Wheat Under Stress: "रात का बढ़ता तापमान बना नई चुनौती, गेहूं उत्पादन पर मंडराया संकट" IARI वैज्ञानिक ने बताए उपाय
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है और वैश्विक गेहूं उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी करीब 14 प्रतिशत है। देश हर साल लगभग 107 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन करता है। चावल के बाद गेहूं भारत का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण खाद्यान्न है और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) समेत देश की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। लेकिन जिन अनुकूल जलवायु परिस्थितियों ने भारत को गेहूं उत्पादन में वैश्विक शक्ति बनाया, वे अब तेजी से बदल रही हैं।
जलवायु और पर्यावरण पर काम करने वाली संस्था Climate Trends की हालिया रिपोर्ट "Wheat Under Stress: Climate Change, Rising Heat, and Adaptation Pathways in India's Major Wheat-Growing States" चेतावनी देती है कि बढ़ता तापमान, न्यूनतम तापमान में होती बढ़ोतरी, बार-बार आने वाली हीटवेव और मौसम की बढ़ती अनिश्चितता देश के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में उत्पादन के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार यदि तापमान वृद्धि का मौजूदा रुझान जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में गेहूं की पैदावार, गुणवत्ता और देश की खाद्य सुरक्षा पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), पूसा के वरिष्ठ गेहूं वैज्ञानिक डॉ. राजबीर यादव से बातचीत की गई, जिसमें उन्होंने बढ़ते तापमान, विशेष रूप से गर्म होती रातों के प्रभाव, गेहूं उत्पादन पर पड़ने वाले जोखिमों और किसानों के लिए संभावित समाधान पर गाँन कनेक्शन के साथ विस्तार से चर्चा की। साथ ही उन्होंने पैदावार को नुकसान से बचाने के लिए किसानों के लिए कुछ जरूरी टिप्स भी बताएं हैं जै आपको इस आर्टिकल के अंत में मिलेंगें।
बढ़ता तापमान से गेहूं की पैदावार को नुकसान
किसी भी फसल की पैदावार काफी हद तक तापमान पर निर्भर करती है। फसल के विकास की हर अवस्था चाहे फ्लावरिंग, ग्रेन फिलिंग या फिर पकने की अवधि, तापमान से प्रभावित होती है। तापमान ही तय करता है कि फसल किस गति से विकसित होगी और दानों के भराव के लिए कितना समय मिलेगा।
रात का तापमान तेजी से बढ़ना पसलों के लिए चिंता की बात
गेहूं के लिए रात का तापमान बेहद महत्वपूर्ण होता है। अगर रातें ठंडी रहती हैं तो दिन के तापमान में एक-दो डिग्री की बढ़ोतरी का बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ता। लेकिन जब रातें गर्म होने लगती हैं तो उसका प्रभाव अधिक गंभीर होता है। बढ़ा हुआ न्यूनतम तापमान पौधों की श्वसन प्रक्रिया को बढ़ा देता है, जिससे उत्पादन प्रभावित हो सकता है। नुकसान तो होता है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि पूरे सीजन में थोड़ा-थोड़ा बढ़ा तापमान उतना नुकसान नहीं करता जितना अचानक बढ़ा तापमान करता है। यदि किसी संवेदनशील अवस्था में अचानक गर्मी बढ़ जाए तो उसका असर ज्यादा गंभीर होता है।
ऐसे में किसान नुकसान कम करने के लिए क्या कर सकते हैं
डॉ. राजबीर यादव ने बताया, तापमान कब और कितनी तेजी से बढ़ेगा, इसका सटीक अनुमान लंबे समय पहले नहीं लगाया जा सकता। इसलिए किसानों को अपनी बुवाई (Sowing) को अलग-अलग समय पर करना चाहिए। पूरी फसल एक ही समय पर बोने के बजाय कुछ क्षेत्र अक्टूबर में, कुछ नवंबर की शुरुआत में और कुछ नवंबर के अंत में बोया जा सकता है। इससे मौसमीय जोखिम का बंटवारा हो जाता है।
क्या अक्टूबर में बुवाई करना अधिक सुरक्षित माना जा सकता है?
डॉ. राजबीर यादव का कहना है, अधिकांश परिस्थितियों में अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में बोई गई फसल बेहतर उत्पादन देती है। लगभग 80 प्रतिशत मामलों में जल्दी बोई गई फसल का प्रदर्शन अच्छा रहता है। हालांकि यदि फरवरी में अचानक तापमान बढ़ जाए तो जल्दी बोई गई फसल भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए जोखिम प्रबंधन के लिए अलग-अलग समय पर बुवाई करना बेहतर रणनीति है।
बड़े किसान और छोटे किसान के लिए आपकी क्या सलाह है?
डॉ. राजबीर यादव ने बताया जिन किसानों के पास अधिक भूमि है, वे अलग-अलग खेतों में अलग-अलग समय पर बुवाई कर सकते हैं। वहीं छोटे किसान मौसम पूर्वानुमान का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकते हैं। आजकल 10 से 15 दिन पहले तक तापमान के बारे में काफी सटीक जानकारी उपलब्ध हो जाती है। यदि गर्मी बढ़ने की संभावना हो तो समय पर सिंचाई करके फसल को कुछ हद तक राहत दी जा सकती है।
क्या हीट स्ट्रेस के दौरान सिंचाई एक प्रभावी उपाय है?
यदि मौसम पूर्वानुमान में तापमान बढ़ने की संभावना दिखाई दे रही है तो समय पर सिंचाई फसल को राहत पहुंचा सकती है। हालांकि किसानों को मौसम की स्थिति देखकर ही पानी देना चाहिए। तेज हवा और अत्यधिक भारी फसल की स्थिति में कुछ सावधानियां जरूरी होती हैं।
सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर का उपयोग पानी बचाने के लिए अच्छा हो सकता है, लेकिन जब बालियां निकल चुकी हों तो स्प्रिंकलर से सीधे बालियों पर पानी गिरने से फसल गिरने (Lodging) का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए सिंचाई का तरीका और समय दोनों महत्वपूर्ण हैं।
जलवायु परिवर्तन को देखते हुए नई गेहूं किस्मों पर हो रहा काम
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान लगातार ऐसी किस्मों के विकास पर काम कर रहा है जो बदलते मौसम और तापमान की परिस्थितियों को बेहतर तरीके से सहन कर सकें। सेंट्रल जोन के लिए HD 3463 जैसी नई किस्मों पर काम किया गया है। इसके अलावा HD 3385 जैसी किस्में भी किसानों के बीच अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं।
किसानों के लिए जरूरी टिप्स
- बदलती जलवायु परिस्थितियों में किसानों को मौसम आधारित खेती अपनानी होगी।
- बुवाई के समय में विविधता रखें, अलग-अलग किस्मों का चयन करें।
- मौसम पूर्वानुमान पर नजर रखें।
- आवश्यकता पड़ने पर समय पर सिंचाई करें।
- यही रणनीति भविष्य में बढ़ते तापमान और हीट स्ट्रेस के जोखिम को कम करने में मदद करेगी।