वैश्विक बाज़ार में चढ़े गेहूँ के दाम, क्या भारतीय किसानों के लिए खुले नए अवसर, जानिए तेज़ी की वजह और भारत पर इसका असर
दुनिया के सबसे बड़े गेहूँ वायदा बाज़ार शिकागो बोर्ड ऑफ़ ट्रेड में पिछले एक महीने के दौरान गेहूँ की कीमतों में तेज़ उछाल दर्ज किया गया है। वायदा भाव 7 डॉलर (करीब 665 रुपये) प्रति बुशल (27.22 किलोग्राम) के पार पहुँच गए हैं, जो लगभग तीन वर्षों का उच्चतम स्तर माना जा रहा है। वैश्विक बाज़ार में आई इस तेज़ी का असर अब भारत पर भी दिखाई देने लगा है। कई मंडियों में गेहूँ के भाव मज़बूत हुए हैं और भारतीय गेहूँ के निर्यात की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं।
वैश्विक स्तर पर बढ़ती कीमतों के बीच भारत ऐसे देशों में शामिल है, जहाँ गेहूँ का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है। यही वजह है कि केंद्र सरकार ने चार वर्षों के प्रतिबंध के बाद वर्ष 2026 में सीमित मात्रा में गेहूँ निर्यात की अनुमति दी है। ऐसे में सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में आई यह तेज़ी भारत के किसानों, उपभोक्ताओं और निर्यातकों के लिए क्या मायने रखती है?
क्यों बढ़ रहे हैं वैश्विक बाज़ार में गेहूँ के दाम?
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में गेहूँ की कीमतों में उछाल के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण रूस-यूक्रेन क्षेत्र में बढ़ता तनाव है। रूस और यूक्रेन दुनिया के प्रमुख गेहूँ निर्यातक देशों में शामिल हैं। ब्लैक सी क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता और यूक्रेन के निर्यात मार्गों में आई बाधाओं ने वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसके अलावा मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण समुद्री मालभाड़ा (फ्रेट) और बीमा लागत में भी वृद्धि हुई है। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गेहूँ के व्यापार की लागत बढ़ी है। वहीं यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में अल नीनो से जुड़ी शुष्क परिस्थितियों और मौसम संबंधी अनिश्चितता ने उत्पादन को लेकर आशंकाएँ बढ़ा दी हैं। इन सभी कारणों से वैश्विक बाज़ार में गेहूँ की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है।
भारत के लिए कैसे खुला निर्यात का अवसर?
वैश्विक कीमतों में आई तेज़ी के कारण भारतीय गेहूँ अब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में प्रतिस्पर्धी होता दिख रहा है। खासकर बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों के लिए भारत से गेहूँ खरीदना अपेक्षाकृत सस्ता पड़ सकता है। यूरोप और अन्य दूरस्थ देशों की तुलना में भारत से कम दूरी होने के कारण परिवहन लागत भी कम आती है। चार वर्षों तक निर्यात पर रोक रहने के बाद केंद्र सरकार ने वर्ष 2026 में 50 लाख टन गेहूँ और 10 लाख टन गेहूँ उत्पादों के निर्यात की अनुमति दी है। उद्योग से जुड़े संगठनों के अनुसार, वैश्विक कीमतों में तेज़ी आने के बाद बांग्लादेश से भारतीय गेहूँ की खरीद को लेकर पूछताछ भी शुरू हो गई है।
क्या भारत में गेहूँ की पर्याप्त उपलब्धता है?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, केंद्रीय पूल में लगभग 5.78 करोड़ टन गेहूँ का भंडार मौजूद है। इसमें पिछले वर्ष का बचा हुआ स्टॉक और रबी विपणन सत्र 2026-27 के दौरान हुई सरकारी खरीद दोनों शामिल हैं। सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), अन्य कल्याणकारी योजनाओं और बफ़र स्टॉक के लिए आवश्यक मात्रा सुरक्षित रखने के बाद भी पर्याप्त गेहूँ उपलब्ध है। यही वजह है कि सरकार ने सीमित मात्रा में निर्यात की अनुमति दी है। सरकार का मानना है कि इससे बाज़ार में तरलता बढ़ेगी, भंडारण का बेहतर प्रबंधन होगा और किसानों को फसल बेचते समय बेहतर दाम मिलने की संभावना बढ़ेगी।
घरेलू बाज़ार पर क्या असर पड़ रहा है?
अंतरराष्ट्रीय संकेतों का असर भारतीय बाज़ारों में भी दिखाई दे रहा है। दिल्ली सहित कई प्रमुख थोक मंडियों में पिछले एक महीने के दौरान गेहूँ की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसे असामान्य बढ़ोतरी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कुछ समय पहले गेहूँ के दाम काफ़ी नीचे चले गए थे। यदि वैश्विक कीमतें ऊँची बनी रहती हैं और निर्यात जारी रहता है, तो किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से बेहतर दाम मिलने की संभावना बढ़ सकती है। वहीं, सरकार के पास ओपन मार्केट सेल स्कीम (ओएमएसएस) के तहत अतिरिक्त गेहूँ बाज़ार में उतारकर कीमतों को नियंत्रित करने का विकल्प भी मौजूद है।
क्या उपभोक्ताओं को चिंता करने की ज़रूरत है?
देश में गेहूँ का पर्याप्त भंडार मौजूद है और सरकार के पास ज़रूरत पड़ने पर बाज़ार में हस्तक्षेप करने के लिए पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। हालांकि यदि वैश्विक बाज़ार में यह तेज़ी लंबे समय तक बनी रहती है या मौसम की वजह से अगली रबी फसल प्रभावित होती है, तो भविष्य में घरेलू कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
ऑल इंडिया किसान कोऑर्डिनेशन कमेटी के पूर्व अध्यक्ष विजय जावंधिया कहते हैं , 'गेहूँ की मौजूदा तेज़ी के पीछे कई वैश्विक कारण हैं। पिछले एक महीने में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में गेहूँ के दाम बढ़े हैं। पश्चिमी एशिया में जारी तनाव, बढ़ी हुई लागत, अल नीनो के कारण मौसम संबंधी अनिश्चितता और अमेरिकी डलर के मुकाबले भारतीय रुपये की गिरती कीमत है। इससे भारतीय गेहूँ के निर्यात खासकर बांग्लादेश जैसे बाज़ारों में अवसर बढ़ सकते हैं। भारत में गेहूँ की कोई कमी नहीं है। खेती की लागत भी लगातार बढ़ रही है, इसलिए किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलना ज़रूरी है।'
आने वाले महीनों में वैश्विक बाज़ार, मौसम और सरकार की निर्यात नीति यह तय करेगी कि भारतीय किसानों को इस तेज़ी का कितना लाभ मिल पाता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि दुनिया में बढ़ती कीमतों ने भारतीय गेहूँ के लिए एक नया अवसर ज़रूर पैदा किया है, लेकिन इसका स्थायी लाभ तभी मिलेगा जब किसानों के हितों और उपभोक्ताओं की ज़रूरतों के बीच संतुलन बनाए रखा जाए।