कभी चरखा, कभी ‘वंदे मातरम्’: आज़ादी से पहले कैसा था भारत का तिरंगा? जानिए 1904 से 1947 तक की पूरी कहानी

Mansi | Aug 14, 2026, 16:42 IST
भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे की परिभाषा और उसकी यात्रा स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न चरणों में देखने को मिलती है। सिस्टर निवेदिता के आदर्शों से शुरूआत होकर पिंगली वेंकैया के रचनात्मक दृष्टिकोण तक, तिरंगे ने अनेक परिवर्तनों का सामना किया। 1931 में कांग्रेस के द्वारा चरखे का समावेश किया गया, जो आज के तिरंगे का मूल आधार बना।

जब तिरंगा हवा में लहराता है, तो उसे देखकर हमारे भीतर देश के लिए गर्व की भावना जागती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आज़ादी से पहले भारत का झंडा कैसा दिखता था? क्या उसमें हमेशा अशोक चक्र था? क्या हमेशा केसरिया, सफ़ेद और हरा रंग ही थे?



आज का तिरंगा एक दिन में नहीं बना। इसके पीछे आज़ादी की लड़ाई के कई दशक, अलग-अलग विचार और देश को एक पहचान देने की कोशिशें जुड़ी हैं। कभी इसमें कमल के फूल और ‘वंदे मातरम्’ था, कभी चरखा आज़ादी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना, तो कभी विदेशी धरती पर भारतीय स्वतंत्रता की आवाज़ बनकर एक झंडा लहराया गया। आकाशवाणी की ओर से साझा की गई ऐतिहासिक सामग्री के आधार पर आइए जानते हैं कि हमारा तिरंगा अपने मौजूदा स्वरूप तक कैसे पहुँचा।



1904-05: राष्ट्रीय ध्वज की शुरुआती कल्पना

भारत के लिए एक राष्ट्रीय ध्वज की शुरुआती कल्पना का श्रेय सिस्टर निवेदिता को दिया जाता है। वह स्वामी विवेकानंद की शिष्या थीं और भारत की राष्ट्रीय चेतना से गहराई से जुड़ी थीं। उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार, उन्होंने 1904-05 के आसपास भारत के लिए एक ध्वज की कल्पना की थी। यह आज के तिरंगे से बिल्कुल अलग था। इसमें वज्र का प्रतीक और ‘वंदे मातरम्’ जैसे तत्व शामिल थे। उस समय भारत अंग्रेज़ी शासन के अधीन था और पूरे देश को एक साझा राष्ट्रीय प्रतीक से जोड़ने की ज़रूरत महसूस की जा रही थी। इसलिए यह प्रयास आगे की यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।




1906: आठ कमल और ‘वंदे मातरम्’ वाला झंडा

इसके बाद 1906 में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण तिरंगा सामने आया। 9 अगस्त 1906 को कलकत्ता के पारसी बागान में एक तिरंगा फहराया गया। इस झंडे में तीन क्षैतिज पट्टियाँ थीं। ऊपर की पट्टी पर आठ कमल के फूल, बीच में ‘वंदे मातरम्’ और नीचे सूर्य तथा अर्धचंद्र के प्रतीक थे। ज़रा उस समय की कल्पना कीजिए, देश अंग्रेज़ी शासन के अधीन था और उसी दौर में ‘वंदे मातरम्’ को एक राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में झंडे पर जगह दी जा रही थी। यह केवल एक डिज़ाइन नहीं था, बल्कि लोगों के भीतर बढ़ रही राष्ट्रीय चेतना की झलक थी।




1907: विदेश में भी पहुँची आज़ादी की आवाज़

1907 में इस शुरुआती झंडे का एक संशोधित रूप सामने आया। मैडम भीकाजी कामा ने 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टुटगार्ट में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन के दौरान भारतीय ध्वज फहराया। यह घटना इसलिए भी ऐतिहासिक थी क्योंकि भारतीय स्वतंत्रता की आवाज़ पहली बार विदेशी धरती पर इस तरह राष्ट्रीय ध्वज के साथ सामने आई। भीकाजी कामा ने भारत के लिए स्वराज और ब्रिटिश शासन से मुक्ति की मांग को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया।




