खरीफ सीजन से पहले जल संकट गहराया! मानसून से पहले डराने लगे जलाशयों के आंकड़े, देश के 105 बड़े बांधों में 40% से कम पानी
देश में खरीफ सीजन शुरू होने से पहले जल संकट गहराने लगा है। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक देश के 166 प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर लगातार घट रहा है और दो-तिहाई से ज्यादा बड़े बांधों में भंडारण क्षमता 40 प्रतिशत से नीचे पहुंच चुकी है। ऐसे समय में मौसम विभाग द्वारा सामान्य से कमजोर मानसून की आशंका जताए जाने से किसानों और कृषि विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है।
कुल जल भंडारण क्षमता का सिर्फ 33% पानी बचा
सीडब्ल्यूसी की साप्ताहिक रिपोर्ट के अनुसार देश के 166 बड़े जलाशयों में इस समय कुल 60.830 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) पानी मौजूद है, जबकि इनकी कुल क्षमता 183.565 बीसीएम है। यानी कुल भंडारण क्षमता का केवल 33 प्रतिशत पानी ही बचा है। रिपोर्ट के मुताबिक 105 जलाशयों में जल स्तर 40 प्रतिशत से कम और 21 जलाशयों में 50 प्रतिशत से नीचे पहुंच गया है।
दक्षिण भारत में सबसे ज्यादा चिंता
सबसे ज्यादा चिंता दक्षिण भारत को लेकर जताई जा रही है। दक्षिण क्षेत्र के 47 प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर घटकर कुल क्षमता के 24.21 प्रतिशत पर पहुंच गया है। खरीफ फसलों के लिहाज से अहम कर्नाटक और तेलंगाना में जलाशयों का स्तर सिर्फ 19 प्रतिशत रह गया है। केरल में 22 प्रतिशत, तमिलनाडु में 33 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 35 प्रतिशत जल भंडारण दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि दक्षिण भारत के कई राज्यों में धान, दाल और तिलहन की खेती काफी हद तक मानसून और जलाशयों पर निर्भर रहती है। ऐसे में यदि बारिश सामान्य से कम रहती है तो खरीफ उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
कमजोर मानसून और अल नीनो ने बढ़ाई चिंता
स्थिति इसलिए भी गंभीर मानी जा रही है क्योंकि भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने इस साल सामान्य से कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून की संभावना जताई है। वहीं कई अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियों ने अल नीनो विकसित होने की चेतावनी दी है। कुछ एजेंसियों का अनुमान है कि इस बार “सुपर अल नीनो” जैसी स्थिति बन सकती है, जिससे सूखा और लंबा ड्राई स्पेल देखने को मिल सकता है। भारत में सालभर की करीब 70 प्रतिशत बारिश दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है। देश के कुल धान उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा खरीफ सीजन में पैदा होता है। इसके अलावा सोयाबीन, दालें, तिलहन और मोटे अनाज जैसी फसलें भी मानसून पर काफी निर्भर रहती हैं। ऐसे में कमजोर बारिश सीधे कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर असर डाल सकती है।
मध्य भारत में स्थिति थोड़ी बेहतर
मध्य भारत में स्थिति दक्षिण की तुलना में थोड़ी बेहतर दिखाई दे रही है। केंद्रीय क्षेत्र के 28 जलाशयों में जल स्तर 39 प्रतिशत दर्ज किया गया है। छत्तीसगढ़ में 55 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 41 प्रतिशत जल भंडारण मौजूद है। वहीं उत्तर प्रदेश में यह स्तर 34 प्रतिशत और उत्तराखंड में 21 प्रतिशत रहा।
पूर्वी भारत में भी चिंता बरकरार
पूर्वी भारत में भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। पूर्वी क्षेत्र के 27 जलाशयों में पानी का स्तर कुल क्षमता के 27.5 प्रतिशत तक गिर गया है। पश्चिम बंगाल में जल भंडारण सिर्फ 12.7 प्रतिशत दर्ज किया गया है, जबकि ओडिशा में 25.5 प्रतिशत और झारखंड में 39.5 प्रतिशत पानी बचा है। हालांकि मेघालय और त्रिपुरा में जलाशयों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बनी हुई है।
पंजाब में सबसे बेहतर जल स्तर
उत्तरी भारत में जलाशयों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बनी हुई है। पंजाब में जलाशय 64 प्रतिशत तक भरे हुए हैं, जो देश में सबसे बेहतर स्तरों में से एक है। राजस्थान में यह आंकड़ा 45 प्रतिशत और हिमाचल प्रदेश में 33 प्रतिशत दर्ज किया गया।
महाराष्ट्र और गुजरात में भी दबाव
पश्चिम भारत के 53 जलाशयों में पानी का स्तर कुल क्षमता का 37 प्रतिशत है। महाराष्ट्र के बांध 30 प्रतिशत और गुजरात के जलाशय 46 प्रतिशत तक भरे हुए हैं। गोवा के एकमात्र जलाशय में भी जल स्तर सिर्फ 30 प्रतिशत दर्ज किया गया।
29% जिलों में सामान्य से कम बारिश
आईएमडी के अनुसार 1 मार्च से 20 मई के बीच देश के 29 प्रतिशत जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। जनवरी और फरवरी में भी देश के लगभग 70 प्रतिशत हिस्सों में सामान्य से कम या बिल्कुल बारिश नहीं हुई। हालांकि मौसम विभाग ने 26 मई को केरल तट पर मानसून के समय से पहले पहुंचने का अनुमान जताया है, लेकिन जून के मध्य के बाद बारिश कमजोर पड़ने की आशंका भी व्यक्त की गई है।
खरीफ फसलों और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले हफ्तों में जलाशयों का स्तर नहीं बढ़ा और मानसून कमजोर रहा तो खरीफ फसलों की बुवाई और उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है। इसका सीधा असर दाल, तिलहन, सोयाबीन और धान जैसी फसलों की पैदावार पर दिखाई दे सकता है। कृषि उत्पादन घटने की स्थिति में आने वाले महीनों में खाद्य कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।