खेती पर युद्ध की मार! उर्वरकों का उत्पादन और आयात बुरी तरह घटा, क्या खरीफ़ फसलों पर पड़ेगा असर?
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब भारत के कृषि क्षेत्र पर भी साफ़ दिखाई देने लगा है। कच्चे माल की वैश्विक क़ीमतों में तेज़ उछाल के कारण देश में जटिल उर्वरकों (एनपी/एनपीके) का उत्पादन और आयात दोनों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इससे खरीफ़ फसलों की बुआई के दौरान किसानों को आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ गई है। उर्वरक उद्योग का कहना है कि अमोनिया और सल्फ़र जैसे प्रमुख कच्चे माल की क़ीमतें लगभग दोगुनी हो जाने से उत्पादन और आयात दोनों आर्थिक रूप से मुश्किल हो गए हैं।
ET की एक रिपोर्ट में उद्योग से जुड़े अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि सरकार ने खरीफ़ सीज़न 2026 के लिए पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (एनबीएस) की दरों में बढ़ोतरी की थी, लेकिन उसके बाद पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे माल की क़ीमतें और बढ़ गईं। ऐसे में मौजूदा सब्सिडी वास्तविक लागत के अनुरूप नहीं रह गई है। इसका सीधा असर उन उर्वरकों की उपलब्धता पर पड़ रहा है, जिनका उपयोग दलहन, तिलहन, कपास और मक्का जैसी प्रमुख फसलों में व्यापक रूप से किया जाता है।
उत्पादन और आयात में बड़ी गिरावट दर्ज
उर्वरक उद्योग से जुड़े आँकड़ों के अनुसार, जून तिमाही में देश में एनपी/एनपीके उर्वरकों का उत्पादन घटकर 19.19 लाख टन रह गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 26.64 लाख टन था। यानी उत्पादन में लगभग 28 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
इसी अवधि में इन उर्वरकों का आयात भी तेज़ी से घटा है। जून तिमाही में आयात घटकर 4.91 लाख टन रह गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 9.54 लाख टन था। इस तरह आयात में लगभग 48.5 प्रतिशत की कमी आई है। उद्योग का कहना है कि बढ़ती लागत के कारण उत्पादन और आयात दोनों प्रभावित हुए हैं।
कच्चे माल की महँगाई से बढ़ी उद्योग की मुश्किलें
उर्वरक कंपनियों का कहना है कि अमोनिया और सल्फ़र जैसी आवश्यक कच्ची सामग्री की क़ीमतों में युद्ध के बाद तेज़ उछाल आया है। युद्ध से पहले अमोनिया की लैंडेड क़ीमत 400 से 500 डॉलर प्रति टन के बीच थी, जो बढ़कर लगभग 900 डॉलर प्रति टन तक पहुँच गई। बाद में इसमें कुछ नरमी आई, लेकिन क़ीमतें अब भी पहले के मुक़ाबले कहीं अधिक हैं। उद्योग का मानना है कि कंपनियों ने पहले ही उर्वरकों की क़ीमतों में कुछ बढ़ोतरी की है। यदि आगे और दाम बढ़ाए जाते हैं तो ये उर्वरक किसानों की पहुँच से बाहर हो सकते हैं। इसी कारण कई कंपनियाँ उत्पादन और आयात बढ़ाने से बच रही हैं।
सब्सिडी बढ़ी, लेकिन लागत के सामने कम पड़ रही राहत
यूरिया और डीएपी के विपरीत, एनपी और एनपीके उर्वरकों की खुदरा क़ीमत सरकार सीधे तय नहीं करती। इन उर्वरकों पर पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (एनबीएस) योजना लागू होती है, जिसके तहत सरकार अलग-अलग पोषक तत्वों पर सब्सिडी तय करती है, जबकि अधिकतम खुदरा मूल्य कंपनियाँ निर्धारित करती हैं।
अप्रैल 2026 में केंद्र सरकार ने खरीफ़ सीज़न के लिए पोषक तत्वों पर मिलने वाली सब्सिडी में 10 से 21 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की थी और इसके लिए कुल 41,534 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। हालांकि उर्वरक उद्योग का कहना है कि पश्चिम एशिया संघर्ष के बाद कच्चे माल की वैश्विक क़ीमतों में हुई तेज़ बढ़ोतरी के कारण यह संशोधित सब्सिडी भी पर्याप्त नहीं रह गई है। ऐसे में उत्पादन और आयात दोनों पर दबाव बना हुआ है, जिससे खरीफ़ सीज़न के दौरान किसानों को आवश्यक उर्वरकों की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है।