कमजोर मानसून और अल नीनो के खतरे से निपटने के लिए सरकार अलर्ट, खरीफ सीजन से पहले तैयार किया बड़ा कंटिजेंसी प्लान
देश में इस साल कमजोर मानसून और अल नीनो के खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार ने खरीफ सीजन से पहले बड़ा कंटिजेंसी प्लान तैयार किया है। कृषि मंत्रालय ने राज्यों को निर्देश दिए हैं कि वे जिला स्तर पर फसल रणनीति बनाएं और कम पानी में तैयार होने वाली फसलों को बढ़ावा दें ताकि खराब मौसम की स्थिति में किसानों को कम नुकसान हो।
सामान्य से कमजोर रह सकता है मानसून
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने इस बार मानसून को सामान्य से कमजोर रहने का अनुमान जताया है। मौसम विभाग के अनुसार इस साल मानसून बारिश दीर्घकालिक औसत का करीब 92 प्रतिशत रह सकती है। साथ ही अल नीनो बनने की संभावना भी जताई गई है, जिसके कारण कई इलाकों में सूखे जैसे हालात पैदा हो सकते हैं। मौसम विभाग ने कहा है कि अल नीनो की वजह से बारिश की मात्रा और वितरण दोनों प्रभावित हो सकते हैं, जिससे खरीफ फसलों की पैदावार पर असर पड़ने का खतरा बढ़ गया है।
कम पानी वाली फसलों पर सरकार का जोर
कृषि मंत्रालय ने राज्यों को दालें, कुछ मोटे अनाज (मिलेट्स) और सब्जियों जैसी कम अवधि और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने को कहा है। अधिकारियों का मानना है कि ऐसी फसलें कम बारिश की स्थिति में भी बेहतर उत्पादन दे सकती हैं और किसानों का जोखिम कम कर सकती हैं। सरकार का कहना है कि जल्दी तैयार होने वाली फसलें मौसम की अनिश्चितता और लंबे सूखे के दौर में किसानों के लिए ज्यादा सुरक्षित विकल्प साबित हो सकती हैं।
सूखा प्रभावित इलाकों में बांटे जा रहे विशेष बीज
जिन जिलों में अल नीनो का असर ज्यादा पड़ने की आशंका है, वहां सरकार सूखा-रोधी बीजों का वितरण कर रही है। इस बार खरीफ सीजन की तैयारियों में मौसम निगरानी और बीज प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक इस बार सरकार मिशन मोड में काम कर रही है ताकि किसानों तक समय पर सही सलाह, वैकल्पिक खेती के विकल्प और जरूरी संसाधन पहुंचाए जा सकें।
जून-जुलाई में शुरू होगी खरीफ बुवाई
देश में खरीफ सीजन की शुरुआत जून और जुलाई में होती है। इस दौरान धान, दालें, तिलहन, गन्ना और कपास जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई की जाती है। फसल की कटाई सितंबर और अक्टूबर में होती है। लेकिन इस बार बढ़ती गर्मी, कम बारिश की आशंका और अल नीनो के खतरे ने सरकार और कृषि वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है।
उर्वरक कीमतों और वैश्विक तनाव ने बढ़ाई चिंता
सरकार की चिंता सिर्फ मानसून तक सीमित नहीं है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास संकट की स्थिति के कारण वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है। इसका असर उर्वरकों की कीमतों पर भी पड़ सकता है, जिससे किसानों की लागत बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर उर्वरक महंगे हुए और मानसून कमजोर रहा तो किसानों पर दोहरा दबाव पड़ सकता है।
राज्यों को जारी की गई विशेष एडवाइजरी
कृषि मंत्रालय ने राज्यों को क्षेत्रवार मौसम और बुवाई से जुड़ी एडवाइजरी भी जारी की है। राज्यों से कहा गया है कि वे जलाशयों के जल स्तर, सिंचाई व्यवस्था और खाद-बीज की उपलब्धता पर लगातार नजर रखें। सरकार चाहती है कि हर जिले की जलवायु और मौसम के अनुसार अलग रणनीति बनाई जाए ताकि नुकसान को कम किया जा सके।
शिवराज सिंह चौहान ने दिए विशेष निर्देश
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले महीने खरीफ तैयारियों की समीक्षा बैठक में अधिकारियों को संभावित खराब मौसम से निपटने के लिए विस्तृत एक्शन प्लान तैयार करने के निर्देश दिए थे। उन्होंने कहा था कि किसानों को समय पर बीज, उर्वरक, वैकल्पिक फसल विकल्प और देर से बुवाई की रणनीति उपलब्ध कराई जाए ताकि मौसम की मार से बचाव किया जा सके।
अल नीनो में घट सकती है खरीफ पैदावार
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) से जुड़े वैज्ञानिकों के एक अध्ययन के अनुसार अल नीनो वाले वर्षों में कई जिलों में खरीफ फसलों का उत्पादन 10 प्रतिशत से ज्यादा तक घट सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते तैयारी नहीं की गई तो धान, दाल और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है। ऐसे में सरकार की यह तैयारी किसानों और देश की खाद्य सुरक्षा दोनों के लिए अहम मानी जा रही है।