1917: होम रूल आंदोलन से जुड़ा नया झंडा

1917 में ध्वज का एक और रूप सामने आया। यह होम रूल आंदोलन से जुड़ा था और एनी बेसेंट तथा बाल गंगाधर तिलक के आंदोलन की पहचान बना। इसमें लाल और हरे रंग के साथ सात सितारे और एक छोटे हिस्से में यूनियन जैक भी था। यह डिज़ाइन उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों को दर्शाता था, जब भारतीय नेता ब्रिटिश शासन के भीतर स्वशासन की मांग को मज़बूती से उठा रहे थे।




1921: तिरंगे में आया चरखा

1921 का साल तिरंगे की यात्रा में बेहद महत्वपूर्ण रहा। इसी दौर में पिंगली वेंकैया ने महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में एक नए ध्वज का डिज़ाइन तैयार किया। इसमें चरखे को प्रमुख जगह मिली। चरखा उस समय सिर्फ़ सूत कातने का साधन नहीं था। वह स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और अंग्रेज़ी शासन के आर्थिक विरोध का प्रतीक बन चुका था। यानी झंडे के बीच का चरखा लोगों से कह रहा था कि आज़ादी सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक आत्मनिर्भरता से भी जुड़ी है।




1931: तिरंगे ने लिया आज के रूप का आधार

1931 में केसरिया, सफ़ेद और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों वाला तिरंगा, जिसके बीच चरखा था, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ध्वज के रूप में आधिकारिक तौर पर अपनाया गया। यह वही स्वरूप था जिसने आगे चलकर स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज के लिए आधार तैयार किया। इस समय तक तिरंगा स्वतंत्रता आंदोलन और पूर्ण स्वराज की मांग से गहराई से जुड़ चुका था।




22 जुलाई 1947: मिला आज का तिरंगा

फिर आया वह ऐतिहासिक दिन, जिसने तिरंगे की दशकों लंबी यात्रा को नया रूप दिया। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने भारत के राष्ट्रीय ध्वज को उसके वर्तमान स्वरूप में अपनाया। इसमें ऊपर केसरिया, बीच में सफ़ेद और नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी रखी गई। सफ़ेद पट्टी के बीच चरखे की जगह गहरे नीले रंग का अशोक चक्र शामिल किया गया। इसमें 24 तीलियाँ हैं और इसका स्वरूप सारनाथ के अशोक स्तंभ के सिंह शीर्ष के धर्मचक्र से लिया गया है।



15 अगस्त 1947 को जब भारत ने आज़ादी की पहली सुबह देखी, तो यही तिरंगा स्वतंत्र भारत की पहचान बनकर सामने आया।




तिरंगे के तीन रंग क्या कहते हैं?

आज तिरंगे का केसरिया रंग साहस और त्याग, सफ़ेद रंग शांति और सत्य तथा हरा रंग समृद्धि और हरियाली से जोड़ा जाता है। बीच का अशोक चक्र गति, धर्म और निरंतर आगे बढ़ने का संदेश देता है। तिरंगे की लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 है। तीनों पट्टियाँ समान चौड़ाई की हैं और अशोक चक्र सफ़ेद पट्टी के बीच में होता है।



तिरंगे को देखकर सिर्फ़ तीन रंग मत देखिए…

जब अगली बार तिरंगा आपके सामने लहराए, तो याद रखिएगा, उसमें सिर्फ़ केसरिया, सफ़ेद और हरा रंग नहीं है। उसमें सिस्टर निवेदिता के शुरुआती प्रयास हैं, 1906 का ‘वंदे मातरम्’ है, भीकाजी कामा की विदेशी धरती पर उठी आवाज़ है, पिंगली वेंकैया का चरखा है और 1947 का अशोक चक्र है।



यानी हमारा तिरंगा एक झंडा नहीं, भारत की आज़ादी की लंबी यात्रा का जीवंत प्रतीक है। इसी वजह से तिरंगा जब आसमान में लहराता है, तो उसके साथ सिर्फ़ कपड़ा नहीं लहराता, एक पूरा इतिहास, एक संघर्ष और करोड़ों भारतीयों का गौरव लहराता है।

Tags:
  • Sister Nivedita Flag
  • Indian Independence Movement Flag
  • Indian National Flag History
  • Pingali Venkayya Flag Design
  • Vande Mataram Flag
  • Ashoka Chakra Significance
  • Akashvani
  • independence day
  • 15th august
  • freedom