुरुआत आसान नहीं थी। जब उन्होंने प्रतापगढ़ की ज़मीन पर चंदन की खेती का विचार रखा, तो लोग हँसने लगे। किसी ने इसे पागलपन कहा, तो किसी ने मज़ाक उड़ाया, “यूपी में चंदन? ये कैसे संभव है?” लेकिन उत्कृष्ट के पास सवालों से ज्यादा विश्वास था। उनका कहना था, “कभी कोशिश तो कीजिए, तभी तो पता चलेगा।”
उन्होंने लगभग 400 चंदन के पौधों से अपनी यात्रा शुरू की। धीरे-धीरे यह संख्या हज़ारों में बदल गई। लेकिन यह सिर्फ पेड़ों की संख्या नहीं थी जो बढ़ रही थी, यह विश्वास का जंगल था, जो आसपास के किसानों के दिलों में भी उग रहा था।
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वो आगे कहते हैं, "अब तो बहुत से लोग आकर देखते हैं और खुद भी खेती करने लगे हैं। हमारे गाँव में कम से कम, कुछ नहीं तो हज़ार पेड़ लोगों ने लगा लिया होगा। दो-दो, चार-चार पेड़, सब लोग ले जाकर लगा लिए हैं अपने दरवाजे पर। मेरे लिए वही सुख की बात है। इधर उनके पास कोई खेत नहीं, कोई गरीब आदमी उसके दरवाजे पर दो पेड़ चंदन के लगा हुआ हैं तो मुझे लगता है कि उनको जब भी ज़रूरत होगी, इन्हें सेल करके कुछ एकमुश्त पैसा मिल जाएगा। तो अपनी जरूरतें पूरा कर लेंगे।"
आज उनके खेत में सिर्फ चंदन ही नहीं, बल्कि हल्दी की कस्तूरी, पीतांबरा किस्मों के साथ और कई दूसरी फसलें भी उग रही हैं। उन्होंने खेती को एक लंबे समय के निवेश और रोज़मर्रा की आमदनी के संतुलित मॉडल में बदल दिया है। चंदन के पेड़, जो लगभग 15 साल में तैयार होते हैं, उनके लिए एक तरह की “फिक्स्ड डिपॉज़िट” बन गए हैं, जबकि बीच की जमीन पर उगाई जाने वाली फसलें किसानों को नियमित आमदनी देती हैं।
इसी सोच के साथ उन्होंने ‘ऋषि ग्राम ऑर्गेनिक’ मॉडल की शुरुआत की। इस मॉडल में खेती, प्रसंस्करण और पैकेजिंग, सब कुछ गाँव में ही किया जाता है। देसी गायों से घी बनाना, दाल को स्थानीय स्तर पर प्रोसेस करना और उसे बाजार तक पहुँचाना, यह सब मिलकर गाँव को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कदम है।
उत्कृष्ट का सबसे बड़ा सपना है- “हर घर चंदन।” उनका मानना है कि अगर हर किसान अपने घर या खेत के किनारे चार–छह चंदन के पेड़ भी लगा ले, तो वह भविष्य के लिए एक मजबूत आर्थिक सहारा तैयार कर सकता है। गाँव के कई गरीब परिवारों ने अपने दरवाजे पर दो-दो चंदन के पेड़ लगाए हैं। उत्कृष्ट कहते हैं कि जब कभी उन्हें पैसों की ज़रूरत होगी, ये पेड़ उनकी मदद करेंगे।
पहले लोग डरते थे कि चंदन के पेड़ों पर साँप आते हैं। लेकिन आज उसी बाग में बच्चे खेलते हैं, परिवार घूमने आते हैं और लोग सीखने के लिए दूर-दूर से पहुँचते हैं। वैज्ञानिकों की जानकारी और अपने अनुभव से उत्कृष्ट ने इस भ्रम को भी दूर किया।
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उत्कृष्ट के इस सफर में साथ देने वाली उनकी पत्नी डॉ तुलिका पांडेय बताती हैं, "अब देखिए, पहली चीज़ तो वैज्ञानिकों ने जो बात बताई है, जानकारियाँ देते हैं कि चंदन के आस-पास इस तरह से कहीं भी सांप लिपटे रहते हैं और दक्षिण में किसी भी चंदन के बाग में आज तक सांप नहीं मिले हैं लिपटे हुए पेड़ों से। मैं अपने ढेढ़ साल और आठ साल के बच्चे को लिए बाग में चली जाती हूँ। बस यही जानकारी पर्याप्त है कि चंदन में सांप नहीं लिपटे रहते हैं। मुझे ऐसा डर कोई नहीं लगता है।बस यह है कि पेड़-पौधे हैं। पेड़–पौधे कहीं भी ज्यादा रहेंगे तो सांप भी और जो जंगली जानवर हैं, वो आएंगे ही।"
