शिपिंग चार्ज का ‘झटका’, बासमती निर्यातकों का कारोबार ठप होने की कगार पर! सरकार से लगाई हस्तक्षेप की गुहार
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब भारत के निर्यात कारोबार पर साफ दिखाई देने लगा है। खासतौर पर बासमती चावल के निर्यातक भारी दबाव में हैं, जहां बढ़ते शिपिंग शुल्क और अनिश्चित परिस्थितियों ने कारोबार को मुश्किल बना दिया है। इसी बीच बासमती राइस फार्मर्स एंड एक्सपोर्टर्स डेवलपमेंट फोरम (BRFEDF) ने सरकार से तुरंत हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा है कि मौजूदा हालात में निर्यात करना कई व्यापारियों के लिए घाटे का सौदा बनता जा रहा है।
मनमाने शुल्क से बढ़ी मुश्किलें
फोरम ने कहा कि वॉर-रिस्क सरचार्ज प्रति कंटेनर 800 से 6000 डॉलर तक वसूला जा रहा है, जो अक्सर बिना पूर्व सूचना के लगाया जाता है या माल भेजे जाने के बाद संशोधित कर दिया जाता है। कुछ मामलों में कुल शुल्क कार्गो मूल्य के 60 से 70 प्रतिशत तक पहुंच गया है। फोरम की अध्यक्ष प्रियंका मित्तल ने बयान में कहा, “निर्यातकों से ऐसी परिस्थितियों में खुली वित्तीय जिम्मेदारी उठाने को कहा जा रहा है, जो पूरी तरह उनके नियंत्रण से बाहर हैं।”
शिपिंग कंपनियों के फैसलों का पूरा बोझ निर्यातकों पर
पश्चिम एशिया संकट के कारण शिपिंग लाइनों ने एकतरफा निर्णय लेते हुए कार्गो को जेबेल अली, सोहर और सलालाह जैसे बंदरगाहों की ओर मोड़ दिया है, ट्रांसशिपमेंट हब्स पर कंटेनरों को आगे की आवाजाही की स्पष्ट जानकारी के बिना रोके रखा है और कुछ मामलों में कंटेनरों को मूल बंदरगाह पर वापस भेज दिया है। निर्यातकों का कहना है कि इन निर्णयों की पूरी वित्तीय लागत उन्हें ही उठानी पड़ रही है, जबकि इन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है।
सरकार से हस्तक्षेप और नियमों में सुधार की मांग
BRFEDF ने मांग की है कि मंत्रालय शुल्कों को केवल प्रदान की गई सेवाओं से जोड़े, शिपिंग लाइनों को विवादित शुल्कों से जोड़कर कंटेनर रोकने की बजाय उन्हें रिलीज करने का निर्देश दे और भू-राजनीतिक व्यवधानों के दौरान कार्गो प्रबंधन के लिए स्पष्ट नियामक दिशानिर्देश बनाए। फोरम ने यह भी माना कि महानिदेशालय शिपिंग ने शिकायतों को दर्ज कर ट्रैकिंग नंबर दिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अब भी “बेहद चुनौतीपूर्ण” बनी हुई है। छोटे निर्यातकों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा है और कुछ ने बढ़ते शुल्कों के कारण माल छोड़ने तक पर विचार किया है। प्रियंका मित्तल ने कहा, “यदि इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो ऐसी प्रथाएं भारत के समुद्री व्यापार ढांचे में विश्वास को कमजोर कर सकती हैं।”