WMO रिपोर्ट: साल 2024 रहा सबसे गर्म साल, बढ़ रही है वायुमंडल से लेकर महासागरों तक गर्मी
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की 'वैश्विक जलवायु की स्थिति 2025' रिपोर्ट के अनुसार, पिछला दशक (2015-2025) अब तक का सबसे गर्म रहा है, जिसमें 2024 सबसे गर्म वर्ष दर्ज किया गया। अल नीनो और ला नीना जैसे प्रभावों के बावजूद वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से लगभग 1.43 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा, जो जलवायु परिवर्तन के वर्तमान संकट को दर्शाता है। महासागर अतिरिक्त ऊष्मा का 91% से अधिक अवशोषित कर रहे हैं, जिससे समुद्री ऊष्मा का स्तर रिकॉर्ड पर है, जबकि आर्कटिक और अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिससे समुद्र स्तर में वृद्धि हो रही है। ग्रीनहाउस गैसों के रिकॉर्ड स्तर के कारण पृथ्वी का ऊर्जा असंतुलन अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच गया है, जिससे बाढ़, सूखा, तूफान और हीटवेव जैसी चरम मौसम की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है।
क्या कहती है WMO की रिपोर्ट?
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की ताजा रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है और चरम मौसम की घटनाएँ अब सामान्य होती जा रही हैं। इसका असर न केवल पर्यावरण, बल्कि अर्थव्यवस्था और मानव जीवन पर भी गंभीर रूप से पड़ रहा है।
2015-2025 रहे सबसे गर्म साल
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) द्वारा जारी ‘वैश्विक जलवायु की स्थिति 2025’ रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 वर्ष (2015-2025) अब तक के सबसे गर्म दशक रहे हैं। वर्ष 2025 को अब तक का दूसरा या तीसरा सबसे गर्म वर्ष बताया गया है। इस दौरान वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर (1850-1900) से लगभग 1.43 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष दर्ज किया गया। इसमें तापमान औसतन 1.55 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था। इसका प्रमुख कारण अल नीनो प्रभाव रहा। वहीं, 2025 में ला नीना के बावजूद तापमान ऊंचा बना रहा।
महासागरों में बढ़ रही है गर्मी
महासागर लगातार गर्म हो रहे हैं। वे पृथ्वी की अतिरिक्त ऊष्मा का 91% से अधिक हिस्सा अवशोषित कर रहे हैं। पिछले 20 वर्षों में महासागरों ने मानव द्वारा उपयोग की जाने वाली ऊर्जा से 18 गुना अधिक ऊर्जा सोखी है। 2025 में समुद्री ऊष्मा का स्तर नया रिकॉर्ड बना चुका है। आर्कटिक और अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुँच चुकी है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे समुद्र स्तर में लगातार वृद्धि हो रही है। 2025 में वैश्विक समुद्री स्तर 1993 के मुकाबले लगभग 11 सेंटीमीटर बढ़ चुका है।
पृथ्वी की उर्जा का बिगड़ा संतुलन
इस रिपोर्ट में पहली बार “पृथ्वी का ऊर्जा असंतुलन” एक अहम संकेतक के तौर पर शामिल किया गया है। आसान भाषा में समझें तो पृथ्वी जितनी ऊर्जा सूरज से ले रही है, उतनी वापस अंतरिक्ष में नहीं भेज पा रही है। इसका मुख्य कारण ग्रीनहाउस गैसें जैसे कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड हैं, जो गर्मी को फंसा लेती हैं। 2025 में यह असंतुलन अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुँच गया।
2024 में हवा में CO₂ का स्तर पिछले 20 लाख सालों में सबसे ज्यादा दर्ज किया गया। वहीं मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड भी पिछले 8 लाख सालों के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका बड़ा कारण है कोयला, पेट्रोल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों का ज्यादा इस्तेमाल और प्रकृति (जंगल, समुद्र) की इन गैसों को सोखने की क्षमता का कम होना।
“मरीन हीटवेव” का बढ़ रहा प्रभाव
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में दुनिया के लगभग 90% समुद्री इलाकों में समुद्र का तापमान सामान्य से ज्यादा रहा, जिसे “मरीन हीटवेव” कहा जाता है। इसके साथ ही कई देशों में बाढ़, सूखा, तूफान और हीटवेव जैसी आपदाएं भी बढ़ी हैं, जिससे लाखों लोग प्रभावित हुए हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने चेतावनी दी है कि पृथ्वी अब जलवायु आपात स्थिति में पहुंच चुकी है और सभी बड़े संकेतक खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं। कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट साफ बताती है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि आज की हकीकत बन चुका है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो इसका सबसे ज्यादा असर खेती, पानी और इंसानों की जिंदगी पर पड़ेगा।