अब हालात बदल चुके हैं। जो लोग कभी हँसते थे, वही आज उनसे सीखने आते हैं। आसपास के गाँवों में हजारों चंदन के पेड़ लगाए जा चुके हैं। किसी ने अपने खेत में, तो किसी ने घर के आँगन में। धीरे-धीरे एक नई सोच जड़ें पकड़ रही है कि खेती सिर्फ गुज़ारे का साधन नहीं, बल्कि सम्मान और समृद्धि का रास्ता भी हो सकती है।
उत्कृष्ट पांडेय की कहानी उन लोगों के लिए भी प्रेरणा है, जो जीवन के किसी मोड़ पर खुद को खोया हुआ महसूस करते हैं। यह कहानी बताती है कि जिंदगी का कोई भी पड़ाव अंत नहीं होता। अगर हिम्मत हो, तो हर अंत एक नई शुरुआत बन सकता है।
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उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ ज़िले के भदौना गाँव के मिट्टी में उत्कृष्ट पांडेय ने नई उम्मीद बोई है, उन्होंने वर्दी की ज़िंदगी छोड़कर खेतों की राह चुनी। कई लोगों के लिए सेना से रिटायरमेंट या नौकरी छोड़ने के बाद का समय उलझनों से भरा होता है। एक खालीपन, एक असमंजस, अब क्या किया जाए? उत्कृष्ट पांडेय के सामने भी यही सवाल था। लेकिन उन्होंने डर या असमंजस को अपने फैसले पर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने अपने गाँव लौटने का फैसला किया और मिट्टी से रिश्ता जोड़ने का रास्ता चुना।
शुरुआत आसान नहीं थी। जब उन्होंने प्रतापगढ़ की ज़मीन पर चंदन की खेती का विचार रखा, तो लोग हँसने लगे। किसी ने इसे पागलपन कहा, तो किसी ने मज़ाक उड़ाया, “यूपी में चंदन? ये कैसे संभव है?” लेकिन उत्कृष्ट के पास सवालों से ज्यादा विश्वास था। उनका कहना था, “कभी कोशिश तो कीजिए, तभी तो पता चलेगा।”
400 पौधों से शुरू हुआ सपना, अब बन गया है हज़ारों चंदन के पेड़ों का जंगल।
उन्होंने लगभग 400 चंदन के पौधों से अपनी यात्रा शुरू की। धीरे-धीरे यह संख्या हज़ारों में बदल गई। लेकिन यह सिर्फ पेड़ों की संख्या नहीं थी जो बढ़ रही थी, यह विश्वास का जंगल था, जो आसपास के किसानों के दिलों में भी उग रहा था।
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वो आगे कहते हैं, "अब तो बहुत से लोग आकर देखते हैं और खुद भी खेती करने लगे हैं। हमारे गाँव में कम से कम, कुछ नहीं तो हज़ार पेड़ लोगों ने लगा लिया होगा। दो-दो, चार-चार पेड़, सब लोग ले जाकर लगा लिए हैं अपने दरवाजे पर। मेरे लिए वही सुख की बात है। इधर उनके पास कोई खेत नहीं, कोई गरीब आदमी उसके दरवाजे पर दो पेड़ चंदन के लगा हुआ हैं तो मुझे लगता है कि उनको जब भी ज़रूरत होगी, इन्हें सेल करके कुछ एकमुश्त पैसा मिल जाएगा। तो अपनी जरूरतें पूरा कर लेंगे।"
इस खेत में हल्दी है, कस्तूरी है, पीतांबरा है... और है मेहनत का रंग। उत्कृष्ट ने चंदन के साथ-साथ उम्मीद भी बोई है।
