कभी आसमान में बड़ी संख्या में दिखते थे गिद्ध, अब घटती आबादी के बीच उन्हें बचाने के लिए क्यों बनाए जा रहे हैं ‘रेस्टोरेंट’?
भारत के आसमान में कभी बड़ी संख्या में दिखाई देने वाले गिद्ध अब कई इलाक़ों में बहुत कम नज़र आते हैं। ये पक्षी सिर्फ़ मरे हुए जानवरों को खाने वाले जीव नहीं हैं, बल्कि प्रकृति के ‘सफाईकर्मी’ माने जाते हैं। किसी पशु की मौत के बाद उसका शव जल्दी साफ़ करने में गिद्धों की अहम भूमिका होती है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में दवाओं के ज़हरीले असर, भोजन की कमी और दूसरे मानवीय ख़तरों ने इनकी संख्या और इनके बसेरों को बुरी तरह प्रभावित किया है। इन्हें बचाने के लिए देश में कैप्टिव ब्रीडिंग, सुरक्षित आवास और नियंत्रित भोजन उपलब्ध कराने जैसे कई प्रयास किए जा रहे हैं।
इसी कड़ी में कुछ जगहों पर ‘वल्चर रेस्टोरेंट’ यानी गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन स्थल बनाए जा रहे हैं। यहाँ गिद्धों को ऐसा पशु-मांस उपलब्ध कराया जाता है, जिसमें उनके लिए ख़तरनाक दवाओं के अवशेष न हों। इसका मक़सद सिर्फ़ गिद्धों को खाना देना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित भोजन और प्रजनन के लिए बेहतर माहौल उपलब्ध कराना है। हालांकि, यह गिद्ध संरक्षण की पूरी रणनीति नहीं है, बल्कि कई उपायों में से एक है।
WII की रिपोर्ट में गिद्धों की स्थिति क्या सामने आई?
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) की 2025 की गिद्ध रिपोर्ट के मुताबिक़, देशभर में गिद्धों के पुराने नेस्टिंग साइट्स यानी घोंसले बनाने वाले स्थानों का आकलन किया गया। यह सर्वेक्षण फ़रवरी 2023 से जनवरी 2025 के बीच किया गया था। रिपोर्ट में चार गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजातियों पर विशेष ध्यान दिया गया व्हाइट-रम्प्ड वल्चर, इंडियन वल्चर, स्लेंडर-बिल्ड वल्चर और रेड-हेडेड वल्चर। शोधकर्ताओं ने अलग-अलग स्रोतों से 425 पुराने नेस्टिंग साइट्स की जानकारी जुटाई थी। इनमें से 120 जगहों पर दोबारा नेस्टिंग दर्ज हुई, जबकि सर्वेक्षण के दौरान 93 नए नेस्टिंग साइट्स भी मिले। कुल मिलाकर आकलन में 216 नेस्टिंग साइट्स, 2,410 नेस्ट्स और 1,994 एक्दटिव नेस्ट्स किए गए। रिपोर्ट के मुताबिक़ इंडियन वल्चर के 110 नेस्टिंग साइट्स मिले, जहाँ 1,379 नेस्ट्स दर्ज किए गए और इनमें 1,029 एक्टिव नेस्ट्स थे। वहीं व्हाइट-रम्प्ड वल्चर के 69 साइट्स पर 945 नेस्ट्स मिले, जिनमें 890 थे। स्लेंडर-बिल्ड वल्चर की स्थिति और चिंताजनक है। इसके पहले दर्ज किए गए 47 नेस्टिंग साइट्स में से किसी पर भी मौजूदा सर्वेक्षण में नेस्टिंग नहीं मिली। हालांकि, 12 नए स्थानों पर इसकी मौजूदगी दर्ज हुई और वहाँ कुल 20 एक्टिव नेस्ट्स पाए गए।
गिद्धों के लिए ख़तरनाक साबित हुई थी एक दर्द की दवा
गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट की सबसे बड़ी वजहों में से एक पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली डाइक्लोफ़ेनाक दवा रही है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के दस्तावेज़ के मुताबिक़, पशुओं के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली डाइक्लोफ़ेनाक गिद्धों के लिए ज़हरीली साबित हुई। जब गिद्ध ऐसे मरे हुए पशुओं का मांस खाते थे, जिनके शरीर में इस दवा के अवशेष होते थे, तो उनकी मौत हो सकती थी। भारत सरकार ने मई 2006 में पशु चिकित्सा इस्तेमाल के लिए डाइक्लोफ़ेनाक पर प्रतिबंध लगाया। इसके बाद गिद्ध संरक्षण के लिए कैप्टिव ब्रीडिंग और दूसरे उपायों पर ज़ोर बढ़ाया गया। असम सरकार भी गिद्धों के लिए डाइक्लोफ़ेनाक को एक प्रमुख ख़तरे के रूप में बताती है। इसके अलावा एसीक्लोफ़ेनाक, केटोप्रोफ़ेन और ज़हर मिले चारे से भी गिद्धों को ख़तरा बताया गया है।
असम में कैसे बचाए जा रहे हैं गिद्ध?
