क्या विटामिन की कमी बढ़ा सकती है डिमेंशिया का ख़तरा? ICMR-NIN की स्टडी में सामने आए चौंकाने वाले संकेत
डिमेंशिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति की याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। इसमें लोगों को रोजमर्रा की बातें याद रखने, सही फैसले लेने और सामान्य काम करने में दिक्कत होने लगती है। ये स्थिति अक्सर बुजुर्गों में ज्यादा देखी जाती है, लेकिन उम्र बढ़ रही है, इसकी वजह से से डिमेंशिया जैसी स्थिति पैदा हो जाती है ऐसा सभी मामलों में नहीं होता।
डिमेंशिया से प्रभावित व्यक्ति हाल की घटनाएं भूल सकता है, लोगों के नाम याद रखने में परेशानी महसूस कर सकता है या बार-बार एक ही बात पूछ सकता है। कई बार उसे रास्ते पहचानने, बातचीत करने या छोटे-छोटे काम करने में भी मुश्किल होने लगती है। समय के साथ यह समस्या बढ़ सकती है और व्यक्ति को दैनिक कामों के लिए दूसरों की मदद की जरूरत पड़ सकती है।
ICMR ने बताया-जरूरी विटामिन्स की कमी डिमेंशिया का कारण
अब भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के तहत काम करने वाले नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (NIN) की एक नई स्टडी ने संकेत दिया है कि कुछ जरूरी विटामिनों की कमी डिमेंशिया के जोखिम को बढ़ा सकती है।
हैदराबाद के ICMR-NIN में की गई रिसर्च में पाया गया कि जिन लोगों के शरीर में विटामिन डी और बी-कॉम्प्लेक्स समूह के कुछ विटामिनों की कमी थी, उनमें डिमेंशिया का जोखिम अधिक देखा गया। शोधकर्ताओं का कहना है कि बेहतर पोषण और संतुलित आहार उम्र बढ़ने के साथ मस्तिष्क को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
डिमेंशिया और पोषण के बीच क्या है संबंध?
डिमेंशिया को अक्सर बढ़ती उम्र से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जीवनशैली और खानपान भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रिसर्च में बताया गया कि फल और सब्जियों से भरपूर आहार लेने वाले लोगों में डिमेंशिया से जुड़े जोखिम कारक ना खाने वालों की तुलना में कम पाए गए।
फल और सब्जियां शरीर को जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients) प्रोवाइड कराती हैं। ये पोषक तत्व मस्तिष्क की कार्यक्षमता बनाए रखने और उम्र बढ़ने के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकते हैं।
ICMR-NIN की स्टडी में क्या सामने आया?
इस स्टडी में तेलंगाना के गाँवों और शहरों में रहने वाले 40 से 80 साल की उम्र के 570 लोगों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं का मकसद यह समझना था कि लोगों के खानपान और शरीर में विटामिन की मात्रा का डिमेंशिया के खतरे से क्या संबंध है। इसके लिए प्रतिभागियों की याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता, खानपान की आदतों और खून में मौजूद विटामिन के स्तर की जांच की गई।
10 में से 4 लोगों में मिला ज्यादा खतरा
अध्ययन में पाया गया कि करीब 40 फीसदी लोगों में डिमेंशिया का खतरा अपेक्षाकृत ज्यादा था। इन लोगों की पोषण स्थिति भी कमजोर पाई गई। खास बात यह रही कि इस समूह में विटामिन D और विटामिन B2, B6 और B12 की कमी अधिक देखने को मिली।
खानपान का भी दिखा सीधा असर
शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन लोगों में डिमेंशिया का खतरा ज्यादा था, उनका खानपान भी उतना संतुलित नहीं था। वे कम तरह के खाद्य पदार्थ खाते थे और उनके भोजन में फल, सब्जियां और पौष्टिक चीजें कम, जबकि ज्यादा फैट वाले खाद्य पदार्थ ज्यादा शामिल थे। शोधकर्ताओं का कहना है कि लंबे समय तक ऐसा भोजन दिमाग की सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है।
गाँवों में ज्यादा दिखी विटामिन की कमी
स्टडी में एक और अहम बात सामने आई। गाँवों में रहने वाले लोगों में विटामिन की कमी शहरों की तुलना में ज्यादा पाई गई। इसकी एक वजह पौष्टिक और विविध भोजन तक सीमित पहुंच मानी गई। शोधकर्ताओं का मानना है कि इसी कारण ग्रामीण आबादी में डिमेंशिया का खतरा बढ़ सकता है।
आने वाले वर्षों में बढ़ सकती है चुनौती
अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता जी. भानुप्रकाश रेड्डी के मुताबिक भारत में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में आने वाले वर्षों में डिमेंशिया के मामलों में भी बड़ा इजाफा हो सकता है। उनका कहना है कि अगर समय रहते खानपान और जीवनशैली पर ध्यान दिया जाए तो कई मामलों में इस खतरे को कम किया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने क्या दी सलाह?
ICMR-NIN की निदेशक डॉ. भारती कुलकर्णी का कहना है कि डिमेंशिया से बचाव के लिए केवल इलाज ही नहीं, बल्कि रोकथाम भी जरूरी है। संतुलित आहार, पर्याप्त विटामिन, नियमित शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर दिमाग को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है।
स्टडी का सबसे बड़ा संदेश
इस शोध से यह साफ संकेत मिलता है कि डिमेंशिया सिर्फ बढ़ती उम्र की वजह से नहीं होता। खानपान, पोषण और जीवनशैली भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसलिए रोजाना फल, सब्जियां और विटामिन से भरपूर भोजन लेना न सिर्फ शरीर बल्कि दिमाग की सेहत के लिए भी बेहद जरूरी है।