आज उनके खेत में सिर्फ चंदन ही नहीं, बल्कि हल्दी की कस्तूरी, पीतांबरा किस्मों के साथ और कई दूसरी फसलें भी उग रही हैं। उन्होंने खेती को एक लंबे समय के निवेश और रोज़मर्रा की आमदनी के संतुलित मॉडल में बदल दिया है। चंदन के पेड़, जो लगभग 15 साल में तैयार होते हैं, उनके लिए एक तरह की “फिक्स्ड डिपॉज़िट” बन गए हैं, जबकि बीच की जमीन पर उगाई जाने वाली फसलें किसानों को नियमित आमदनी देती हैं।
इसी सोच के साथ उन्होंने ‘ऋषि ग्राम ऑर्गेनिक’ मॉडल की शुरुआत की। इस मॉडल में खेती, प्रसंस्करण और पैकेजिंग, सब कुछ गाँव में ही किया जाता है। देसी गायों से घी बनाना, दाल को स्थानीय स्तर पर प्रोसेस करना और उसे बाजार तक पहुँचाना, यह सब मिलकर गाँव को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कदम है।
जो पहने डरते थे, उसी बाग में बच्चे खेलते हैं, परिवार घूमने आते हैं और लोग सीखने के लिए दूर-दूर से पहुँचते हैं।
उत्कृष्ट का सबसे बड़ा सपना है- “हर घर चंदन।” उनका मानना है कि अगर हर किसान अपने घर या खेत के किनारे चार–छह चंदन के पेड़ भी लगा ले, तो वह भविष्य के लिए एक मजबूत आर्थिक सहारा तैयार कर सकता है। गाँव के कई गरीब परिवारों ने अपने दरवाजे पर दो-दो चंदन के पेड़ लगाए हैं। उत्कृष्ट कहते हैं कि जब कभी उन्हें पैसों की ज़रूरत होगी, ये पेड़ उनकी मदद करेंगे।
पहले लोग डरते थे कि चंदन के पेड़ों पर साँप आते हैं। लेकिन आज उसी बाग में बच्चे खेलते हैं, परिवार घूमने आते हैं और लोग सीखने के लिए दूर-दूर से पहुँचते हैं। वैज्ञानिकों की जानकारी और अपने अनुभव से उत्कृष्ट ने इस भ्रम को भी दूर किया।
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उत्कृष्ट के इस सफर में साथ देने वाली उनकी पत्नी डॉ तुलिका पांडेय बताती हैं, "अब देखिए, पहली चीज़ तो वैज्ञानिकों ने जो बात बताई है, जानकारियाँ देते हैं कि चंदन के आस-पास इस तरह से कहीं भी सांप लिपटे रहते हैं और दक्षिण में किसी भी चंदन के बाग में आज तक सांप नहीं मिले हैं लिपटे हुए पेड़ों से। मैं अपने ढेढ़ साल और आठ साल के बच्चे को लिए बाग में चली जाती हूँ। बस यही जानकारी पर्याप्त है कि चंदन में सांप नहीं लिपटे रहते हैं। मुझे ऐसा डर कोई नहीं लगता है।बस यह है कि पेड़-पौधे हैं। पेड़–पौधे कहीं भी ज्यादा रहेंगे तो सांप भी और जो जंगली जानवर हैं, वो आएंगे ही।"
उत्कृष्ट की हर चंदन मुहीम से अब लोग भी जुड़ रहे हैं।
अब हालात बदल चुके हैं। जो लोग कभी हँसते थे, वही आज उनसे सीखने आते हैं। आसपास के गाँवों में हजारों चंदन के पेड़ लगाए जा चुके हैं। किसी ने अपने खेत में, तो किसी ने घर के आँगन में। धीरे-धीरे एक नई सोच जड़ें पकड़ रही है कि खेती सिर्फ गुज़ारे का साधन नहीं, बल्कि सम्मान और समृद्धि का रास्ता भी हो सकती है।
उत्कृष्ट पांडेय की कहानी उन लोगों के लिए भी प्रेरणा है, जो जीवन के किसी मोड़ पर खुद को खोया हुआ महसूस करते हैं। यह कहानी बताती है कि जिंदगी का कोई भी पड़ाव अंत नहीं होता। अगर हिम्मत हो, तो हर अंत एक नई शुरुआत बन सकता है।
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