असम के रानी इलाके में वल्चर संरक्षण प्रजनन केंद्र (VCBC) इसी संरक्षण प्रयास का एक उदाहरण है। असम सरकार की जानकारी के मुताबिक़, रानी स्थित केंद्र की स्थापना 2007 में हुई थी। यह पूर्वोत्तर भारत का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रमुख गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्र है। यहाँ मुख्य रूप से व्हाइट-रम्प्ड और स्लेंडर-बिल्ड वल्चर के संरक्षण और कैप्टिव ब्रीडिंग पर काम किया जाता है। असम सरकार के मुताबिक़, 2012 में पहली सफल ब्रीडिंग के बाद अब तक करीब 75 गिद्ध कैप्टिव स्थिति में पैदा या पाले गए हैं। केंद्र में 47 स्लेंडर-बिल्ड और 97 व्हाइट-रम्प्ड वल्चर दर्ज हैं। इन पक्षियों की पहचान के लिए उन्हें रिंग और माइक्रोचिप लगाए जाते हैं। नए पक्षियों को कम से कम 45 दिन तक क्वारंटाइन में रखा जाता है, ताकि बीमारी का जोखिम कम किया जा सके।
‘वल्चर रेस्टोरेंट’ क्यों ज़रूरी हैं?
गिद्धों को सुरक्षित रखने के लिए सिर्फ़ उनकी संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें जंगल और खुले इलाक़ों में ऐसा भोजन भी मिलना चाहिए, जो ज़हरीली दवाओं से मुक्त हो। इसी सोच से ‘वल्चर रेस्टोरेंट’ या फीडिंग साइट्स की अवधारणा सामने आई है। इन जगहों पर पशुओं के सुरक्षित शव या मांस को नियंत्रित तरीके से गिद्धों के लिए रखा जाता है। इससे उन्हें बिना दवा के अवशेष वाले भोजन का स्रोत मिल सकता है और उनके ज़हरीले पदार्थ खाने का जोखिम घटता है। लेकिन ऐसे फीडिंग साइट्स तभी लंबे समय में कामयाब हो सकते हैं, जब आसपास का इलाक़ा सुरक्षित हो और पशु चिकित्सा दवाओं के इस्तेमाल पर निगरानी भी बनी रहे।
सिर्फ़ खाना देने से नहीं बचेगा गिद्ध
गिद्ध संरक्षण की चुनौती केवल भोजन की कमी तक सीमित नहीं है। उनके लिए सुरक्षित नेस्टिंग साइट्स, ज़हरीली दवाओं से सुरक्षा, पर्याप्त प्राकृतिक आवास और स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी उतनी ही ज़रूरी है। रानी के संरक्षण केंद्र का उद्देश्य भी सिर्फ़ गिद्धों को कैद में रखना नहीं है। असम सरकार के मुताबिक़, इन पक्षियों की संख्या बढ़ाकर भविष्य में उन्हें उनके पुराने प्राकृतिक आवासों में दोबारा छोड़े जाने की दिशा में काम किया जा रहा है, बशर्ते वहाँ मौजूद ख़तरे कम किए जा सकें।
WII की 2025 की रिपोर्ट भी दिखाती है कि कई पुराने नेस्टिंग साइट्स पर गिद्धों की वापसी नहीं हुई है, जबकि कुछ नए स्थानों पर उनकी मौजूदगी दर्ज हुई है। ऐसे में गिद्धों को बचाने की कोशिश केवल ‘रेस्टोरेंट’ बनाने तक सीमित नहीं हो सकती। सुरक्षित भोजन, सुरक्षित दवाएँ, बेहतर आवास और वैज्ञानिक निगरानी इन सभी को साथ लेकर चलना होगा। क्योंकि गिद्धों का बचना सिर्फ़ एक पक्षी की प्रजाति को बचाना नहीं है। यह उस प्राकृतिक व्यवस्था को बचाना भी है, जिसमें मरे हुए जानवरों के शवों को साफ़ करने से लेकर बीमारी फैलने के जोखिम को कम करने तक गिद्धों की महत्वपूर्ण भूमिका है।