पश्चिम एशिया संकट से भारत में पिस्ता-खजूर 20% तक हुए महंगे, ईरान से सप्लाई घटने से बढ़े दाम
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब भारत के ड्राई फ्रूट्स बाजार पर साफ दिखने लगा है। पिछले दो महीनों में ईरान से आने वाले पिस्ता और खजूर जैसे उत्पादों की कीमतों में 10–20% तक की बढ़ोतरी हुई है। सप्लाई चेन में आई बाधाओं के चलते बाजार में उपलब्धता कम हुई है, जिससे कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
ईरान से सप्लाई घटी, कीमतें बढ़ीं
नट्स एंड ड्राई फ्रूट्स काउंसिल ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष राहुल कामत के अनुसार, ईरान इन उत्पादों का प्रमुख वैश्विक सप्लायर है और मौजूदा अशांति के कारण उपलब्धता में करीब 30% की कमी आई है। हालांकि, भारत में इसका असर अभी सीमित है क्योंकि यह खपत का पीक सीजन नहीं है। आमतौर पर जून-जुलाई से दिवाली से पहले मांग बढ़ती है और तब तक बाजार के स्थिर होने की उम्मीद जताई जा रही है। भारत में पिस्ता का बाजार लगभग 5,000 करोड़ रुपये और खजूर का बाजार करीब 3,000 करोड़ रुपये का है, जहां ईरानी उत्पादों की काफी मांग रहती है।
आयात में दिक्कत, तस्करी की खबरें और सप्लाई चेन पर दबाव
रिपोर्ट्स के अनुसार, बढ़ती कीमतों के कारण बिक्री पर असर पड़ा है। ईरान के शिपिंग रूट और अफगान ट्रेड कॉरिडोर में रुकावट आने से आयात मुश्किल हो गया है। एयर कार्गो का विकल्प मौजूद है, लेकिन इससे लागत काफी बढ़ जाती है। कुछ व्यापारी अमेरिका से बादाम मंगाने पर विचार कर रहे हैं। वहीं छोटे स्तर पर तस्करी की भी खबरें हैं, लेकिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में कड़ी निगरानी के कारण यह जोखिम भरा है। इसके अलावा, ईरान द्वारा लगाए गए निर्यात प्रतिबंधों ने भारत और यूरोप दोनों बाजारों में कमी बढ़ा दी है।
वैश्विक बाजार बढ़ रहा
'बिजनेस लाइन' ने बीटा ग्रुप के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर जे. राजमोहन पिल्लई के अनुसार बताया कि वैश्विक ड्राई फ्रूट्स बाजार 2026 तक 11.06 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। हालांकि भू-राजनीतिक कारणों से सप्लाई चेन पर दबाव बना हुआ है, लेकिन प्रीमियम और हेल्दी स्नैक्स की मांग मजबूत बनी हुई है। भारत में काजू का बाजार फिलहाल स्थिर है क्योंकि फसल का सीजन मई तक जारी है और थोक कीमत करीब 12,800 रुपये प्रति क्विंटल है। हालांकि बढ़ती ढुलाई लागत और कमजोर मानसून की आशंका के कारण W240 और W320 जैसे ग्रेड के दाम बढ़ सकते हैं। साथ ही अब क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के चलते ड्राई फ्रूट्स का उपयोग सिर्फ त्योहारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रोजमर्रा की खपत में भी बढ़ोतरी हो रही है।